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‘कोरोना की जंग में हम भूल चुके साफ हवा और पानी पीना, बाथरूम जाने से बचने को पहन रहे डायपर्स’

हमारे फिट हेडगेयर्स में हवा तो लीक नहीं होती, पर इस चक्कर में चंद मिनटों में सांस लेना मुश्किल हो सकता है। किट पहनने के बाद अंदर से काफी गर्म और घुटन सी महसूस होती है। ऊपर से जब गॉगल्स (किट में चश्मा) लगाते हैं, तब दिखाई भी नहीं देता।

Coronavirus, COVID-19, AIIMS, Doctor, Sai Nath, New Delhi, India, National News, Hindi Newsकोरोना संक्रमण काल में हमारे स्वास्थ्यकर्मियों को खासा दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। (फोटोः एजेंसी)

डॉ.सायन नाथ।

मैं AIIMS ट्रॉमा सेंटर में सीनियर रेज़िडेंट डॉक्टर हूं। शुरू से ही मेरी तैनाती COVID-19 समर्पित आईसीयू में रही है। और, मैं कंटीजेंसी प्रीपरेशन प्रोसेस का हिस्सा रहा हूं। हम छह घंटों की चार शिफ्ट्स में काम करते हैं, ताकि लोगों को 24 घंटे सातों दिन स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। हम सात दिन काम करते हैं और सात दिन का ब्रेक रूटीन भी लेते हैं। अभी मैंने अपना ब्रेक पूरा ही किया है और मैं काम की दूसरी वर्क शिफ्ट में हूं।

पिछले कुछ हफ्तों में जीवन बहुत व्यस्त सा हो गया है। खासकर Personal Protective Equipment (पीपीई) पहनने के बाद से। यह किट पहनने में लगभग आधा घंटा लग जाता है। चूंकि, ये हेल्थ गेयर्स एक बार ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं, इसलिए हम काम के चक्कर (शिफ्ट के दौरान) हम दैनिक दिनचर्या की सामान्य चीजें मसलन खाना-पानी, ताजी हवा लेना और यहां तक बाथरूम तक जाना भूल जाते हैं।

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जब से एक शिफ्ट में एक पीपीई मिलती है, टॉयलेट जाने से बचने के लिए हमें ‘अडल्ट डायपर्स’ पहनने पड़ते हैं। हमारे फिट हेडगेयर्स में हवा तो लीक नहीं होती, पर इस चक्कर में चंद मिनटों में सांस लेना मुश्किल हो सकता है। किट पहनने के बाद अंदर से काफी गर्म और घुटन सी महसूस होती है। ऊपर से जब गॉगल्स (किट में चश्मा) लगाते हैं, तब दिखाई भी नहीं देता। पीपीई में हर कोई एक जैसा मालूम पड़ता है, पर बाहर ड्रेस में सीने वाले हिस्से पर हमारे नाम लिखे रहते हैं।

स्वास्थ्य सेवा टीमों के बीच संपर्क भी एक अलग किस्म की चुनौती है। अगर मैं चिल्लाता भी हूं, तब मेरी आवाज बुदबुदाने सरीखी सी लगती है। आपातकालीन स्थितियों में हम और भी सावधान और चौकन्ने हते हैं, क्योंकि छोटे से कम्युनिकेशन गैप हमारे लिए चिंता बन सकती है।

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अभी के लिए, एडवांस में एक चेकलिस्ट तैयार कर ली गई है। और, हमारे बीच अधिकतर संवाद उसी साइन लैंग्वेज (चिह्न आधारित प्रतीकात्मक भाषा) के जरिए होता है। छह घंटे की शिफ्ट के बाद हम सब थके-हारे जैसे होते हैं। यहां तक कि खाना बनाना, सफाई और धुलाई जैसे काम भी बगैर किसी के मदद के खुद ही करने पड़ते हैं। ऐसे भी मौके आते हैं, जब हम बाहर निकलते हैं और कुछ पलों के लिए ताजी हवा लेते हैं। पर मुझे मालूम है कि ये सारे सुख और आनंद किसी और दिन के लिए हैं।

एक बार महामारी निपट जाए, तब मैं अपने परिजन के यहां कोलकाता जाऊंगा। मैंने उन्हें जब से बताया है कि मैं कोरोना वॉर्ड में ड्यूटी कर रहा हूं, तब से वह मुझे लेकर खासा चिंतित हैं। पर मुझे मालूम है कि यह हाल-फिलहाल या आने वाले कुछ दिनों में संभव नहीं है।

मैं जब मेडिकल पेशे में आया था, तब मेरा मकसद लोगों की सेवा करना था। बीते कुछ सालों में और यहां तक कि अब भी मैं डॉक्टरों पर हमलों और हिंसा के मामले देखता हूं, जो कि मेरे इस पेश को चुनने को लेकर सवाल उठा देते हैं। इन सारी चीजों के बावजूद हम सब (डॉक्टर बिरादरी) रोजाना काम पर उसी जोश और शिद्दत के साथ जाते हैं, क्योंकि हमें मालूम है कि आप की (जनता) जिंदगी हम पर निर्भर है और हमने उसे सुरक्षित रखने की कसम खाई है!

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ऐसे अनुवभों, त्यागों और काम करने वाले बेहद कठिन माहौल के बाद भी डॉक्टर्स अपनी जान जोखिम में डालकर शत प्रतिशत योगदान देते हैं। मैं चाहता हूं कि यह जानकारी तब तक शेयर की जाए, जब तक यह आम लोगों में अधिक से अधिक लोगों के बीच नहीं पहुंच जाती है, ताकि कोरोना वायरस संकट के बाद उनमें से कुछ लोगों के पास हमारे लिए आभार न सही कम से कम सहानुभूति ही पनप जाए।

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