what hindi poet agyeya said about rashtriya swayamsevak sangh at the time of statue vandalisation - संघ का ऐब यह नहीं है कि वह ‘हिंदू’ है... - Jansatta
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संघ का ऐब यह नहीं है कि वह ‘हिंदू’ है…

लेनिन से गांधी तक की मूर्ति तोड़े या क्षतिग्रस्‍त किए जाने की घटनाओं के बीच आज सच्‍चिदानंद हीरानंद वात्‍स्‍यायन अज्ञेय की ये बातें बेहद मौजूं लग रही हैं। खास कर तब जब ऐसी घटनाएं उनके जन्‍मदिन (7 मार्च) के मौके पर हो रही हों।

अज्ञेय अपने एक लेख में हिंदूवादी संगठनों के कठमुल्लेपन का पुरजोर विरोध करते हैं।

त्रिपुरा में व्लादिमिर लेनिन की मूर्ति तोड़े जाने के बाद देश के कई राज्‍यों में मूर्तियों पर हमले की घटनाएं लगातार हो रही हैं। लेनिन के बाद श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी, पेरियार, अंबेडकर और यहां तक कि महात्‍मा गांधी की मूर्तियां खंडित की जा चुकी हैं। त्रिपुरा में भारत माता की जय के नारे के साथ लेनिन की प्रतिमा को गिराए जाने को दक्षिणपंथ विचारधारा की असहिष्णुता से जोड़कर देखा जा रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि दक्षिणपंथी त्रिपुरा में अपनी जीत के मद में चूर होकर वामपंथ के प्रतीकों को विदेशी बताकर उन्हें नष्ट करने के व्यापक अभियान पर हैं। प्रतिक्रिया में किसी ने जनसंघ के संस्थापक नेता रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा तोड़ दी। ऐसे में अपनी विचारधाराओं को लेकर इस स्तर के उग्रवाद से राष्ट्रीय सद्भाव और शांति को पहुंचने वाले नुकसान के विषय में चर्चा जोरों पर है। लेनिन की प्रतिमा तोड़ने वालों का संबंध एक बड़े हिंदूवादी संघ से जोड़ा जा रहा है। इनके समर्थकों का कहना है कि लेनिन हमारे प्रतीक नहीं हैं। हमारे प्रतीक विवेकानंद, गांधी और बुद्ध हैं। हम इनसे प्रेरणा ले सकते हैं। ऐसे में हमें रूसी क्रांति के नेता लेनिन की जरूरत नहीं है।

मूर्तिभंजकों की इस सोच पर अज्ञेय याद आते हैं। ऐसा शायद इसलिए भी कि इन घटनाओं के बीच ही अज्ञेय का जन्‍मदिन (7 मार्च) भी आ गया। अज्ञेय हिंदी साहित्य के क्रांतिकारी कवि माने जाते हैं। धार्मिक कट्टरपंथ और राजनैतिक अलगाववादी नीतियों के खिलाफ उनकी कलम ने हमेशा निष्पक्ष होकर अपनी बात कही है। अज्ञेय अपने एक लेख में हिंदूवादी संगठनों के कठमुल्लेपन का पुरजोर विरोध करते हैं। अज्ञेय हिंदू राष्ट्रवाद की समर्थक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, ‘संघ का ऐब यह नहीं है कि वह ‘हिंदू’ है। ऐब यह है कि वह हिंदुत्व को संकीर्ण और द्वेषमूलक रूप देकर उसका अहित करता है, उसके हज़ारों वर्ष के अर्जन को स्खलित करता है, सार्वभौम सत्यों को तोड़-मरोड़ कर देशज या प्रदेशज रूप देना चाहता है यानी झूठा कर देना चाहता है।’

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देशज अंधता को वह राष्ट्रीयता नहीं मानते। वसुधैव कुटुंबकम् परंपरा की जनक-संस्कृति को वह सार्वभौम सत्यों की उपज करने वाली जमीन मानते हैं। वह कहते हैं- ‘देशज’ अंधता को हम राष्ट्रीयता नहीं मान सकते, न हम हिंदुत्व पर इस नाते गर्व करते हैं कि वह इस मिट्टी की देन है, बल्कि मिट्टी पर इसलिए गर्व कर सकते हैं कि उसमें ऐसे सत्य उपजे जो सार्वभौम हैं। एक हिंदू धर्म ने ही धर्म-विश्वासों और धर्ममतों से ऊपर आचरित धर्म को, ऋत के अर्थात् सार्वभौम सत्य के अनुकूल आचरण को महत्त्व दिया। अज्ञेय की बातें तार्किक दृष्टि से सत्य के काफी निकट लगती हैं। जिस आधार पर त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा गिराई गई वह इस घटना के जिम्मेदार संगठनों की कुंठा, उनके द्वेष और उनकी खुन्नस की आड़ भर थी, क्योंकि जिस देशज संस्कृति की दुहाई देते हुए उन्होंने क्रेन चलाया था वह उन्हें परदेशी संस्कृति के इस तरह के बहिष्कार की आज्ञा नहीं देती।

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संस्कृति के नाम पर उन्माद की यह पहली घटना नहीं है। देश में पिछले कुछ सालों से ऐसे मामले लगातार राष्ट्रीय चर्चा के केंद्रबिंदु बने हैं। ऐसे ‘सांस्कृतिक’ कार्य को अज्ञेय बेहद खतरनाक मानते हैं। उनका कहना है कि – ‘संस्कृति का नाम लेकर लोगों को अधिक आसानी से भड़काया और बरगलाया जा सकता है, तो ऐसा ‘सांस्कृतिक’ कार्य स्पष्ट आत्मस्वीकारी ‘राजनैतिक’ कार्य से अधिक ख़तरनाक ही होता है।’ अज्ञेय राजनीतिक इस्तेमाल में चुनाव जीतने के लिए भी इन तरीकों के इस्तेमाल को बहुत गलत मानते हैं।

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