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नए उच्चशिक्षा आयोग से जगीं आशाएं…

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में यदि यह आयोग सामान्य परिस्थितियों में जन्म ले पाता है तो निःसंदेह स्वयं को मिलने वाले विशेषाधिकारों से वह सर्वप्रथम कुकुरमुत्तों की मानिंद पनप रहे दोयम दर्जे और फर्जी शिक्षण संस्थानों से देश और उच्च शिक्षा को मुक्त करवा सकेगा।

Author नई दिल्ली | June 28, 2018 2:18 PM
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी)

केंद्र सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अर्थात यूजीसी एक्ट 1956 को समाप्त करके उसके स्थान पर हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (एचईसीआई) एक्ट 2018 लागू करने का एकदम नया कदम उठाया है। कई मायनों में इसे सराहनीय और प्रशंसनीय अवश्य कहा जा सकता है, लेकिन हमारे यहां कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक पीता है। यूजीसी के दूध से जली भारतीय उच्चशिक्षा एचईसीआई-2018 के छाछ पर कितना विश्वास कर पाएगी, यह तो भविष्य ही बतलाएगा। बहरहाल कुछ परिवर्न होंगे, तो निःसंदेह भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था के गलियारों में सुखद आशाओं और सपनों के बीजों का प्रस्फुटित होना लाज़मी है।

एचईसीआई-2018 के तैयार मसौदे में शामिल किए गए तथ्य सुनने और पढ़ने में जितने आदर्शवादी प्रतीत हो रहे हैं, यदि वे उतनी ही विशुद्धता के साथ लागू होते हैं और दीर्घकाल तक बने रहते हैं, तब भारत की उच्चशिक्षा की गुणवत्ता में आई गिरावट की उन्नति की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। मसौदे पर 7 जुलाई तक सुझाव मांगे गए हैं। इन सुझावों में क्या विचार आएंगे और कितने शामिल किए जाएंगे, यह बहुत दूर की बात है। हां यूजीसी के नाम पर सताए हुए शोधार्थी और उच्चशिक्षाविद इतनी कामना अवश्य करेंगे कि सन 1911 में महान देशभक्त श्री गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा जब निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का बिल पेश किया गया था, तब लगभग ग्यारह हजार बड़े जमींदारों के हस्ताक्षरों वाली एक याचिका आई थी, जिसमें कहा गया था कि ‘अगर गरीबों के बच्चे स्कूल जाएंगे तो जमींदारों के खेतों में काम कौन करेगा।’

खैर, ये उस समय का भारत था। एचईसीआई-2018 को भारत की गरीबी-अमीरी के आधार वाले आरक्षण से अलग जातिवादी आरक्षण पर अपने निर्णय लेने होंगे। भारत में शिक्षा आरक्षणों के विविध स्वरुपों के अनुसार प्रसारित, प्रचालित होने के लिए बाध्य है। यही कारण है कि उसे सदैव गुणवत्ता के निकर्षों पर गहरे मूल्य चुकाने पड़ते हैं। यूजीसी के पुराने वस्त्रों को उतारकर भारतीय उच्चशिक्षा की आत्मा एचईसीआई-2018 के शरीर में प्रवेश करके एक नया जन्म धारण करने जा रही है। हांलाकि अभी मसौदे के तैयार होने और उस पर देशभर के शोधार्थियों, अभिभावकों, शिक्षाविदों, आचार्यों व आम लोगों के सुझावों के आने से लेकर उनमें से आधार पर परिवर्तन कर सरकार द्वारा बिल को कैबिनेट में रखने, फिर उसके पास होने, तत्पश्चात संसद में पास होने और अंततः कानून में बदलने के बाद ही हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया का जन्म होगा। अर्थात भारत के नवीन उच्चशिक्षा आयोग को अभी गहन प्रसवीय वेदनाओं से गुजरना है, जिसमें राजनीतिक वाद-संवादों के थपेड़ों की तो अभी लहरें ही शुरू नहीं हुई हैं।

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में यदि यह आयोग सामान्य परिस्थितियों में जन्म ले पाता है तो निःसंदेह स्वयं को मिलने वाले विशेषाधिकारों से वह सर्वप्रथम कुकुरमुत्तों की मानिंद पनप रहे दोयम दर्जे और फर्जी शिक्षण संस्थानों से देश और उच्च शिक्षा को मुक्त करवा सकेगा। इसमें एक अच्छा प्रावधान रखा गया है कि यदि ऐसे तथाकथित संस्थान आयोग के आदेशों का अनुपालन नहीं करते हैं तब इनकी मान्यता ही रद्द नहीं होगी, अपितु दोषी पाए जाने पर उनके प्रबंधन से जुड़े शीर्ष अधिकारियों व मुख्य कार्यकारी अधिकारी को तीन साल तक की जेल भी हो सकेगी।

इसके अलावा आयोग को एक और सबसे बड़ी मुक्ति आर्थिक अनुदान के कार्य से मिल पाएगी। ऐसा लगने लगा था कि यूजीसी सिर्फ और सिर्फ शोधों के लिए आर्थिक अनुदानों का साधन बनकर रह गई है। पहुंचों का फायदा बहुतों ने शोध अनुदान के नाम पर उठाकर वैज्ञानिक और कलासंकाय के अनुसंधानों को परिहास बना दिया था। आर्थिक अनुदानों की चकाचौंध में फंसता जा रहा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग उच्चशिक्षा संबंधी अपने अन्य दायित्वों की ओर ध्यान न दे पाने के कारण देश की उच्चशिक्षा गुणवत्ता के मानकीय स्तर को संशोधित नहीं कर पा रहा था। अब मसौदे में स्पष्ट कहा गया है कि एचईसीआई केवल अकादमिक मामलों पर केंद्रित होगा, जबकि आर्थिक अनुदान संबंधी कार्यों के उत्तरदायित्व का निर्वहन कार्य शिक्षा मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में रहेगा।

नए उच्च शिक्षा आयोग के कामों में पाठ्यक्रमों का निर्धारण, शिक्षण और शोध संबंधी पहलुओं का मानकीकरण, पद नियुक्तियां, शुल्कों और प्रवेश संबंधी मानकों और नियमों का यथोचित निर्धारण, अधिकृत समस्त उच्चशिक्षा संस्थानों का मूल्यांकन करना आदि शामिल होगा। इसके साथ ही उसके पास संस्थानों में शिक्षा को गुणवत्ता के आधार पर लागू करवाने की विशेष शक्तियां भी प्रदान की गई हैं। एक तरह से उच्चशिक्षा आयोग अब अपने एक एकल नियामक संस्था के रूप में अवतरित होगा, जिसमें उसके तहत सभी तरह के विश्वविद्यालय जैसे केंद्रीय, राज्य, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालय आदि के लिए एक ही आयोग होगा।

यही सभी के लिए नियम तय करेगा और शिक्षा संबंधी वे उत्तरदायित्व जो अब तक मंत्रालय द्वारा निर्वहन किए जाते थे, अब उच्चशिक्षा आयोग करेगा। इस तरह एचईसीआई एक्ट 2018 लागू होने के बाद से देश में ऑनलाइन रेगुलेशन डिग्री, नैक रिफार्म, विश्वविद्यालयों व कॉलेजों को स्वायत्तता देना, ओपन डिस्टेंस लर्निंग रेगुलेशन आदि के समस्त कामकाज अब मंत्रालय नहीं करेगा, अपितु आयोग द्वारा किए जाएंगे। अक्सर शोधकर्ताओं को अपने कामों के लिए यूजीसी के चक्कर काटने जैसे जुमलों का प्रयोग करना पड़ता था। लेकिन अब एचईसीआई के चक्कर नहीं काटने पड़ेगे क्योंकि इसमें विषयों का निराकरण ऑनलाइन करने का प्रावधान भी रखा गया है।

इस आयोग के गठन में एचईसीआई के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े बारह विशेषज्ञ सदस्यों को शामिल किया जाएगा। इसके साथ ही आयोग के एक सचिव भी होंगे, जो सदस्य सचिव के रूप में काम करेंगे। इन सभी की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। अध्यक्ष का चयन कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में गठित एक चार सदस्यीय सर्च कमेटी करेगी। इनमें उच्च शिक्षा सचिव भी बतौर सदस्य शामिल होंगे। इस तरह यह नवगठित उच्चशिक्षा आयोग देश में मौजूद सभी विश्वविद्यालयों और संस्थानों के लिए एक मार्गदर्शक की भांति कार्य करेगा।

यह सभी कुछ सुनने में अतिप्रिय लग रहा है, लेकिन आशंका सिर्फ इस बात की है कि क्या यह आयोग भारत की उस प्राचीन परम्परा का पुनः निर्वहन कर पाने में सक्षम होगा, जहां प्राचीनकाल में कोई भी राजा गुरुकुलों के प्रबंध में हस्तक्षेप नहीं करता था। यही कारण था कि हमारे देश में वेद, वेदांग, दर्शन, नीतिशास्त्र, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, दंडनीति, सैन्यशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद और आयुर्वेद आदि सभी विषयों की उच्चतम शिक्षा में पूर्ण निष्णात होने पर ही स्नातक की उपाधि मिला करती थी।

यह अलग बात है कि पिछले कुछ दशकों से भारत में हर कोई पीएचडी जैसी उपाधि धारण करके अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाने लगा है। यह भारत में उच्चशिक्षा की गुणवत्ता का सबसे गिरा हुआ स्तर कहा जा सकता है। अतः ऐसी मानसिकता के उन्मूलन के लिए उच्च शिक्षा के नियमन में राजनीतिक व नौकरशाही के हस्तक्षेपों को समाप्त कर उसकी गुणवत्ता संशोधित और विकसित करने में नया उच्चशिक्षा आयोग सार्थक भूमिका निभा सकता है।

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