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आज भाजपा में सबसे ताकतवर हैं नरेंद्र मोदी, पर योगी आदित्‍यनाथ में है नरेंद्र मोदी की कुर्सी हिलाने का दम

मुख्यमंत्री बनते ही आज के राजनीतिक परिदृश्य में आदित्यनाथ का कद अब उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े भाजपा नेता के रूप में बन चुका है।
Author March 20, 2017 19:23 pm
योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री हैं। (एक्सप्रेस फोटो)

उत्तर प्रदेश में मिले प्रचंड बहुमत के बाद भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा रिस्क (जोखिम) लेते हुए कट्टर हिन्दूवादी छवि के नेता योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाया है। भाजपा के लिए यह बड़ा रिस्क इसलिए भी है क्योंकि योगी आदित्यनाथ अब तक गोरखपुर और पूर्वांचल में निर्विवाद रूप से बड़े नेता माने जाते रहे हैं। उनके दरबार में न केवल हिन्दू बल्कि मुस्लिम जनमानस भी उसी भाव और उम्मीद से जाते रहे हैं और लाभान्वित होते रहे हैं, जिस भावना और आकांक्षा के साथ एक हिन्दू फरियादी पहुंचता है। कहना न होगा कि गोरखपुर में महाराज यानी योगी आदित्यनाथ का सिक्का चलता रहा है। मुख्यमंत्री बनते ही आज के राजनीतिक परिदृश्य में आदित्यनाथ का कद अब उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े भाजपा नेता के रूप में बन चुका है। केन्द्रीय स्तर पर इतना बड़ा कद सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का है। यानी भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को एक कट्टर हिन्दूवादी छवि से निकालने के लिए बड़ा दांव चला है। इसके साथ ही पार्टी ने योगी को भाजपा की अगली पौध के रूप में भी तैयार करने के लिए दूर की कौड़ी फेंकी है।

1990 से लेकर 2010 के दशक में भाजपा में सबसे ताकतवर नेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी जानी जाती थी। तब नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक हैसियत कुछ नहीं थी। 2001 में वो पहली बार विधान सभा पहुंचे और मुख्यमंत्री बन गए। साल 2002 में हुए गुजरात दंगे के बाद नरेंद्र मोदी की छवि कट्टर हिन्दूवादी नेता के रूप में बनी। मोदी की यह छवि लंबे समय तक उनके साये की तरह पीछे पड़ी रही लेकिन चार बार गुजरात की बागडोर संभालने वाले इस शख्स ने धारे-धीरे अपनी छवि विकास पुरूष के रूप में स्थापित कर ली और साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले वो अपनी दमदार शख्सियत की बदौलत भाजपा की तरफ से देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो गए। तब उनके गुरू लालकृष्ण आडवाणी हाथ मलते रह गए।

नरेंद्र मोदी की छवि रूपांतरण की यात्रा कई कहानियां समेटे हुए है। आज की तारीख में देश में उनसे बड़ा, ताकतवर और दमदार शख्स कोई नहीं है लेकिन यक्ष प्रश्न यह भी है कि जब भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री (अटल-आडवाणी) की जोड़ी की जगह नरेंद्र मोदी ले सकते हैं तो आगे चलकर 2019 में न सही 2024 में ही कोई नरेंद्र मोदी की जगह क्यों नहीं ले सकता।

दरअसल, सीएम बनते ही योगी आदित्यनाथ से जुड़े कई राज बेपर्दा होने लगे हैं। मसलन, सबसे बड़ी बात यह कि योगी अब तक कट्टर हिन्दूवादी नेता की परिधि से बाहर नहीं निकल सके थे लेकिन एक अखबार ने छापा है कि योगी आदित्यनाथ के सबसे भरोसेमंद लोगों में पांच-सात मुस्लिम चेहरे हैं जो गोरखपुर में उनके रोज-रोज के कामकाज निपटाने में मदद करते हैं। इनके दरबार में मुस्लिम फरियादी भी आते रहे हैं, इस बात को कई लोगों ने डर की वजह से ऐसा होना बताया था जबकि अब सामने आ रहा है कि गोरखपुर में योगी की वैसी छवि है ही नहीं जैसी कि लोगों के बीच आम धारणा है। मुख्यमंत्री बनते ही योगी ने भी कहा कि समाज में किसी भी समुदाय से भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यानी पद पर बैठते ही योगी पंच परमेश्वर की भूमिका में नजर आने लगे हैं। अगर, उनकी सकारात्मक सोच और कार्य ने धरती पर असल रूप अख्तियार किया तो निश्चित तौर पर वो पीएम मोदी से लंबी लकीर खींचने में कामयाब हो सकते हैं क्योंकि जब तक मोदी गुजरात के सीएम रहे तब तक उनपर मुस्लिम विरोधी होने का तमगा लगा रहा। कई मौकों पर ऐसा देखने को भी मिला। खासकर जब एक मुस्लिम शख्स ने नरेंद्र मोदी को टोपी पहनाने की कोशिश की थी तब उन्होंने इससे इनकार कर दिया था।

योगी आदित्यनाथ ने अपनी सरकार में दो उप मुख्यमंत्री बनाए हैं। 17 ओबीसी चेहरों को जगह दी है। 6 दलितों समेत एक मुस्लिम और एक यादव चेहरे को भी जगह दी है। इसका मकसद साफ है कि योगी पार्टी के एजेंडे ‘सबका साथ, सबका विकास’ और अपने चुनावी घोषणा पत्र यानी लोक कल्याण संकल्प पत्र को धरातल पर उतारना चाहते हैं। प्रशासनिक और शासकीय कार्यों में किसी प्रकार की शिथिलता और लापरवाही न हो इसलिए योगी ने बड़े प्रदेश में दो उप मुख्यमंत्री तैनात कर सत्ता के विकेन्द्रीकरण और अन्य नेताओं पर जिम्मेदारी डालने, सबको साथ लेकर चलने का भी संकेत दिया है। जबकि गुजरात में नरेंद्र मोदी सत्ता के केन्द्र में अकेले थे। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पीएमओ में तैनात अपने सचिव नृपेन्द्र मिश्र को यूपी के विकास योजनाओं पर सीधी नजर रखने का निर्देश दिया है। इससे न केवल केन्द्र-राज्य समन्वय कायम रहेगा बल्कि विकास परियोजनाओं से संबंधित फाइलों का जल्द निपटारा भी हो सकेगा साथ ही प्रधानमंत्री मोदी यूपी की हर योजना पर सीधे नजर रख सकेंगे।

18 मार्च से पहले योगी आदित्यनाथ की चर्चा यूपी के मुख्यमंत्री की रेस में कहीं नहीं थी लेकिन 18 मार्च की दोपहर अचानक तमाम सियासी समीकरणों और अटकलों ने दम तोड़ दिया, जब योगी सीएम की रेस में न केवल आगे हो गए बल्कि आनन-फानन में उन्हें पहले दिल्ली फिर लखनऊ बुलाया गया और देर शाम तक उन्हें भाजपा विधायक दल का नेता चुन लिया गया। दरअसल, योगी के कट्टर माने जाने वाले समर्थक तब तक सड़कों पर उतर चुके थे और उन्हें सीएम बनाने की मांग कर रहे थे। लोग तो कहते हैं कि उनके समर्थक पहले सीएम और फिर पीएम बनाने की मांग कर रहे थे। इसबीच भाजपा के अंदरखाने जो सियासी खिचड़ी पक रही थी, तब तक उसने भी बर्तन बदल लिया था। अब मनोज सिन्हा की जगह सबों की जुबां पर योगी-योगी था।

दरअसल, योगी आदित्यनाथ हिन्दू युवा वाहिनी नाम का एक संगठन चलाते हैं जिसके कार्यकर्ता कट्टर माने जाते हैं। इस संगठन की जड़ें न केवल पूर्वांचल में बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में गहरी हैं। शायद पार्टी के बड़े नेताओं को यह आभास हुआ होगा कि योगी को नेतृत्व न दिया गया तो कुछ उल्टा-पुल्टा हो सकता है। अब खबर है कि योगी आदित्यनाथ उस संगठन का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करने जा रहे हैं। यानी आनेवाले वर्षों में 45 वर्षीय योगी राजनातिक, प्रशासनिक और सांगठनिक तौर पर और मजबूत होंगे जबकि 66 साल के पीएम नरेंद्र मोदी साल 2019 तक 68 साल के और साल 2024 तक 73 साल के हो चुके होंगे। यानि पीएम मोदी के ही शब्दों में वो रिटायरमेंट की उम्र में होंगे और तब तक योगी का कद विराट हो चुका होगा।

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