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आदरणीय राम नाइक जी अपना नाम राम दामोदर नाइक या रामा क्यों नहीं लिखते?

यूपी सरकार ने भीमराव अंबेडकर का नाम भीमराव राम अंबेडकर कर दिया है। अभी-अभी जेहन में एक सवाल कौंधा है कि आदरणीय राम नाइक जी अपना नाम राम नाइक क्यों लिखते हैं? राम दामोदर नाइक क्यों नहीं?

Author नई दिल्ली | March 30, 2018 3:50 PM
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक। (फाइल फोटो)

यूपी सरकार ने भीमराव अंबेडकर का नाम भीमराव राम अंबेडकर कर दिया है। अभी-अभी जेहन में एक सवाल कौंधा है कि आदरणीय राम नाइक जी अपना नाम राम नाइक क्यों लिखते हैं? राम दामोदर नाइक क्यों नहीं? या रामा क्यों नहीं लिखते, जिस नाम से उनकी दादी या चाची उन्हें पुकारती रही होंगी, या दादा क्यों नहीं लिखते, जिस नाम से उनका छोटा भाई या मुहल्ले वाले पहले उन्हें पुकारा करते होंगे, या रमिया क्यों नहीं लिखते, जिस नाम से उनके बचपन के संगी-साथी उन्हें गली में खेलने के लिए घर के नीचे खड़े होकर बुलाते रहे होंगे। राम नाइक ही क्यों? सवाल अब अपने पंख इस क़दर खोल रहा है और वो मेरे नथुनों में घुस रहा है कि उलझन हो रही है। सोचता हूं कि हमें अपना नाम कैसे और क्या लिखना है, ये कौन तय करेगा?

मेरे एक परिचित थे, शायद प्रभाकर आप्टे नाम था (नाम में भूल संभव है)। बैंक ऑफ महाराष्ट्र के नरीमन प्वाइंट ब्रांच में काम करते थे। वो अपने हस्ताक्षर में P के आगे एक चोंच जोड़ते हुए उसके पीछे पेन को ईसीजी की तर्ज पर ऐसे डान्स कराते थे कि उनका फाइनल सिग्नेचर एक बत्तख जैसी कोई आकृति बन जाता था। सोच रहा हूं कि अब मैं उनको किस नाम से पुकारूं? वो जो हस्ताक्षर के चित्र में उभरा है बत्तख आप्टे या वो जो सरकार के अध्यादेश या आदेश के जोड़-जुगाड़ के हिसाब से शक्ल ले रहा है, या वो जो गवर्नर साहब चाहते हैं, या फिर वो जो मैं चाहता हूं। अथवा वह नाम जो वो चाहते हैं।

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सोचता हूं कि आदरणीय गवर्नर साहब भविष्य में गुलज़ार, स्वामी रामदेव, अक्षय कुमार, राजेश खन्ना, दिलीप कुमार, कुमार शानू, अन्ना हज़ारे इत्यादि को क्या पुकारेंगे। क्या आपको कुछ पता चला है कि इन सब के नामों पर आदेश या अध्यादेश कब तक आने वाला है। खैर, हो सकता है कि मेरा प्रश्न ही वाजिब ना हो। या ये सोचना मेरे अधिकार क्षेत्र में ही न हो, क्योंकि प्रश्न के फैलते पंखों के नाक में घुस जाने के कारण मुझे ही अब छींक-सी आने लगी है। मैं भी अब सोचने लगा हूं कि मैं आखिर ऐसे वाहियात सवाल उठा ही क्यों रहा हूं। इसके लिए तो सरकार है ही। हमने तो सरकार चुना ही इसलिए है कि वो हमारा नाम निर्धारित करे, हमारे सिम को आधार से जोड़े, हमारे पास क्या है, उसे खंगाले, हम क्या सोच रहे हैं, उसे तलाशे, हम क्या करें, न करें ये बताए। वो आदेश दे कि हम क्या गुनगुनाएं। हम वो ही खाएं, जो वो खिलाए।

छोड़िए, मुझे सवाल को छींक लेने दीजिए, क्योंकि मैं भारतीय तो हूं ही, साथ में आम आदमी भी हूं। डरपोक हूं। घबराता हूं कि कहीं सोचने के जुर्म में गिरफ़्तार न कर लिया जाऊं। लगता है कि मुझ अकेले को अभी बहुत काम करना है। स्कूल-कॉलेज खोलना है। अस्पताल बनाना है। सड़क, फ़्लाईओवर, समाज, विद्यार्थियों, मरीज़ों, बुज़ुर्गों सब के लिए बहुत काम मुझे ही तो करने हैं। जिस ठेकेदार को ये काम दिया था, वो तो हमारे दर्द को हमारा नृत्य समझ कर उसका आनन्द ले रहा है। यानी साहब हमारा नाच देख रहे हैं। लोकतंत्र का नाच।

नोट: यहां व्‍यक्‍त विचार लेखक के निजी हैं।

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