ताज़ा खबर
 

फ़ोन टैपिंग पर क्या कहता है भारत और अन्य देशों का कानून?

भारत में सिर्फ़ 10 एजेंसियों खुफिया ब्यूरो (आईबी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), रॉ, सिगनल खुफिया निदेशालय और दिल्ली पुलिस आयुक्त के पास ही फोन टैपिंग का अधिकार है।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति से विशेष परिस्थितियों में ही रिकॉर्डिंग की अनुमति है।

फ़ोन टैपिंग का मसला वर्षों से सामाजिक पटल पर सुर्खियां में बना हुआ है। बीते कुछ दशकों से ही इसके बारे में चर्चाएं होती रही है। समय समय पर फ़ोन टैपिंग की वजह से संसद से सड़क तक आवाज़ उठती आई है। आवाज़ उठना और उठाना दोनों लाज़मी है, क्योंकि यह एक बेहद ही प्रासंगिक और संवेदनशील मुद्दा है, लेकिन इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जा सकता है कि संविधान और कानून में तमाम तरह के प्रावधानों के बाद भी बहुत आसानी से फ़ोन टैपिंग मामले में तेज़ी देखने को मिल रही है। सरकार और आयोग अभी भी इस विषय पर पूर्ण रूप से सख़्त नहीं हो पाई है। हालांकि तकनीक के दौर में फोन टैपिंग का मामला पहले से और भी ज्यादा देखने को मिल रहा है और यह काफ़ी चिंतनीय है। आइए जानते है कि भारत में फोन टैपिंग के लिए क्या क्या कानूनी प्रावधान मौजूद है? इसके साथ ही आज फोन टैपिंग का कानूनी रूप से उल्लंघन करने के प्रावधानों का भी जिक्र करेंगे।

क्या कहता है 1985 का भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम?
यह कानून मुख्य रूप से आजादी के पूर्व का है। साल 1885 में इस कानून को अंग्रेज़ी हुकूमत के द्वारा भारत में लाया गया था। हालांकि समय समय पर इस कानून में संशोधन जरूर हुए है। भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 के अन्तर्गत केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार को आपातकाल या लोगों की सुरक्षा के लिए फोन कॉल को प्रतिबंधित करने, फ़ोन टैपिंग तथा फ़ोन की निगरानी करने का अधिकार प्राप्त है। अधिनियम की धारा 5(2) के मुताबिक सरकारी एजेंसियों के पास यह अधिकार है कि वह लोगों के फ़ोन को टैप कर सकती है। मुख्य रूप से देश की सुरक्षा, लोकहित, दूसरे राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण वातावरण, देश की अखंडता और संप्रभुता को खतरा होने की स्थिति से फ़ोन टैपिंग किया जा सकता है।

इस एक्ट के नियम 419 एवं 419-A  में फ़ोन कॉल्स और मेसेज की देखरेख तथा पाबंदी लगाने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है। इसके केवल सरकारी एजेंसियों को ही यह अधिकार दिया गया है कि वह गृह मंत्रालय के सचिव से पूर्व में इजाजत लेकर किसी व्यक्ति का फोन टेप कर सकती हैं। इस नियम को साल 2007 में संशोधन के तहत जोड़ा गया था। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय एवं सीबीआई को गृह मंत्रालय की पूर्व इजाजत के बिना 72 घंटे तक किसी भी व्यक्ति का फोन टेप करने का अधिकार दिया गया है। यह अधिकार मुख्य रूप से सुरक्षा तथा कार्रवाई की वजह से दिया गया है।

आपको बता दें कि केंद्र और राज्य सरकार के अन्तर्गत गृह सचिव दो महीने के लिए फोन टैपिंग की अनुमति जारी करते है। साथ ही कुछ विशेष परिस्थिति में इसे ज्यादा से ज्यादा 180 दिन तक बढ़ाया जा सकता है। हालांकि अभी तक ऐसा कोई प्रावधान कानून में नहीं है, जिससे कोर्ट की इजाजत के बाद ही फ़ोन की टैपिंग हो सकें। दूसरे देशों में यह प्रावधान मौजूद है। जर्मनी में फ़ोन टैपिंग से पहले स्थानीय जज से अनुमति लेनी होती है।

फ़ोन टैपिंग से मौलिक अधिकारों का होता है हनन?
संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। इसके तहत लोग आसानी से अपनी अभिव्यक्ति का इजहार करते है। देखा जाएं तो फ़ोन टैपिंग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधे तौर पर हनन करता है। हालांकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) के अन्तर्गत लगाया गया है। इसके तहत लोकहित और देशहित में फ़ोन टैपिंग संवैधानिक दायरों और कानून के अंतर्गत की जा सकती है। लेकिन बिना किसी वजह और कानून के दायरे से बाहर जाकर फ़ोन टैपिंग मौलिक अधिकारों का हनन है।

भारतीय संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदत है। संविधान के अनुच्छेद 21 में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात की गई है। इसके मुताबिक किसी भी व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही इसी अनुच्छेद में लोगों को निजता का अधिकार भी दिया गया है। टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत भी निजता के अधिकार के अंतर्गत आता है। आपको बता दें कि लोगों के पास व्यक्तिगत निजता के साथ साथ अपने परिवार, शिक्षा, विवाह, मातृत्व आदि के विषय पर भी गोपनीयता का अधिकार संविधान में प्रदत है। फ़ोन टैपिंग मुख्य रूप से निजता के अधिकार के साथ साथ अनुच्छेद 21 का भी हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने भी समय समय पर यह माना है कि फ़ोन टैपिंग से निजता के अधिकारों का हनन हो रहा है। हालांकि निजता के अधिकार पर भी उचित प्रतिबंध का प्रावधान हैं।

फ़ोन टैपिंग पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले
सुप्रीम कोर्ट ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1996) केस में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए फ़ोन टैपिंग को निजता के अधिकार का हनन माना। साथ ही कोर्ट ने इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार को कमेटी बनाने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने फ़ोन टैपिंग करने के लिए सबसे पहले राज्य के गृह सचिव से  इजाज़त लेना अनिवार्य कर दिया। साथ ही फ़ोन टैपिंग करने वाली एजेंसी को टैपिंग के कारणों को भी स्पष्ट करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने फ़ोन टैपिंग के समय सीमा को भी निर्धारित किया। फ़ोन टैपिंग के उद्देश्य, कारण और बाकी सारी चीज़ों पर भी न्यायालय ने काफी सख़्ती दिखाई।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केएलडी नागाश्री बनाम भारत सरकार (2006) के केस में धारा 5(1) और धारा 5(2) के तहत पब्लिक इमरजेंसी तथा लोकहित में फोन टैपिंग को सही ठहराया और इसे वैध करार दिया। साथ ही रायाला एम भुवनेश्वरी बनाम नगाफनेंद्र रयाला(2008) के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने पति के द्वारा पत्नी पर किए गए फोन टैपिंग को अमान्य और अवैध करार दिया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि यह कानून के साथ साथ पत्नी के निजता के अधिकारों का भी उल्लघंन है।

फ़ोन टैपिंग से बचने के लिए लोगों के पास क्या है कानूनी अधिकार?
बेवजह और गैर कानूनी तरीके से फ़ोन टैपिंग करने की स्थिति में व्यक्ति मानवाधिकार आयोग में इसकी शिकायत कर सकता है। क्योंकि फोन टैपिंग से लोगों के निजता के अधिकार का हनन होता है। फ़ोन टैपिंग होने की जानकारी की स्थिति में आप नजदीकी पुलिस स्टेशन में एफआईआर भी दर्ज करवा सकते है।

इसके साथ ही अगर आपको लगता है कि आपका फ़ोन टैप हुआ है और अनाधिकृत रूप से इसका इस्तेमाल किया गया है तो आप फोन टैपिंग करने वाले व्यक्ति या कंपनी के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर कर सकते है। यह याचिका मुख्य रूप से भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 26(B) के तहत की जा सकती है। इस धारा के अन्तर्गत आरोपी को तीन साल की सजा का भी प्रावधान है।

भारत में सिर्फ़ 10 एजेंसियों के पास ही फोन टैपिंग का अधिकार है। इसमें मुख्य रूप से खुफिया ब्यूरो (आईबी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), रॉ, सिगनल खुफिया निदेशालय और दिल्ली पुलिस आयुक्त शामिल हैं। यह जानकारी केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर के दौरान दिया था।

अन्य देशों में फ़ोन टैपिंग से जुड़े प्रावधान?
जर्मनी में दो अथवा दो से अधिक लोगों की जानकारी के बिना यदि फोन टैपिंग होता है तो इसे जर्मन क्रिमिनल कोड के अन्तर्गत अपराध की श्रेणी में रखा गया है। यहां तो फोन टैपिंग से पहले स्थानीय जज से अनुमति भी लेनी पड़ती है। इसके साथ ही बिना जानकारी के टैप किए हुए फोन को सबूत के तौर पर आगे की कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

कनाडा में फोन पर बात कर रहे दो व्यक्ति में से किसी एक को भी टैपिंग की जानकारी होना आवश्यक है। फिनलैंड मामला उल्टा है। यहां पर किसी व्यक्ति का फोन टैप होना ज्यादा बड़ा मसला नहीं माना जाता है। अगर किसी का फोन टैप हुआ है और उससे किसी की प्राइवेसी भंग नहीं हुई है और कोई भी गोपनीय बातें लीक नहीं हुई है तो किसी भी प्रकार की कार्रवाई और कड़े कदम नहीं उठाए जाते है।

निष्कर्ष :-
भारत में समय समय पर फोन टैपिंग का मामला सामने आता रहा है। खासकर राजनेताओं पर काफी बार फोन टैपिंग का आरोप लगता रहा है। यह मुद्दा काफी गंभीर और संवेदनशील है। जरूरत है देश को पहले से बेहतर और सख़्त कानून की, जिससे फोन टैपिंग पर रोक लगाई जा सकें। हालांकि तकनीकी विस्तार और कई सारे यंत्रों की मदद से फोन टैपिंग पहले से ज्यादा आसान हो गया है। 10 किलोमीटर के दायरे में कभी भी इन तकनीक के माध्यम से फोन टैपिंग की जा सकती है। सरकार और एजेंसियों को इसके लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है। सरकार को इस दिशा में आगे कदम बढ़ाने की जरूरत है।

(लेखक कानून के जानकार हैं। यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके निजी हैं।)

Next Stories
1 क्‍यों जरूरी है समान नागरिक संहिता, क्‍या हैं इसे लागू करने में देरी के नुकसान?
2 मंत्रिमंडल में फेरबदल की नौटंकी छोड़ जनता का जीवन सुधारने पर व‍िचार हो- काटजू
3 SC के पूर्व जज ने योग दिवस को बताया नौटंकी, कहा- जिनके पास रोटी नहीं, उनसे यह केक खाने को कहने जैसा
ये पढ़ा क्या?
X