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दूसरी नजरः चुप्पी : क्‍या बोलने में माहिर पीएम मोदी सीख रहे हैं चुप रहने की कला?

भारत ने वक्तृता में माहिर, कुछ की निगाह में वाचाल, उम्मीदवार को प्रधानमंत्री चुना था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुधा बोलते हैं, काफी ट्वीट करते हैं और कभी-कभार ही कुछ लिखते हैं।

Author July 31, 2016 8:04 AM
नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद दलित उत्पीड़न की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है.

भारत ने वक्तृता में माहिर, कुछ की निगाह में वाचाल, उम्मीदवार को प्रधानमंत्री चुना था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुधा बोलते हैं, काफी ट्वीट करते हैं और कभी-कभार ही कुछ लिखते हैं। किसी को इस पर अचरज नहीं होता कि वे बोलने का सही मौका जानते हैं और उस मौके का लाभ उठाते हैं। अचरज तभी होता है अगर वे मौके को नजरअंदाज कर देें और चुप्पी साध लें। फिर सवाल उठते हैं। यहां उनकी खामोशी के कुछ नमूने हाजिर हैं:

व्यापम: यह मध्यप्रदेश के व्यावसायिक परीक्षा बोर्ड का संक्षिप्त नाम है, जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार 2003 से है। कई बरसों से परीक्षाओं के परिणाम पहले से तय रहा करते थे। घपले का खुलासा 2013 में एक विसलब्लोअर ने किया। कई कानूनी जद््दोजहद के बाद मामला सीबीआइ को सौंपा गया। इस बीच मामले से संबद्ध चालीस व्यक्तियों (गवाहों, जांच अधिकारियों, आरोपियों) की अस्वाभाविक मौत हुई। कार्यकर्ताओं और विसलब्लोअरों को तरह-तरह की धमकियां मिलीं। अगर कोई अन्य मामला होता, तो घपले के कारण मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई होती, लेकिन शिवराज सिंह चौहान की सरकार कायम रही। प्रधानमंत्री ने चालाकी से चुप्पी साधे रखी। उनकी चुप्पी के चलते चौहान कुर्सी पर जमे हुए हैं।

ललित मोदी : वे आइपीएल के पूर्व मुखिया हैं और पूछताछ के लिए भारत को उनकी तलाश है। वे इंग्लैंड भाग गए जहां एक दोस्ताना सरकार ने उन्हें पनाह देने के लिए उनके मामले में नियम-कायदे ढीले कर दिए (जबकि सैकड़ों भारतीय, जिनके पास वैध पासपोर्ट नहीं होता, आए दिन लौटा दिए जाते हैं)। राजस्थान की मुख्यमंत्री ने ब्रिटेन में ठहरने देने की ललित मोदी की गुहार का समर्थन किया था और यह अनुरोध किया था कि इस संबंध में दिए उनके पत्र के बारे में भारत के अधिकारियों को न बताया जाए। विदेशमंत्री ने ब्रिटेन का यात्रा-दस्तावेज दिए जाने के ललित मोदी के आवेदन की पैरवी की थी, जबकि खुद उनकामंत्रालय ललित मोदी का पासपोर्ट रद््द कर चुका था। ललित मोदी भारतीय एजेंसियों को मुंह चिढ़ाते हुए ब्रिटेन के पासपोर्ट पर दुनिया भर की सैर करते रहे। प्रधानमंत्री अपनी चुप्पी के जरिए विदेशमंत्री और संबंधित मुख्यमंत्री के त्राता बने।
असहिष्णुता की मार
कलबुर्गी, दाभोलकर और पानसरे : एक निरीश्वरवादी था। दूसरे शख्स ने अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चलाई। तीसरे ने योद्धा-राजा शिवाजी को एक सेक्युलर शासक के तौर पर वर्णित किया। तीनों की हत्या हो गई। जांच एजेंसियों को शक था कि तीनों मामलों के कई पहलू आपस में जुड़े हुए हो सकते हैं। बहुत सारे दिग्गज लेखकों ने साहित्य अकादेमी द्वारा उन्हें दिए गए पुरस्कार लौटा कर विरोध की आवाज उठाई। प्रधानमंत्री बेफिक्र बने रहे और उदासीनता भरी चुप्पी साधे रखी। साहित्य जगत ने खुद को अपमानित महसूस किया।

रोहित वेमुला : दलित शोधार्थी रोहित वेमुला ने खुदकुशी करने से पहले लिखा था ‘मेरा जन्म ही मेरे साथ हुई भयानक दुर्घटना है’। शैक्षिक परिसरों में विरोध की लहर फैल गई, जो ‘सुपात्र’ और ‘अपात्र’ की जानी-पहचानी लड़ाई में बदल गई। केंद्र सरकार ने यह साबित करने की कोशिश की कि रोहित वेमुला दलित नहीं था। अब तक किसी को भी उसकी मौत के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया गया। प्रधानमंत्री मूकदर्शक बने रहे। वंचितों में भय व्याप्त है।

अखलाक : एक भीड़ ने इस विश्वास या शक में अखलाक को पीट-पीट कर मार डाला कि उसके घर में बीफ रखा है। एक अजीब तरह की जांच शुरू हुई, जो पीट-पीट कर की गई हत्या की बाबत नहीं, सिर्फ यह जानने के लिए थी कि मांस किस जानवर का था! अनेक राजनीतिक भीड़ की तरफदारी में बोल रहे थे। सांप्रदायिक तनाव पैदा किया गया। प्रधानमंत्री की सोची-समझी खामोशी पर सवाल उठे। फिर प्रधानमंत्री को चुप्पी तोड़नी पड़ी। लेकिन जब वे बोले तो बस इस नसीहत तक सीमित रहे कि हिंदुओं और मुसलमानों को, एक दूसरे से नहीं, बल्कि मिलजुल कर गरीबी से लड़ना चाहिए। अखलाक की हत्या पर वे जान-बूझ कर खामोश रहे।

फूहड़ चालबाजियां
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय : अचानक यह खोज की गई कि जेएनयू में राष्ट्र-विरोधी भरे हुए हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों को छोड़, जेएनयू के हर विद्यार्थी के बारे में यह मान लिया गया कि वह राष्ट्र-विरोधी है, जब तक कि वह ‘भारत माता की जय’ का नारा लगा कर खुद को राष्ट्रवादी साबित नहीं कर देता। पुलिस ने विद्यार्थियों पर राजद्रोह के आरोप जड़े, वकीलों ने अदालत परिसर में पत्रकारों को मारा-पीटा, विश्वविद्यालय ने छात्र नेताओं को निष्कासित किया, और प्रधानमंत्री ने बाहरी हलचल और खुद के बीच चुप्पी की एक दीवार खड़ी कर ली।

पठानकोट हमला : प्रधानमंत्री बिना किसी तैयारी के, अचानक लाहौर में नवाज शरीफ के घर जा पहुंचे। इसके कुछ ही दिनों बाद छह आतंकियों ने भारतीय वायुसेना के पठानकोट ठिकाने पर हमला कर दिया। बाद में यह खुलासा हुआ कि खतरे के बारे में खुफिया जानकारी सरकार को मिली थी, पर उसे लेकर ढिलाई बरती गई। जांच के आदान-प्रदान की सरकार की बेतुकी कोशिश नाकाम साबित हुई। पाकिस्तान ने अपनी टीम पठानकोट भेजी, पर उसने बड़ी ढिठाई से इस बात से इनकार कर दिया कि उसे भारतीय एजेंसियों से कोई सबूत मिले हैं। यही नहीं, ‘सहमति’ के तहत भारतीय एजेंसियों को पाकिस्तान जाने देने के अनुरोध को भी पाकिस्तान सरकार ने बड़ी बेरुखी से खारिज कर दिया। इस पर प्रधानमंत्री का जवाब सिर्फ उनकी भारी चुप्पी थी।

दलितों पर अत्याचार : ‘सबका साथ सबका विकास’ के झूठे वादे की परतें उघड़ने लगी हैं। दलितों पर अत्याचार भारत के यथार्थ का एक जाहिर तथ्य है। ऊना की घटना ने दक्षिणपंथी हिंदुत्व ब्रिगेड के पाखंड, शोषक चरित्र और दंभ को बेपर्दा किया है। प्रधानमंत्री ने इस पर चुप्पी ओढ़ रखी है, जो तमाम हंगामे के बीच भी सबसे ऊंची आवाज में बोलती जान पड़ रही है।

बोलने का कर्तव्य
2014 के आम चुनाव में भारतीय मतदाता नरेंद्र मोदी की वक्तृता से प्रभावित था। सार्वजनिक मंचों पर बोलने की जैसी कला मोदी के पास है, बहुत ही कम लोगों के पास होगी। क्या अब वे सार्वजनिक रूप से चुप रहने की कला अर्जित कर रहे हैं?

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