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नए वर्ष पर, बीती ताहि बिसारि दे…

भारत में कोरोना ने सिर्फ मौतें ही नहीं दी हैं, बेरोजगारी, आर्थिक संकट के साथ सामाजिक व मानसिक विकारों में भी वृद्धि की है।

coronavirs, shaheen baghसांकेतिक तस्वीर।

वर्ष 2020 बीत रहा है। वर्ष 2021 के स्वागत की तैयारियां हो रही हैं। इस बार वर्ष बीतते-बीतते गिरिधर कविराय की ये पंक्तियां हर मन पर छायी हैं,
बीती ताहि बिसारि दे,
आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में,
ताही में चित देई।।
वर्ष 2020 का स्वागत करते समय हम इक्कीसवीं शताब्दी के पांचवें हिस्से की समाप्ति के साथ नवोन्मेष की उम्मीदों से भरे हुए थे। तीन माह बीतते-बीतते कोरोना के रूप में 2020 ने अंतर्राष्ट्रीय तनाव भरी सौगात दी। उसके पश्चात तो वर्ष पर्यन्त संकट के नवोन्मेष होते रहे। घरों में कैद होने से लेकर आए दिन मौतों ने हर किसी को हिला कर रख दिया। इन स्थितियों में अब 2021 से चुनौती भरी उम्मीदें लगाई जा रही हैं। बीती हुई कड़वी यादों को भुलाकर 2021 में कुछ अच्छा सुनने की उम्मीद के साथ नए वर्ष की अगवानी की जा रही है।

2020 को लेकर तमाम अनुभवों के बीच देश के रुकने, बच्चों के स्कूल छूटने और वर्क फ्रॉम होम जैसी यादें तो साथ रहेंगी ही, 2021 व भविष्य के अन्य वर्षों को लेकर चुनौतियां भी मुंह बाए खड़ी हैं। समाधान की तलाश भले ही की जा रही है, किन्तु समस्याएं जस की तस मौजूद है। 2020 की शुरुआत में दिल्ली के शाहीन बाग का आंदोलन देश ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बना था, वहीं 2021 की अगवानी दिल्ली में ही किसान आंदोलन की भयावहता के साथ हो रही है। भीषण सर्दी में देश के किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली सीमा पर डटे पड़े हैं और सरकार के लिए समाधान की राह निकालना मुश्किल हो रहा है। धीरे-धीरे किसान आंदोलन विस्तार भी ले रहा है और देश के लिए बड़ी चुनौती सा बन गया है।

साम्प्रदायिक सद्भाव की राह में लव-जेहाद जैसे मसले भी बड़ा रोड़ा साबित होते हैं। उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश सरकारों द्वारा जबरन अंतर्धार्मिक विवाह को लेकर कठोर कानून लाए जाने के बाद देश की कई अन्य सरकारें इस पर विचार कर रही हैं। वहीं इन कानूनों के विरोध में खड़े लोग धार्मिक स्वतंत्रता व जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता को खतरा करार दे रहे हैं। 2019 के जाते-जाते सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का पथ प्रशस्त करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। तब लगा था कि देश में साम्प्रदायिक सद्भाव का पथ भी प्रशस्त होगा।

स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण कार्य की शुरुआत करने के लिए वहां पहुंचे थे। हिन्दुओं व मुस्लिमों के बीच वर्षों पुराना विवाद सुलझ जाने से उनके बीच सद्भाव की राह खुलने की उम्मीदों के बीच मथुरा में श्रीकृष्ण जन्म भूमि को लेकर विवाद का मसला अदालत तक पहुंच चुका है। निर्माण का यह द्वंद्व देश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को लेकर भी तेज हो उठा है। मौजूदा संसद भवन के पास ही एक नए संसद भवन के निर्माण को लेकर केंद्र सरकार की योजना का विरोध तेज हो गया है।

प्रधानमंत्री इस महत्वाकांक्षी सेंट्रल विस्टा परियोजना का शिलान्यास तो कर चुके हैं किन्तु मामला अदालत में भी पहुंच चुका है। इस परियोजना पर आने वाली लागत से अधिक लोग पर्यावरण के रूप में कीमत चुकाने की चिंता कर रहे हैं। पहले ही दिल्ली सहित पूरा देश पर्यावरण संकट से जूझ रहा है। इस परियोजना के बाद यह संकट और बढ़ने वाला है। 2021 को इस चुनौती भी निपटना होगा। इन सबसे अलग देश के सामने 2021 के लिए सबसे बड़ी चुनौती कोरोना ही बना हुआ है। अभी कोरोना के पहले संस्करण के स्थायी इलाज के लिए टीका बाजार में आ नहीं पाया है कि कोरोना का दूसरा संस्करण दस्तक दे रहा है।

जिस तरह इंग्लैंड के बाद भारत में भी कोरोना के नए स्ट्रेन से पीड़ित मरीज मिलने लगे हैं, उसके बाद यह चुनौती कम होने के स्थान पर बढ़ती ही नजर आ रही है। भारत में कोरोना ने सिर्फ मौतें ही नहीं दी हैं, बेरोजगारी, आर्थिक संकट के साथ सामाजिक व मानसिक विकारों में भी वृद्धि की है। विद्यार्थी महीनों से अपने स्कूल-कालेज का मुंह नहीं देख पाए हैं। ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर पढ़ाई-लिखाई की बातें तो हो रही हैं किन्तु वह पढ़ाई पूरी तरह प्रभावी हो यह नहीं कहा जा सकता। जिस तरह कोरोना के तीव्र प्रवाह में नौकरियां बही हैं, पहले से ही सुस्त अर्थव्यवस्था में इस संकट ने और पलीता लगाया है। आर्थिक संकट और किसान आंदोलन जैसी सौगातों के साथ 2021 में प्रवेश करते भारत की सबसे बड़ी चुनौती कोरोना संकट का समाधान है।

कोरोना के पहले ही स्ट्रेन में हमने देख लिया था कि हम कोरोना जैसी बीमारी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। कोरोना के कारण कोरोना से इतर बीमारियों का इलाज भी जिस तरह थम सा गया था, वह चिंता का विषय है। कोरोना के गंभीर मरीजों को सघन चिकित्सा उपलब्ध कराना दुष्कर हो रहा था और अस्पतालों में कोरोना के इलाज के चलते अन्य बीमारियों के मरीज लाइलाज रह जा रहे थे। इस कारण भी भारी संख्या में मौतें हुई और कई जगह तो इनका संज्ञान भी नहीं लिया गया।

ऐसे में 2021 का स्वागत करते हुए हमें इन चुनौतियों से निपटने और तदनुरूप रणनीति बनाने की जरूरत है। जनता को भी इसके लिए तैयार रहना होगा। सिर्फ सरकार के भरोसे रहने से तो काम नहीं चलेगा।

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