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कोरोना काल में ऐसा क्या हुआ जिसे पर्यावरण विशेषज्ञ बता रहे हैं बड़ी उपलब्धि? पढ़ें

पर्यावरण और जलवायु विशेषज्ञों के एक समूह ने अपने एक शोधपत्र के माध्यम से खुशखबरी दी है कि 2020 में सार्वभौमिक गर्माहट (ग्लोबल वार्मिंग) को संचालित करने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में रिकॉर्ड गिरावट आई है।

environment, climate change, greenhouse gasप्रतीकात्मक तस्वीर.

डॉ. वीर सिंह

वर्ष 2020 को कोरोना वायरस का वर्ष अथवा ग्लोबल लॉकडाउन का वर्ष माना जाएगा। लेकिन 2020 में ही एक ऐसी उपलब्धि हुई है, जिसकी चर्चा दुनिया में कहीं नहीं। पर्यावरण और जलवायु विशेषज्ञों के एक समूह ने अपने एक शोधपत्र के माध्यम से खुशखबरी दी है कि 2020 में सार्वभौमिक गर्माहट (ग्लोबल वार्मिंग) को संचालित करने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में रिकॉर्ड गिरावट आई है। साल में दिसंबर माह तक दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन दहन से 34 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में उत्सर्जित हुई, जो 2019 की तुलना में 7% कम रही।

यह इतनी बड़ी उपलब्धि है कि जलवायु विशेषज्ञ इसे “कोरोना वर्ष की वसूली” मान रहे हैं। कार्बन उत्सर्जन की बढ़ती दर को देखते हुए वर्ष 2019 तक ऐसा लग रहा था कि सदी के अंत तक सृष्टि का औसतन ताप 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा, यानी पेरिस जलवायु समझौते में तय 2 डिग्री की सीमा से भी अधिक। लेकिन अब वैज्ञानिकों को आशा है कि 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कदाचित 25% तक की कमी आ जाए और सृष्टि का तापक्रम बढ़ने की गति नियंत्रित होकर सदी के अंत तक 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रह जाए।

कार्बन उत्सर्जन में 7% की कमी का अर्थ यह नहीं कि 2020 में सृष्टि के ताप में कोई कमी आ गयी। औद्योगिक क्रांति के बाद सृष्टि का औसत ताप 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कितना कार्बन जीवाश्म ईंधनों से मुक्त होकर वायुमंडल में घुस चूका है। एक वर्ष में कार्बन उत्सर्जन में 7% कटौती से तापक्रम केवल ०.०1 डिग्री ही कम होगा, जो कि नगण्य ही है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लू ऍम ओ) के अनुसार, कोविड-19 महामारी तापमान में लगभग कुछ भी कमी नहीं ला पाई।

सदी का दूसरा दशक समय के इतिहास के रिकॉर्ड पर सबसे गर्म दशक है। कोविड-19 महामारी और लॉक डाउन के कारण दुनिया 2020 में लगभग 2.4 अरब टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में इसलिए उत्सर्जित नहीं कर पाई क्यों कि विश्व की लगभग सारी हवाई उड़ाने बंद हो गईं थीं और और लोगों का आवागमन सीमित हो गया था।

2015 के पैरिस जलवायु समझौते के अंतर्गत किए गए वादों को पूरा करने के लिए और जलवायु को नियमित करने के लिए मानव जाति को अगले दस साल तक एक साल में करीब 1 से 2 अरब टन कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा। आने वाले वर्षों में भी उत्सर्जन में गिरावट जारी रहेगी, अभी कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता। ब्रिटेन के ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के कोरिन ले क्वेरे ने चेतावनी दी है कि “वैश्विक उत्सर्जनों में निरंतर कमी के लिए सभी तत्व अभी तक मौजूद नहीं हैं, और उत्सर्जन धीरे-धीरे 2019 के स्तर पर वापस आ रहा है। सरकारी कार्रवाई कोविड-19 महामारी के अंत में अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए भी कम उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकती हैं।”

यदि दुनिया के देशों ने नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा के विकास और उपयोग का रास्ता चुना और जीवाश्म ईंधन के उपयोग पर नकेल कसी, तो उत्सर्जन में 25% कटौती वास्तव में 21वीं शताब्दी के अंत तक पैरिस समझौते में तय की गई 2 डिग्री सेल्सियस सीमा के भीतर तापक्रम सीमित रखा जा सकता है।

हमारी समकालीन दुनिया ग्रीनहाउस गैसों के बोझ तले दबी जा रही है। मानव अस्तित्त्व के इतिहास में किसी भी समय की तुलना में सृष्टि अब तक 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म है। गर्माहट के पीछे केवल जीवाश्म ईंधन का अंधाधुंध उपयोग ही नहीं, मानव के अन्य कार्यकलाप भी हैं, जैसे वनों का विनाश, आधुनिक खेती, शहरीकरण, सड़कों का जाल आदि। अगर सदी के आगामी वर्षों में हम ग्रीनहाउस गैसों में 2020 जैसी गिरावट नहीं देखते हैं, तो जलवायु को पटरी पर लाना तो असंभव होगा ही, सदी के अंत तक पैरिस जलवायु समझौते में लात मारते हुए हम 3 डिग्री या उससे अधिक तापक्रम में रहकर बिलबिलाएँगे।

2020 में जनवरी से अक्टूबर तक जलवायु सम्बंधित ये तथ्य सामने आएं हैं कि आर्कटिक महासागर में गर्मी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है और हमारे नील ग्रह के लगभग 80% लोगों ने पिछले वर्ष में कम से एक समुद्री हीटवेव का अनुभव किया है। साइबेरियन आर्कटिक में तापमान सामान्य से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक था। आर्कटिक ग्रीष्मकालीन समुद्री बर्फ 42 साल पहले शुरू हुए रिकॉर्ड के बाद से दूसरी बार सबसे कम थी। अगस्त में कैलिफोर्निया की डेथ वैली में थर्मामीटर 54.4 डिग्री सेल्सियस तक छलांग लगा गया, जो पिछले 80 साल से दुनिया में कहीं भी सबसे ज्यादा है।

2020, दुर्भाग्य से, अभी तक हमारी जलवायु के लिए एक और असाधारण वर्ष रहा है। हमने भूमि, समुद्र और विशेष रूप से आर्कटिक में नए चरम तापमान को देखा है। कुछ ज्वलंत दृश्य जो हमें दुर्भाग्यवश देखने को मिले, वे थे ऑस्ट्रेलिया में वनों में प्रचंड अग्निकांड, जिसके धुंए ने साइबेरिया से लेकर अमेरिका के पश्चिमी तट और दक्षिण अमेरिका में विशाल क्षेत्रों तक की परिक्रमा कर डाली।

हमने अटलांटिक महासागर से लेकर हिन्द महासागर तक तूफानों को रिकॉर्ड संख्या में देखा। अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में बाढ़ के कारण बड़े पैमाने पर जनसंख्या विस्थापन हुआ और लाखों लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा का संकट शुरू हो गया।

– डॉ. वीर सिंह, पूर्व प्राध्यापक, पर्यावरण विज्ञान, जी. बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय

 

 

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