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प्रवीण स्वामी का ब्लॉग: बलूचिस्तान को हवा देने में भारत को फायदा कम नुकसान ज्यादा है

हो सकता है कि युद्धप्रेमी लोगों को बलूचिस्तान के रूप में बदला लेने के बात पसंद आए लेकिन भारत के लिए ये उचित विकल्प नहीं है।

Author नई दिल्ली | Updated: August 16, 2016 5:20 PM
सोमवा को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले से देश को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण के अंत में बलूचिस्तान का फुटनोट की तरह जिक्र किया। इस पर अब एक विस्फोटक बहस होने की पूरी संभावना है. पाकिस्तान लंबे समय से भारत पर बलूच उग्रपंथियों को मदद देने का आरोप लगाता रहा है। कथित भारतीय जासूस कुलभूषण जाधव की पाकिस्तान में गिरफ्तारी के समय भी ये आरोप उछला था। पाकिस्तान ने इस बाबत सुबूत तो दिए लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय उससे मुतमईन नहीं हुआ।

भू-राजनीति के तमाम दूसरे मसलों की तरह मोदी के बयान का संदर्भ ही असल है। भारत के वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल ने साल 2014 में एनएसए बनने से कुछ ही समय पहले पाकिस्तान द्वारा अपनाए जाने वाले युद्ध के गैर-परंपरागत तरीकों से निपटने पर राय रखी थी। डोभाल ने कहा था कि भारत के “रक्षात्मक-आक्रमण” के बचाव में पाकिस्तान को परमाणु हथियार से कोई मदद नहीं मिलेगी। दूसरे शब्दों में कहें तो वो “पाकिस्तान की कमजोरियों पर काम करने” की तरफ इशारा कर रहे थे। डोभाल ने इसे विस्तृत रूप से नहीं समझाया लेकिन उन्होंने एक सारगर्भित पंक्ति में कहा, “आप एक मुंबई कर सकते हैं, आप बलूचिस्तान खो सकते हैं।”

उस भाषण के बाद से ही इस विचार को जगह मिलने लगी कि भारत कश्मीर में पाकिस्तान के छद्म युद्ध का जैसे को तैसा की तर्ज पर जवाब देने के लिए बूलचिस्चान के नस्ली-राष्ट्रवादी अलगाववाद को बढ़ावा दे सकता है। सरकार के शामिल कुछ लोगों को छोड़कर किसी को भी इस मसले की जमीनी हकीकत नहीं पता है लेकिन स्वतंत्रता दिवस भाषण से प्रधानमंत्री के पाकिस्तान पर विचारों पर अंतिम मुहर लग गई प्रतीत होती है। लगता है कि प्रधानमंत्री ने अचानक लाहौर जाकर जो रुख दिखाया था उससे वो अब पलट रहे हैं। अब शायद वो इंदिरा गांधी के उस कथन की तरफ मुड़ रहे हैं जिसमें उन्होंने पाकिस्तानी जनरलों के बारे में कहा था, “आप बंद मुट्ठी से हाथ नहीं मिला सकते।”

1947 में बलूचिस्तान के कलात के खान को भी यही सबक मिला था। कलात के खान ब्रिटिश शासनकाल में बलूचिस्तान के अर्ध-स्वायत्तशासी शासक थे। भारत विभाजन के समय खान ने बलूचिस्तान के लिए आजादी चुनी और जब मार्च 1948 में पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान पहुंची उसके करीब एक दशक बाद खान ने पाकिस्तान में शामिल होने के आधिकारिक कागजात पर दस्तखत कर दिए। खान को राह पर लाने के लिए पाकिस्तान ने अपने दो नए-नवेले प्राप्त लड़ाकू जेट विमानों को खान के महल को निशाने बनाने के लिए तैनात कर रखा था।

ये मुद्दा दोबारा 1973 में उठा। इस बार मार्क्सवादी बलूची पीपल्स लिबरेशन फ्रंट और बलूची स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन के करीब 10 हजार गुरिल्ला पाकिस्तानी सेना के छह डिविजनों से भीड़ गए। बलूचों के खिलाफ नापाम बम का प्रयोग किया गया। हजारों नागरिकों समेत 5300 उग्रवादी और 3300 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। अाप्रवासियों और इस्लामी विचारधारा वालों की वजह से आर्थिक तौर पर हाशिए पर धकेल दिए जाने के डर से बलूची राष्ट्रवाद को रह-रह कर हवा मिलती रहती है। अकबर खान बुगती ने बलूचिस्तान में जारी उग्रवाद को बढ़ाना शुरू किया तो पाकिस्तान आरोप लगाने लगा कि बलूच उग्रवादियों को भारत समर्थन दे रहा है। 2006 में जब मैंने अकबर खान बुगती से एक इंटरव्यू में इस बाबत सवाल पूछा तो उन्होंने भारत की मदद की बात से साफ इनकार किया था। उस इंटरव्यू के कुछ ही समय बाद उनकी हत्या कर दी गई थी।

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बाद में अकबर खान बुगती के पोते और बागी नेता ब्रह्मदग बुगती भागकर अफगानिस्तान चले गए। कथित तौर पर भारत ने उन्हें पनाह लेने में मदद की। बलूच अलगाववादी भारत से सैन्य सहायता पाने के लिए गोलबंदी करते रहे हैं लेकिन उनकी मांग पर किसी ने अब तक कान नहीं दिया है। साल 2009 में भारत की मनमोहन सिंह सरकार पाकिस्तान के संग हुए शर्म-अल-शेख बैठक में उसके आरोपों पर चर्चा करने के लिए तैयार हो गयी थी। सरकार को इसके लिए घर में काफी जोरदार आलोचना झेलनी पड़ी। विपक्ष ने तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाया कि उसने भारत के ठोस मामले और पाकिस्तान के आरोपों को बराबर मान लिया। मोदी का गिलगित-बाल्टिस्तान का जिक्र भी मासूम कूटनीतिक आयात नहीं है। गिलगित-बाल्टीस्तान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का हिस्सा नहीं है। पाकिस्तान कश्मीर के इस हिस्से को “आजाद कश्मीर” कहता है क्योंकि कश्मीर ने भारत की आजादी से पहले ही एक ब्रिटिश अफसर की मदद से खुद को आजाद घोषित कर दिया था। पाकिस्तान लंबे समय से इसपर दावा करने से झिझकता रहा है। इस दावे का मतलब होगा कि कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, जबकि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसी प्रस्ताव का हवाला देता रहा है। कुछ समय पहले तक भारत गिलगित-बाल्टिस्तान को कश्मीर पर होने वाले समझौते के हिस्से के तौर पर देखता रहा है। लेकिन अब शायद भारत इस क्षेत्र के शिया अलगाववादियों की मदद करके एक मुसीबत मोल लेना चाहता है।

पूर्व एनएसए एमके नारायनन ने 2008 में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हमले के बाद सार्वजनिक रूप से कार्रवाई करने की बात कही थी लेकिन उन्हें इसकी मंजूरी नहीं मिली थी। उनके बाद एनएसए बने शिवशंकर मेनन ने भारतीय खुफिया एजेंसियों से पाकिस्तान में आक्रामक कार्रवाई करने को योजना को आगे न बढ़ाने का निर्देश दिया था। इसका कारण ये था कि जिस क्षेत्र में दो परमाणु शक्ति संपन्न देश हों वहां कई चीजें दांव पर लगी होती हैं और उनके संभावित खतरे भी बड़े होते हैं। दोनों देशों के आधे से ज्यादा शहरों की कीमत पर हासिल की गई जीत का कोई मतलब नहीं होगा। हो सकता है कि युद्धप्रेमी लोगों को बलूचिस्तान के रूप में बदला लेने के बात पसंद आए लेकिन भारत के लिए ये उचित विकल्प नहीं है। इससे मिलने वाले फायदे साफ नहीं है। मसलन, अगर भारत बलूच अलगाववादियों को मदद देता है तो पाकिस्तान कश्मीरी जिहादियों को दी जा रही अपनी मदद बढ़ा देगा। हो सकता है कि भारत बलूचिस्तान में अराजकता पैदा कर दे लेकिन इससे कश्मीर में दर्द ही बढ़ेगा, शांति नहीं आएगी।

लंबे दौर में इससे दोनों देशों के बीच दुश्मनी बढ़ेगी। एक बड़ी आर्थिक शक्ति होने के नाते भारत इससे बचना चाहेगा। यही वजह है कि अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्रियों ने पाकिस्तान में गुप्त युद्ध लड़ने के प्रस्ताव को नकार दिया था। भारत इसके अंतरराष्ट्रीय परिणामों के मद्देनजर भी संयम बरतता रहा है। बलूच राष्ट्रवाद से ईरान भी डरता है। 1973 के सैन्य अभियान में उसने पाकिस्तान की मदद की थी। ईरान नहीं चाहेगा कि भारत इसमें पड़े। इसका सबसे बुरा अंजाम ये हो सकता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद के खिलाफ भारत का केस कमजोर हो जाए क्योंकि दुनिया उसकी कार्रवाई को निंदनीय समझेगा। जाहिर है शोर-शराबे का कोई मतलब नहीं होता। संभव है कि प्रधानमंत्री केवल गुर्रा रहे हों, उनका काटने का कोई इरादा न हो क्योंकि 2000-01 में ये साफ हो गया था कि पाकिस्तान जनरल यही चाहते हैं। ये भी संभव है कि उनका भाषण केवल देश की जनता के लिए हो।

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