क्या हम तर्कशील जानवर हैं?

तर्कसंगतता या तर्कशीलता महत्वपूर्ण है, लेकिन एक आदमी को उसके वास्तविक अस्तित्त्व को घोषित करने के लिए सब कुछ नहीं। हर परिभाषा के लिए विशिष्ट परिस्थितियाँ होती हैं। किसी वस्तु, व्यक्ति, समाज अथवा संस्कृति की परिभाषा अपने समय और परिस्थितियों से निकलती है।

डॉ. वीर सिंह

दार्शनिकों ने मानव को अपनी कल्पनाओं में पिरोकर भांति-भांति प्रकार से परिभाषित और पुनर्परिभाषित किया है, उसके बारे में विविध दृष्टिकोण गढ़े हैं और तरह-तरह के “मानव-लोक” रचे हैं। दार्शनिक स्वयं इस दुनिया से अलग अपनी दार्शनिकता से रचित एक स्वप्नलोक में रहते हैं। प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने आदमी को एक तर्कशील जानवर की संज्ञा दी। मानव प्रजाति की यह अरस्तुई परिभाषा अभी भी पश्चिम में व्यापक रूप से स्वीकार की जाती है। इस संदर्भ में ‘तर्कशील’ शब्द बुद्धिमान का समानार्थी है।

इस प्रकार, यदि हम एक मानव की अरस्तुई परिभाषा को स्वीकृत करते हैं, तो हम अपने आप को केवल बुद्धिमान जानवर मानते हैं। हमें बुद्धिमान होने पर गर्व होगा, लेकिन जानवरों के साथ बराबरी करने में भी घृणा का भान होगा। एक जानवर, निसंदेह, अपने आप में एक गाली नहीं है, और कोई कारण नहीं है कि हमें जानवरों के साथ बराबरी करने में शर्म अथवा घृणा करनी चाहिए। पशु भी, हमारी तरह, सार्वभौमिक प्राकृतिक विकास की देन हैं। लेकिन, हमें स्वयं को जानवरों की श्रेणी से पृथक रखने की क्यों आवश्यकता है? इसका भी एक ठोस कारण है।

प्राकृतिक विकास द्वारा जानवरों में प्रविष्ट चेतना की अलग-अलग डिग्री है। लेकिन मानव प्रजाति एक विशिष्ट और, निस्संदेह, सार्वभौमिक विकास का सबसे विशिष्ट प्राणी है। यदि परिभाषा के अनुसार हम तर्कशील या बुद्धिमान जानवर कहे जाते हैं, तो हम या तो बुद्धिमान, या केवल जानवर होंगे। यदि हमें जानवरों के रूप में संदर्भित किया जाता है, तो ‘बुद्धिमान’ होना थोड़ा असहज और असुविधाजनक लगेगा। यदि हमें बुद्धिमान के रूप में संदर्भित किया जाता है, तो हम जानवर कहा जाना स्वीकार नहीं करेंगे।

मानव के प्राकृतिक विकास (इवोल्युशन)  के गहरे दृष्टिकोण से मानव की अरस्तुई परिभाषा ऐसी कोई विषय-वस्तु नहीं  जिसको लेकर हम अपनी प्रजाति पर गर्व कर सकें। यह हमारे लिए स्वयं को सार्वभौमिक विकास की उत्कृष्ट रचना के रूप में मानने में संकोच पैदा करने का प्रयास है। अरस्तु की मानव की इस लोकप्रिय परिभाषा के सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध पारिस्थितिक दर्शनशास्त्री हेनरिक स्कोलीमॉस्की का कहना है कि हम (मानव प्रजाति) तर्क और प्रजातियों के तर्कसंगत संकायों को समाप्त करने के लिए संसार में आए हैं।

मानवजाति के अरुस्ताई (अरिस्टोटेलियन) निष्कर्ष के अनुसार तर्कसंगतता मानव श्रेष्ठता का एकमात्र संकेतक है। तर्कसंगतता की धाक जितनी अधिक होगी, मनुष्य की स्थिति उतनी ही उच्च होगी। इंटेलिजेंस कोसेंट (आई क्यू), अर्थात बुद्धि लब्धि, श्रेष्ठता की स्थिति को मापने के लिए एक मानक तैयार किया गया है, जो प्रायः हास्यास्पद प्रतीत होता है। ऐसे उदाहरण हैं जिनका आईक्यू उच्च स्तर का पाया गया है, लेकिन वे अपराधी तक बन जाते हैं। इसलिए, दर्शन शास्त्री हेनरिक स्कोलिमोस्कि ने बुद्धि लब्धि के स्थान पर ‘करुणा योग्यता’ (कम्पासियन एप्टीट्यूड) की आवश्यकता पर जोर दिया। वे कहते हैं: “एक पल के प्रतिबिंब से  यह स्पष्ट हो जाना  चाहिए कि जो कोई भी दया और सहानुभूति से पूरी तरह से शून्य है वह कदाचित ही ‘मानव’ कहलाने का अधिकारी है।”

तर्कसंगतता या तर्कशीलता महत्वपूर्ण है, लेकिन एक आदमी को उसके वास्तविक अस्तित्त्व को घोषित करने के लिए सब कुछ नहीं। हर परिभाषा के लिए विशिष्ट परिस्थितियाँ होती हैं। किसी वस्तु, व्यक्ति, समाज अथवा संस्कृति की परिभाषा अपने समय और परिस्थितियों से निकलती है। उसी तरह, अरस्तू की परिभाषा उस समय उभरी जब तर्कशास्त्र एक विशिष्ट संकाय के रूप में क्रिस्टलीकृत हुआ, जिस पर उस कालखंड के यूनानियों को बहुत गर्व था। विशिष्ट परिस्थितियों में, कुछ विशेष शब्दों, वाक्यांशों या कथनों को अधिक महत्व मिलता है।

उदाहरण के लिए, हम पर्यावरण के प्रति मानव चिंता को ही ले लेते हैं। बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में पर्यावरण के अनेक मुद्दे दुनिया की चिंता और तर्कों के केंद्र में थे। इसी चिंता को केंद्र में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा गठित ब्रंटलैंड कमीशन की १९८७ की रिपोर्ट “आवर कॉमन फ्यूचर” (हमारा साझा भविष्य) ने सतत विकास की अवधारणा को जन्म दिया। “सतत विकास” (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) वाक्यांश अब कई अवधारणाओं में एक उपसर्ग बन गया; जैसे, सतत वानिकी, सतत कृषि, सतत गाँव, सतत समाज, सतत विश्व, इत्यादि। सततता, वास्तव में, हमारे समय का एक सार्वभौमिक मंत्र बन गया है जो हमें सुदूर भविष्य के चिंतन से  जोड़ता है।

अन्य उदाहरण “पारिस्थितिकी” है।  यह शब्द 1867 में जर्मन जीवविज्ञानी अर्नेस्ट हैकेल द्वारा गढ़ा गया था। इस शब्द को लोकप्रिय होने के लिए लगभग 100 वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। पारिस्थितिकी 1960 के दशक से लोकप्रिय होने लगी जब परतावरण संकट और प्राकृतिक आपदाएं एक सार्वभौमिक  मानवीय चिंता के रूप में उभरने लगीं। 1974 में हेनरिक स्कोलीमोस्की ने “इको-फिलॉसफी” शब्द की उत्पत्ति की, जिसने मानवीय विवेक में क्रांति ला दी और पारिस्थितिक आपदाओं को तीव्र करने के विरुद्ध हमारी चेतना को जागृत किया।

अपने इको-दार्शनिक प्रवचन में, स्कोलीमॉस्की ने पारिस्थितिक न्याय, पारिस्थितिक चेतना, पारिस्थितिक सोच, पारिस्थितिक उपचार, पारिस्थितिक नैतिकता, पारिस्थितिक मन, पारिस्थितिक युग, पारिस्थितिक मनुष्य, और पारिस्थितिक धर्म जैसे कई वाक्यांशों की उत्पत्ति की। अब, पारिस्थितिक अर्थशास्त्र, पारिस्थितिक कृषि, पारिस्थितिक विकास, पारिस्थितिक परिप्रेक्ष्य, पारिस्थितिक सुरक्षा, आदि शिक्षा, अनुसंधान, विकास प्रवचनों और दैनिंदिन की जिंदगी में प्रायः प्रयुक्त किए जाने वाले शब्द हैं। पारिस्थितिक विकास वास्तविक अर्थों में, स्थायी विकास है। मैंने पारिस्थितिक अखंडता की अवधारणा को विकसित करने का प्रयास किया है। पारिस्थितिक अखंडता स्थिरता का सार है। इस तरह, पारिस्थितिकी पर जोर हमारी समकालीन परिस्थितियों से पैदा हुआ है।

आइए अब हम मनुष्य की एक और परिभाषा पर ध्यान दें। यह परिभाषा औद्योगिक युग के गोरखधंधों से तारतम्य रखती है। औद्योगिक युग मानव का ही एक ‘मानस शिशु’ है, जिसने ऐसी भिन्न परिस्थितियों को जन्म दिया जिससे पूर्व का सब छिन्न-भिन्न हो गया। औद्योगिक युग में, उपकरण और मशीनें मानव पर्यावरण पर हावी रहीं हैं। उद्योगों का डंका बजा तो मानव को “होमो फैबर”, या “टूल-मेकर”  के रूप में परिभाषित किया जाना प्रारम्भ हुआ।

जब औद्योगिक क्रांति अपनी पराकाष्ठा पर थी, तब यह धारणा उभर कर सामने आई थी और हम यन्त्र निर्माण करने और उनका उपयोग करने की अपार क्षमताओं से नशे में चूर हो गए थे। मानव के मानसिक यंत्रीकरण प्रक्रिया को रेखांकित करती यह परिभाषा लम्बे समय तक अपना स्थान नहीं बना पाई। हाँ, ‘तर्कशील जानवर’ की अनुगूंज इक्कीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भी बनी हुई है, और समकालीन धर्म-अधर्म और तर्क-कुतर्क की धुंध में और भी स्पष्ट सुनाई पड़ रही है।

(लेखक जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे और इन द‍िनों कनाडा में रह रहे हैं।)

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