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बिहार चुनाव से जुड़े ये आंकड़े क्या इशारा करते हैं?

आमतौर पर माना जाता है कि अधिक मतदान सत्ता विरोधी लहर का संकेत होता है, लेकिन बिहार के पिछले तीन दशकों के चुनाव इस परिकल्पना को खारिज करते हैं...

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प्रो. रवि रंजन

विविधताओं से भरे भारतीय लोकतंत्र में हर चुनाव अपनी विशेषताओं की वजह से पूरी दुनिया में राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक नया प्रयोग होता है। और जब बात बिहार चुनाव की हो तो इस प्रयोग में नया अध्याय जुड़ना तय है। मसलन, 2020 का विधानसभा चुनाव ना केवल कोरोना काल का पहला चुनाव है, बल्कि पूरी दुनिया के लोकतंत्र के लिए महामारी में भी सफलतापूर्वक चुनाव को सम्भव करने की एक सीख भी है। बिहार विधानसभा के दो चरणों के मतदान हो चुके हैं, 243 में से 165 सीटों पर उम्मीदवारों का भविष्य ईवीएम में कैद हो चुका है।

कोरोना काल में हुए इस चुनाव में, डर से जब सारा विश्व घरों में बंद है, वहीं बिहार में कोविड-19 प्रोटोकॉल का अनुसरण करते हुए पहले दो चरणो में लगभग 55% मतदान यह सिद्ध करता है कि दुनिया के सबसे पुराने गणतंत्र (वैशाली) वाले राज्य में जनतंत्र आज भी जाग रहा है। कोरोना के बावजूद लोग सरकार चुनने के लिए घरों से बाहर निकलकर मतदान केंद्र तक पहुंच रहे हैं, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं सभी में उत्साह है। मानो चुनावी लोकतंत्र में प्रतिभागिता ने कोविड-19 को थाम दिया हो।

आशा है, लोकतंत्र के उत्सव में ऐसा उल्लास तीसरे चरण के मतदान में भी दिखेगा। लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था की सफलता और मज़बूती जिन दो मापकों से अक्सर नापी जाती है वो हैं चुनाव में मतदान प्रतिशत और प्रभावी विपक्ष की सक्रिय राजनैतिक भागीदारी एवं सरकार बनाने की दावेदारी। इसका क़तई ये मतलब नहीं है कि सत्ता पक्ष नगण्य होता है, बल्कि विपक्ष की चुनौतियाँ उसे सुधार लाने और बेहतर बदलाव के लिए प्रेरित करती है। ऐसे में मतदाताओं के मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर चुनाव प्रचार काफ़ी प्रतिस्पर्धात्मक होता है और अंततः सत्ता किसे मिलेगी ये जनता तय करती है।

इन सभी मापदंडों ने यह तो लगभग तय ही कर दिया कि 2020 में भी लिक्षवि गणराज्य के गणतंत्र का जनतंत्र आज भी जगा हुआ है। मतदाता सचेत है, सत्ता पक्ष गम्भीर और विपक्ष चुस्त। झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में विधानसभा चुनाव 2005, 2010, और 2015 में हुए, इन तीनो चुनावों के मतदान प्रतिशत क्रमशः 49.5% (2005 Oct), 52.7% (2010) और 56.9% (2015) रहा। उमीद से परे कोविड के बावजूद दो चरणों का औसत मतदान लगभग 55% हैं। अद्भुत राजनैतिक चेतना के बावजूद बिहार में पोलिंग प्रतिशत बहुत अधिक नहीं रहा है इसकी एक बड़ी वजह प्रवासी बिहारी हैं, लेकिन महामारी और तालाबंदी के बाद पलायन से वापसी मज़दूरों के कारण इस बार उम्मीद थी कि मतदान प्रतिशत अधिक होगा और परिणाम पर असर पड़ेगा। पर ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी।

आमतौर पर माना जाता है कि अधिक मतदान सत्ता विरोधी लहर का संकेत होता है, लेकिन बिहार के पिछले तीन दशकों के चुनाव इस परिकल्पना को खारिज करते हैं, 1990, 1995 और 2000 के विधानसभा चुनाव में क्रमशः 62.0%, 61.8% और 62.6% मतदान हुआ और आरजेडी की सत्ता बरकरार रही। वहीं 2005 के चुनाव में मतदान घटकर 49.5% हो गया और सत्ता परिवर्तन हो गया। उसी प्रकार 2005, 2010 और 2015 में मतदान का प्रतिशत लगातार बढ़ा लेकिन सत्ता नहीं बदली।

स्थापित चुनावी मान्यताओं से परे बिहार में मतदान प्रतिशत और चुनावी परिणाम के रुझान से पता चलता है कि मतदान के प्रतिशत में पिछले चुनाव की तुलना में गिरावट सत्ता परिवर्तन के संकेत होते हैं। 2000 से 2005 में मतदान प्रतिशत कम हुआ, सत्ता बदल गई। राजद और जदयू के 15-15 सालों के शासन का चुनावी गणित बताता है कि जब मतदान प्रतिशत बढ़ता है तो सत्ता पक्ष मजबूत होता है और सत्ता में वापसी करता है, लेकिन अगर मतदान प्रतिशत में गिरावट दर्ज की जाती है तो सत्ता परिवर्तन की उम्मीद बन जाती है और विपक्ष मजबूत होता है।

अगर तेजस्वी की बेरोजगारी से जंग की संकल्पना सही दिशा लेती है तो महागठबंधन की रैलियों की भीड़ वोट में तब्दील होगी और नीतीश की मुश्किलें बढ़ेंगी। अपने ही कुनबे के मतभेद एनडीए को भारी पड़ेंगे और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के और भी मायने निकाले जाएंगे। चुनाव के पहले से ही मीडिया में बहुत वाद-विवाद का विषय बना ‘बिहार में का बा’ और ‘बिहार में ई बा’ जैसे नारों में बिहार की अनूठी संस्कृति की झलक तो है ही। वहीं, सरकार और नीतियों पर सवाल है,  बदलाव की बात है, तो वहीं बेहतरी का भरोसा भी।

कुल मिलाकर ‘बिहार में का बा’ और ‘बिहार में ई बा’ के समवाद ने एक नई बहस से इस बात पर भी मुहर लगा दी है कि बिहार में ‘जागल जनतंत्र बा’। इस बहस ने यह भी सिद्ध कर दिया कि बिहार की जनता महामारी जैसी स्थिति में भी लोकतंत्र की प्रहरी है, और जनतंत्र सोया नहीं है, जागा हुआ है, लोगों में उम्मीद है। शायद अमर्त्य सेन का तार्किक भारतीय (आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन) बिहार के हर मतदाता में बसता है।

बिहारी मतदाता निराशा में भी उम्मीद लगाता है और बुद्ध की धरती में चाणक्य की राजनीति तलाशता है। यहाँ हर चुनाव नया है, सत्ता के समीकरण नए हैं, और पार्टियों का गठजोड़ एवं गणित नया है। अनुभव से ओतप्रोत सत्ता पक्ष और युवा जोशवाला विपक्ष आमने-सामने है, मुद्दे में बेरोज़गारी, विकास और भ्रष्टाचार अहम है, वहीं टिकट बँटवारे में जातिगत गणना का दमख़म है। पंद्रह साल बनाम पंद्रह साल का खेल है। अब तो ये जनता ही तय करेगी कि कौन पास या फेल है।

10 तारीख़ को परिणाम से पता चलेगा कि ‘कमल और तीर’ अभी भी है वीर या ‘लालटेन एवं पंजा’ बदलने जा रहे बिहार की तस्वीर। ‘बंगला’ और ‘सतरंज’ पर भी इस चुनाव में बाज़ी है, ‘पंखा’ और ‘नाव’ भी चुनावी मजधार में चलने को राज़ी हैं। एनडीए के सत्ता पक्ष को सर्वे और ओपिनियन पोल जहां मज़बूत स्थिति में दिखा रहे हैं, वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विपक्ष की रैलियाँ ज़ोरदार हैं, लोगों को लगता है युवा बिहार में युवा नेता होनहार है, सही अनुमान लगाना अभी भी मुश्किल है, क्योंकि मतदन गोपनीय और मतदाता समझदार हैं। देखना होगा अभी भी बागों में बहार है या बदलाव की
बयार है।

(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं)

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