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भारत में युवाओं की दिग्भ्रमित होती सोच: विवेकानंद देख रहे हैं क्या आप….?

स्वामी विवेकानंद भारत की युवाशक्ति का एक ऐसा प्रतीक हैं, जिनकी मिसाल अन्यत्र है ही नहीं। आज भी हमारे युवाओं के लिए वे एक प्रेरणास्रोत हैं और रहेंगे।

Author January 12, 2017 7:27 AM
स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी 1863- चार जुलाई 1902)

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

ऐसा माना जाता है कि भारत में युवाओं की संख्या विश्व के अन्य देशों से अधिक है। आँकड़ों की मानें तो भारत की आबादी का लगभग तीन चौथाई भाग युवाओं का है। इतिहास साक्षी रहा है कि किस तरह किसी भी राष्ट्र की उन्नति अथवा अवनति के मार्ग को युवाओं की सोच एक दिशा देती आई है। भारत की स्वतंत्रता का इतिहास असंख्य युवा बलिदानों की गाथाओं से भरा पड़ा है। स्वामी विवेकानंद भारत की युवाशक्ति का एक ऐसा प्रतीक हैं, जिनकी मिसाल अन्यत्र है ही नहीं। आज भी हमारे युवाओं के लिए वे एक प्रेरणास्रोत हैं और रहेंगे। लेकिन कहीं न कहीं ये बातें महज किताबी होती सी लगने लगती हैं, जब देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और संस्थानों के तथाकथित युवानेता चंद राजनीतिक बहकावों में आकर राष्ट्र, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रहित और आजादी व अभिव्यक्ति की अपनी तथ्यहीन परिभाषाएं गढ़ने लगते हैं। और यहां से आरम्भ होने लगती हैं चिंतनीय सीमाएं कि देश कैसे विवेकानंद के युवा-सपनों को सुरक्षित रख पाएगा, जहां आजादी के मायने राष्ट्रीय परिधि की विस्तार सीमाओं से परे राष्ट्रीय संवेदनाओं के प्रति बेहद लापरवाही भरे कितने स्वकेंद्री हो गए हैं।

भारत में युवाओं की दिग्भ्रमित होती सोच उनको किस दिशा में ले जा रही है, ये आज का अतिगम्भीर व शोचनीय विषय है। सोशल मीडिया पर पढ़ने में आने वाली उनकी नितांत अगम्भीर व अभद्र टिप्पणियां, संस्थानों के गलियारों में गूंजने वाले देशविरोधी नारे, परिहास को निजी जुगुप्सीय सीमाओं तक खींचने की पीड़ाएं और भी बहुत कुछ जो नहीं होना चाहिए वो भारतीय युवा कर रहे हैं या कि उनसे करवाया जा रहा है। कहां तो एक समय था जब प्रखर राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक नेतागण देश के युवाओं के माध्यम से भारत को ही नहीं वरन् विश्व को संस्कारित करना चाहते थे, क्योंकि वे सही मायनों में राष्ट्र के प्रति गौरवबोध और राष्ट्र कल्याण के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले उन भारतीय युवाओं को तैयार करते थे, जिनके लिए भारतीय संस्कृति, समाजसेवा, चरित्र-निर्माण, शिक्षा, देशभक्ति, व्यक्तित्व तथा नेतृत्व जैसे विषयों की प्रासंगिकता के गूढ़ अर्थों के संबंध सुनिश्चित रुप से स्वयं की स्वार्थसिद्धि से कहीं अधिक देशहित से जुड़े थे।

लेकिन आज जब नेतागण शिक्षासंस्थानों से जिन युवाओ को प्रतीक रुप में सामने लाते हैं और उनकी गढ़ी राष्ट्रहित की परिभाषाओं को महिमामण्डित करते हैं, तब उनके राजनीतिक स्वहितों को पूर्ण कर पाने की सढ़ांध देश में दमघोंटू सामाजिक प्रदूषण फैलाने में सफल होती सी जान पड़ने लगती है। कहीं न कहीं सत्ता की महत्वाकांक्षा ने भारत में विशुद्ध राजनैतिक चरित्र की हत्या कर दी है। युवाओं ने आँखें ही उस माहौल में खोली हैं, जहां पुस्तकीय ज्ञान तक उन्होंने नेताओं के भाषणों से सुना है। आज यदि विवेकानंद होते तो तो सोचते कि सम्भवतः भारत के पास कोई युवा विकल्प शेष ही नहीं है, जिससे उम्मीदें लगाई जा सकें। दूर-दूर तक दृष्टिपात करने पर सिवाय शून्य के कुछ नहीं दिखता। बरसों पहले आरक्षण के लिए उकसाई गई आत्मदाह की प्रवृत्ति से लेकर वर्तमान में अलगाववाद के नाम पर आजादी के लिए बरगलाए जा रहे भारतीय युवा तथाकथित असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कितना और भटकाए जाएंगे, कहा नहीं जा सकता। एक युवा में आक्रोश का होना प्राकृतिक प्रवृत्ति है, लेकिन उसके आक्रोश को हवा देना पूरी तरह नियंत्रित प्रक्रिया है। भारत में बेरोजगारी और उच्च महत्वाकांक्षाओं से जन्मे इस युवा आक्रोश के साथ हो रहा खिलवाड़ भी उसको सद्मार्ग से भटकाव का एक कारण है। इन सभी भटकावों की जड़ें बीमार होती जा रही राजनीतिक सोच पर जाकर ठहरती हैं।

राजनीतिक पार्टियां, उनके नेतागण और उनकी सत्तालोलुप प्रकृति युवाओं को अपना शिकार बना रही है। ये बात वे भी भलीभांति जानते हैं, लेकिन अफसोस यह है कि युवापीढ़ी इसे समझ नहीं पा रही है। तात्कालिक प्रसिद्धि से लेकर क्षणिक तुष्टीकरण का लोभ युवाओं में कोई गम्भीर राजनैतिक सोच पनपने ही नहीं दे पा रहा है। आज जो युवा राजनीति में हैं, उनमें बौद्धिकता का परिचय ढूँढ़ पाना अत्यंत दुर्लभ है, क्योंकि जो बौद्धिक हैं, वे या तो देश से बाहर हैं या देश में रहकर भी देशहितों के कार्यों से कहीं अलिप्त से हैं। राष्ट्र और राजनीति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि राष्ट्र का समग्र विकास अन्य क्षेत्रों जैसे आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक विषयों के राजनीतिक संबंधों में समाहित होता है। इन सभी विषयों के प्रति देश के युवाओं की जागृति देश के विकास, कल्याण और उद्धार में बहुत मायने रखती है। देशभक्त व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सदस्यता नहीं लेनी पड़ती, उसका नागरिक होना ही पर्याप्त होता है। बस समस्या यह खड़ी हो गई है कि नागरिक तो सभी हैं, पर सच्चे देशभक्त कितने हैं, कह पाना इसलिए मुश्किल हो रहा है, क्योंकि देशभक्ति की मानक परिभाषा विचलित कर दी गई है। यहां तक कि जब आजादी को ही नए सिरे से परिभाषित किया जाने लगा है, तो 15 अगस्त 1947 के दिन को भी इन चंद लोगों ने परिहास के कटघरे में खड़ा कर दिया है और वे लोग जिन्होंने इस आजादी के लिए अपना सर्वस्व निःस्वार्थ स्वाहा किया, वे इनके लिए क्या मायने रखते हैं, वे स्वयं ठीक ठीक नहीं बता पाते।

आज बरगलाया युवा चीखता है, उसे अन्याय-शोषण व आर्थिक विषमता से आज़ादी चाहिए। लेकिन कभी संविधान को जाना ही नहीं, सिर्फ चंद लोगों ने कहा तुम ऐसा बोलो बाकी हम सम्भाल लेंगे, वे बोलने लगते हैं। बोलते जाते हैं और साथ में कहते हैं हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। कितना विरोधाभास है, देश और संविधान का ऐसा तिरस्कार, युवाशक्ति से उम्मीदें कैसे बाँधेगा देश। कभी कभी लगता है देश की गुमराह युवाशक्ति के एक समूह ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को देशद्रोह के अधिकार के रूप में परिभाषित कर लिया है। वे देशभक्ति की अपेक्षा देशद्रोह में अधिक विश्वास रखने लगे है। अपसंस्कृति और हिंसा को अपना आदर्श घोषित करने में उनको तनिक भी लज्जा नहीं आती। इस सबमें उनका कसूर भी नहीं है, क्योंकि पाठ उन्होंने वैसा पढ़ा है। उनके जुनून को गलत दिशा देने वाले सबसे बड़े अपराधी हैं। ये ही वे राजनेता हैं जो नेपथ्य से युवाओं को संरक्षण और पोषण देकर अपने निजी स्वार्थों के लिए राष्ट्रविरोधी और आतंकवादी गतिविधियों को परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन दे रहे हैं। भारत की सम्प्रभुता एवं अखण्डता के विरुद्ध षड्यंत्र रचने वाले युवाओं का किस बखूबी से इस्तेमाल करते जा रहे हैं और युवा को पता ही नहीं चल पा रहा है। यह भारतीय युवापीढ़ी के पतन की पराकाष्ठा है। इसे क्षितिजों तक बढ़ने से रोकना होगा अन्यथा मुठ्ठी में बंद रेत की तरह एक तरफ देश के विकास के लिए हो रहे काम हाथ से फिसलते जाएंगे और हासिल की आई शून्य होने में देर नहीं लगेगी।

आवश्यकता इस बात की है कि जो लोग इस बात को समझ पा रहे हैं कि युवा भटकाए जा रहे हैं और उनमें से कुछ निकृष्टसीमा तक भटक भी चुके हैं, उनको सद्मार्ग पर लाने आवश्यकता है। तभी विवेकानंद के जन्मदिवस को युवादिवस के रुप में मनाया जाना सार्थक हो सकेगा, वरना तो विवेकानंद देख ही रहे होंगे कि भारत का युवा किस मार्ग पर भटक रहा है।

(डॉ. शुभ्रता मिश्रा वास्को-द-गामा, गोवा स्थित लेखिका और कवि हैं।)

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