पेगासस और किसान आंदोलन पर जारी है हंगामा

देश आज की स्थिति का उदाहरण देते हुए विपक्ष का कहना होता हैं कि लगभग 47 वर्ष पहले विपक्षी पार्टी के नेताओं की बैठक का फोन टेप अमरीकी तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कराया था इसका खुलासा होने पर उन्हें अपने पद से हटना पड़ा था । आज भी अमरीकी राष्ट्रपति की इस घटना को “वाटरगेट कांड ” के नाम से लोग याद करते हैं ।

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पेगासस जासूसी कांड का मुद्दा सड़क से संसद तक फिलहाल गर्माया है। कर्नाटक के बेंगलुरु में पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के चेहरे वाले मुखौटे पहनकर हाथ में दूरबीन के साथ विरोध प्रदर्शन करते कांग्रेस कार्यकर्ता। (फाइल फोटो)

जिस प्रकार से 19 जुलाई से संसद में हंगामा और गतिरोध देखने को मिल रहा है, उसके बाद तो यही लग रहा है कि 2021 के संसद का मानसून सत्र बिना किसी काम काज के हंगामे में ही निकल जाएगा। मानसून सत्र के शुरू होते ही विपक्ष सरकार से मांग करने लगे हैं कि पेगासस जासूसी मामले की सर्वदलीय संसदीय समिति से जांच कराई जाए अथवा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अगुवाई में जांच समिति का गठन किया जाय साथ ही किसान जो महीनों से जगह जगह अपने ऊपर थोपे गए तीन कानून को रद्द कराने की मांग पर अड़े हुए हैं, उसपर निर्णय लिया जाए । उनका यह भी कहना है कि जब तक पेगासस जासूसी मामले की जांच और किसानों पर लादे गए तीनों काले कानून को रद्द नहीं किया जाता , वह संसद को चलने नही देंगे । पेगासस जासूसी प्रकरण पर वैसे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस श्री एनवी रमण की बेंच के समक्ष पत्रकार एन राम की याचिका को दायर करते हुए अनुरोध किया है की इस प्रकरण की जांच कराने के आदेश दें । जिसपर जस्टिस रमण ने कहा की वह इस पर सुनवाई अगले सप्ताह करेंगे ।

अभी पिछले सप्ताह जब से पेगासस स्पाइवेयर जासूसी प्रकरण का मामला सामने आया है, उससे देश में भारी उथल पुथल मचा हुआ है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी ने इसको लेकर संसद परिसर में धरना भी दिया। कहा कि उनका भी फोन टैप हुआ है। विपक्षी सासंदों का विरोध सदन और सदन के बाहर जारी है। संसद परिसर में महात्मा गांधी के प्रतिमा के सामने रोज सांसदों को हाथों में बैनर और तख्ती लिए देखा जा सकता है। इस प्रकरण के बाद पत्रकार भी दो गुटों में विभाजित हो गए हैं । एक पक्ष अपने को पाक – साफ मानते हुए कहता हैं कि जो दागी है उसे ही डर होना चाहिए । दूसरा पक्ष , उनके स्तंभकार और सत्तारूढ़ दल का प्रतिनिधित्व करने वाले पत्रकारों का कहना है कि इससे देश की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं फिर गृह मंत्री से इस्तीफा क्यों मांगा जा रहा है ? राहुल गांधी उनसे इस्तीफा क्यों मांग रहे हैं ? अभी अभी पेगासस और किसान आंदोलन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी केंद्रीय सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है की दोनो मामले पर शीघ्र निर्णय ले नही तो “खेला होवे” को देशभर में वह साकार करेगी ।

एक तरह से यह ठीक है। हर किसी को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार हमारे संविधान ने अपने नागरिकों को दिया, परंतु अभिव्यक्ति का अर्थ यह नहीं होता कि आप अपने विवेक को ताक पर रख दें और विरोधियों के प्रति अपना कुतर्क देकर समाज को भ्रमित करें । यह बात हर किसी को पता है कि देश की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा गृहमंत्री का होता है इसी कारण उनके अधीन रॉ , सी बी आई तथा जितने भी नागरिक सुरक्षा के विभाग होते हैं उन सबका नेतृत्व गृह मंत्रालय द्वारा गृहमंत्री के अधीन होता है। तो फिर पेगासस का जो गंभीर प्रकरण राष्ट्रीय सुरक्षा को भेदकर देश में तूफान खड़ा कर दिया है उसे किसकी कमजोरी जनता कहेगी और विपक्ष क्यों नही सुलगेगा ? फिर यह कहना की विपक्षी नेता बिना सबूत के आसमान में लाठी भांज रहे हैं जिसका कोई लाभ उन्हे मिलने वाला नही है । तो , भारतीय सत्तारूढ़ दल यह क्यों नहीं मानने को तैयार हैं कि यह पर्दाफाश केवल भारतीय मीडिया द्वारा ही नहीं हुआ है, बल्कि विश्व के कई बड़े मीडिया समूह द्वारा किया गया है – फिर उन्हें कैसे झुठलाया जा सकता है । यदि हम विश्व के सारे मीडिया को ही दोषी और झूठा करार दे देंगे, तो इसका कोई क्या जबाव दे सकता है । यदि कुछ हुआ ही नहीं और मीडिया अकारण हल्ला करके देश की शांति व्यवस्था को भंग कर रहा है तो इसकी सत्यता की भी जांच कौन करेगा ? निश्चित रूप से इसकी जांच करने का वैधानिक अधिकार केवल सरकार को हैं फिर सरकार इसकी जांच क्यों नहीं करा रही है। जांच में यह आना -कानी क्यों ? फ्रांस और इसराइल ने अपने यहां इस मुद्दे की जांच कराने का निर्णय लिया है।

इस बात को समझने का बहुत प्रयास किया कि यदि पेगासस जासूसी प्रकरण जैसा कोई कांड भारत में हुआ है तो उसकी जांच कराने को सरकार तैयार क्यों नहीं हो रही है ? संदेह इसलिए होता है कि एनएसओ नामक इजराइली कंपनी जो पेगासस सॉफ्टवेयर बेचती उसका कहना है कि वह अपना सॉफ्टवेयर केवल सरकार को ही बेचती है , वह भी इसलिए की वह देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इसका प्रयोग करें । अब विपक्ष का कहना है कि यदि इसराइल की उस कंपनी का कहना माना जाए तो फिर भारत सरकार इस बात को स्वीकार क्यों नहीं करती और इसका जवाब भारतीय नागरिक को क्यों नहीं देती । यदि भारत सरकार ने इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल नहीं किया तो फिर भारतीय सुरक्षा को भेदकर यह सॉफ्टवेयर सैकड़े लोगों के फोन किस कारण से कैसे बिना अनुमति के टैप किए गए ? इसे कोई कैसे स्वीकार कर लेगा की पेगासस भारत में घुसकर स्वतः कैसे काम करने लगा ? तर्क तो लोकतंत्र का नियम है । यहां तक की जब महाभारत युद्ध शुरू होने जा रहा था तो अर्जुन ने हताश होकर अपने हाथ से प्रतापी धनुष गांडीव को जमीन पर रखकर भगवान कृष्ण से तर्क करना शुरू कर दिया , जब की अर्जुन जानते थे श्रीकृष्ण साक्षात परब्रह्म हैं , लेकिन अर्जुन ने हर एक बात पर भगवान श्रीकृष्ण से तर्क किया और जब तक उनकी बात समझ में नहीं आई वह प्रश्न दर प्रश्न करते रहे । आज भी हम उसी भारतवर्ष में रहते हैं, लेकिन आज हमारे बीच कोई श्रीकृष्ण नही जो हमारे तर्कों और शंकाओं को सुनकर उसका सही समाधान करे । यदि हम आज तर्क करते हैं तो हो सकता है की हमें सलाखों के पीछे वर्षों सड़ना पड़े । क्या यही हमारा लोकतंत्र है ? देश में बड़ी से बड़ी घटना घट जाए और सत्तारूढ़ दल अपना बचाव करते हुए बचकर निकल जाए कहे की यह सब झूठ है और इसकी जांच नही होगी । अब तो होता यह है की यदि आप प्रश्न करें तो आप पर ही उल्टा प्रश्न उछाल दिया जाता है और आपको मुद्दों से भटका दिया जाएगा ।

देश की जनता को इस बात पर संदेह होता है कि लोकतंत्र होते हुए भी सरकार द्वारा सच कभी भी जनहित में सामने नहीं लाया जाता है । सामान्य नागरिकों का यह कहना है कि हमारा भारत लोकतांत्रिक देश है जिसको हमारे संविधान निर्माताओं ने बड़ी गहनता से विचार करने के बाद देश को सौंपा है, जिसे अब सत्तारूढ़ नेतृत्व ने लगभग खत्म करने का माहौल बना दिया है । देश आज की स्थिति का उदाहरण देते हुए विपक्ष का कहना होता हैं कि लगभग 47 वर्ष पहले विपक्षी पार्टी के नेताओं की बैठक का फोन टेप अमरीकी तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कराया था इसका खुलासा होने पर उन्हें अपने पद से हटना पड़ा था । आज भी अमरीकी राष्ट्रपति की इस घटना को “वाटरगेट कांड ” के नाम से लोग याद करते हैं । लेकिन, हमारा भारत अमेरिका जैसा विकसित नही है, लिहाजा हमारे देश में ऐसा हो सकेगा – यह अविश्वनीय है । हमारा नारा विश्व गुरु बनने का है , पर क्या इन सारी स्थितियों के बाद यह संभव है ? हम अपने किसानों की बात करते है, लेकिन उनके साथ न्याय कहां कर पा रहे हैं । अभी आठ महीने से दिल्ली और देश के सभी राज्यों को घेरकर अपनी मांग मनवाना चाहते हैं । वह अपने परिवार, घर- द्वार छोड़कर सर्दी- गर्मी , भरी बरसात और कोरॉना जैसी महामारी में सरकार द्वारा बनाए गए तीन कानून को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। पर, सरकार के पास इतना समय नहीं कि इन अन्नदाताओं का ख्याल करे । जानबूझकर साजिशन उन्हे आतंकी , पाकिस्तानी और चीन समर्थक कहकर अपमानित और जलील किया जाता है । हां, यह ठीक है की किसान आंदोलन में कुछ अराजक तत्व घुस आए थे , जो अब पुलिस की गिरफ्त में हैं । क्या इसकी जानकारी विश्व के अन्य देशों को नही होगी की जो भारत सरकार अपने किसानों सहित अपने जनता का ख्याल नही रखे क्या वह विश्वगुरु बनने के योग्य है ? हद हो गईं सरकार के इस अड़ियल रवैया का । न तो वह किसी घटना की जांच कराएगी न ही किसी धरना प्रदर्शन करने वालों की बात सुनेगी , अपने समाज के हित के लिए काम करने वालों, उसके लिए सरकार से प्रश्न करने वालों को जेल भेज देगी , अपनी आलोचना से छटपटाकर पत्रकारों को जेल में ठूंस देगी तो फिर यह देश किसका है ? काश इन सारे प्रश्नों का उत्तर यदि सरकार जनहित में देगी तो इससे समाज को संतुष्टि होगी ,लेकिन क्या ऐसा इस सरकार से संभव है ? जैसा कि लोग अब कहने लगे हैं कि जुमलेबाजी से पेट नहीं भरता और आप कब तक उन्हें बरगलाते रहेंगे ?

जिस प्रकार से 19 जुलाई से संसद में हंगामा और गतिरोध देखने को मिल रहा है, उसके बाद तो यही लग रहा है कि 2021 के संसद का मानसून सत्र बिना किसी काम काज के हंगामे में ही निकल जाएगा । मानसून सत्र के शुरू होते ही विपक्ष सरकार से मांग करने लगे हैं कि पेगासस जासूसी मामले की सर्वदलीय संसदीय समिति से जांच कराई जाए अथवा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अगुवाई में जांच समिति का गठन किया जाय साथ ही किसान जो महीनों से जगह जगह अपने ऊपर थोपे गए तीन कानून को रद्द कराने की मांग पर अड़े हुए हैं, उसपर निर्णय लिया जाए । उनका यह भी कहना है कि जब तक पेगासस जासूसी मामले की जांच और किसानों पर लादे गए तीनों काले कानून को रद्द नहीं किया जाता , वह संसद को चलने नही देंगे । पेगासस जासूसी प्रकरण पर वैसे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस श्री एनवी रमण की बेंच के समक्ष पत्रकार एन राम की याचिका को दायर करते हुए अनुरोध किया है की इस प्रकरण की जांच कराने के आदेश दें । जिसपर जस्टिस रमण ने कहा की वह इस पर सुनवाई अगले सप्ताह करेंगे ।

अभी पिछले सप्ताह जब से पेगासस स्पाइवेयर जासूसी प्रकरण का मामला सामने आया है, उससे देश में भारी उथल पुथल मचा हुआ है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी ने इसको लेकर संसद परिसर में धरना भी दिया। कहा कि उनका भी फोन टैप हुआ है। विपक्षी सासंदों का विरोध सदन और सदन के बाहर जारी है। संसद परिसर में महात्मा गांधी के प्रतिमा के सामने रोज सांसदों को हाथों में बैनर और तख्ती लिए देखा जा सकता है। इस प्रकरण के बाद पत्रकार भी दो गुटों में विभाजित हो गए हैं । एक पक्ष अपने को पाक – साफ मानते हुए कहता हैं कि जो दागी है उसे ही डर होना चाहिए । दूसरा पक्ष , उनके स्तंभकार और सत्तारूढ़ दल का प्रतिनिधित्व करने वाले पत्रकारों का कहना है कि इससे देश की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं फिर गृह मंत्री से इस्तीफा क्यों मांगा जा रहा है ? राहुल गांधी उनसे इस्तीफा क्यों मांग रहे हैं ? अभी अभी पेगासस और किसान आंदोलन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी केंद्रीय सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है की दोनो मामले पर शीघ्र निर्णय ले नही तो “खेला होवे” को देशभर में वह साकार करेगी ।

एक तरह से यह ठीक है। हर किसी को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार हमारे संविधान ने अपने नागरिकों को दिया, परंतु अभिव्यक्ति का अर्थ यह नहीं होता कि आप अपने विवेक को ताक पर रख दें और विरोधियों के प्रति अपना कुतर्क देकर समाज को भ्रमित करें । यह बात हर किसी को पता है कि देश की आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा गृहमंत्री का होता है इसी कारण उनके अधीन रॉ , सी बी आई तथा जितने भी नागरिक सुरक्षा के विभाग होते हैं उन सबका नेतृत्व गृह मंत्रालय द्वारा गृहमंत्री के अधीन होता है। तो फिर पेगासस का जो गंभीर प्रकरण राष्ट्रीय सुरक्षा को भेदकर देश में तूफान खड़ा कर दिया है उसे किसकी कमजोरी जनता कहेगी और विपक्ष क्यों नही सुलगेगा ? फिर यह कहना की विपक्षी नेता बिना सबूत के आसमान में लाठी भांज रहे हैं जिसका कोई लाभ उन्हे मिलने वाला नही है । तो , भारतीय सत्तारूढ़ दल यह क्यों नहीं मानने को तैयार हैं कि यह पर्दाफाश केवल भारतीय मीडिया द्वारा ही नहीं हुआ है, बल्कि विश्व के कई बड़े मीडिया समूह द्वारा किया गया है – फिर उन्हें कैसे झुठलाया जा सकता है । यदि हम विश्व के सारे मीडिया को ही दोषी और झूठा करार दे देंगे, तो इसका कोई क्या जबाव दे सकता है । यदि कुछ हुआ ही नहीं और मीडिया अकारण हल्ला करके देश की शांति व्यवस्था को भंग कर रहा है तो इसकी सत्यता की भी जांच कौन करेगा ? निश्चित रूप से इसकी जांच करने का वैधानिक अधिकार केवल सरकार को हैं फिर सरकार इसकी जांच क्यों नहीं करा रही है। जांच में यह आना -कानी क्यों ? फ्रांस और इसराइल ने अपने यहां इस मुद्दे की जांच कराने का निर्णय लिया है।

इस बात को समझने का बहुत प्रयास किया कि यदि पेगासस जासूसी प्रकरण जैसा कोई कांड भारत में हुआ है तो उसकी जांच कराने को सरकार तैयार क्यों नहीं हो रही है ? संदेह इसलिए होता है कि एनएसओ नामक इजराइली कंपनी जो पेगासस सॉफ्टवेयर बेचती उसका कहना है कि वह अपना सॉफ्टवेयर केवल सरकार को ही बेचती है , वह भी इसलिए की वह देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इसका प्रयोग करें । अब विपक्ष का कहना है कि यदि इसराइल की उस कंपनी का कहना माना जाए तो फिर भारत सरकार इस बात को स्वीकार क्यों नहीं करती और इसका जवाब भारतीय नागरिक को क्यों नहीं देती । यदि भारत सरकार ने इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल नहीं किया तो फिर भारतीय सुरक्षा को भेदकर यह सॉफ्टवेयर सैकड़े लोगों के फोन किस कारण से कैसे बिना अनुमति के टैप किए गए ? इसे कोई कैसे स्वीकार कर लेगा की पेगासस भारत में घुसकर स्वतः कैसे काम करने लगा ? तर्क तो लोकतंत्र का नियम है । यहां तक की जब महाभारत युद्ध शुरू होने जा रहा था तो अर्जुन ने हताश होकर अपने हाथ से प्रतापी धनुष गांडीव को जमीन पर रखकर भगवान कृष्ण से तर्क करना शुरू कर दिया , जब की अर्जुन जानते थे श्रीकृष्ण साक्षात परब्रह्म हैं , लेकिन अर्जुन ने हर एक बात पर भगवान श्रीकृष्ण से तर्क किया और जब तक उनकी बात समझ में नहीं आई वह प्रश्न दर प्रश्न करते रहे । आज भी हम उसी भारतवर्ष में रहते हैं, लेकिन आज हमारे बीच कोई श्रीकृष्ण नही जो हमारे तर्कों और शंकाओं को सुनकर उसका सही समाधान करे । यदि हम आज तर्क करते हैं तो हो सकता है की हमें सलाखों के पीछे वर्षों सड़ना पड़े । क्या यही हमारा लोकतंत्र है ? देश में बड़ी से बड़ी घटना घट जाए और सत्तारूढ़ दल अपना बचाव करते हुए बचकर निकल जाए कहे की यह सब झूठ है और इसकी जांच नही होगी । अब तो होता यह है की यदि आप प्रश्न करें तो आप पर ही उल्टा प्रश्न उछाल दिया जाता है और आपको मुद्दों से भटका दिया जाएगा ।

देश की जनता को इस बात पर संदेह होता है कि लोकतंत्र होते हुए भी सरकार द्वारा सच कभी भी जनहित में सामने नहीं लाया जाता है । सामान्य नागरिकों का यह कहना है कि हमारा भारत लोकतांत्रिक देश है जिसको हमारे संविधान निर्माताओं ने बड़ी गहनता से विचार करने के बाद देश को सौंपा है, जिसे अब सत्तारूढ़ नेतृत्व ने लगभग खत्म करने का माहौल बना दिया है । देश आज की स्थिति का उदाहरण देते हुए विपक्ष का कहना होता हैं कि लगभग 47 वर्ष पहले विपक्षी पार्टी के नेताओं की बैठक का फोन टेप अमरीकी तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कराया था इसका खुलासा होने पर उन्हें अपने पद से हटना पड़ा था । आज भी अमरीकी राष्ट्रपति की इस घटना को “वाटरगेट कांड ” के नाम से लोग याद करते हैं । लेकिन, हमारा भारत अमेरिका जैसा विकसित नही है, लिहाजा हमारे देश में ऐसा हो सकेगा – यह अविश्वनीय है । हमारा नारा विश्व गुरु बनने का है , पर क्या इन सारी स्थितियों के बाद यह संभव है ? हम अपने किसानों की बात करते है, लेकिन उनके साथ न्याय कहां कर पा रहे हैं । अभी आठ महीने से दिल्ली और देश के सभी राज्यों को घेरकर अपनी मांग मनवाना चाहते हैं । वह अपने परिवार, घर- द्वार छोड़कर सर्दी- गर्मी , भरी बरसात और कोरॉना जैसी महामारी में सरकार द्वारा बनाए गए तीन कानून को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। पर, सरकार के पास इतना समय नहीं कि इन अन्नदाताओं का ख्याल करे । जानबूझकर साजिशन उन्हे आतंकी , पाकिस्तानी और चीन समर्थक कहकर अपमानित और जलील किया जाता है । हां, यह ठीक है की किसान आंदोलन में कुछ अराजक तत्व घुस आए थे , जो अब पुलिस की गिरफ्त में हैं । क्या इसकी जानकारी विश्व के अन्य देशों को नही होगी की जो भारत सरकार अपने किसानों सहित अपने जनता का ख्याल नही रखे क्या वह विश्वगुरु बनने के योग्य है ? हद हो गईं सरकार के इस अड़ियल रवैया का । न तो वह किसी घटना की जांच कराएगी न ही किसी धरना प्रदर्शन करने वालों की बात सुनेगी , अपने समाज के हित के लिए काम करने वालों, उसके लिए सरकार से प्रश्न करने वालों को जेल भेज देगी , अपनी आलोचना से छटपटाकर पत्रकारों को जेल में ठूंस देगी तो फिर यह देश किसका है ? काश इन सारे प्रश्नों का उत्तर यदि सरकार जनहित में देगी तो इससे समाज को संतुष्टि होगी ,लेकिन क्या ऐसा इस सरकार से संभव है ? जैसा कि लोग अब कहने लगे हैं कि जुमलेबाजी से पेट नहीं भरता और आप कब तक उन्हें बरगलाते रहेंगे ?

Nishikant Thakur, Journalist, Jansatta News
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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