जीत-हार की खुशी और कसक, दोनों को पचा पाना मुश्किल

इन चार दशकों के दौरान केंद्र में चाहे जिस दल या गठबंधन की सरकार रही हो, सभी ने अपने विरोधी दलों की राज्य सरकारों को परेशान करने और दलबदल को बढ़ावा देकर उन्हें गिराने में राज्यपालों का भरपूर इस्तेमाल किया और राज्यपाल भी खुशी-खुशी इस्तेमाल हुए या केंद्र सरकार को खुश करने के लिए अपने स्तर पर ही राज्य सरकारों को तरह-तरह से परेशान करते रहे या उन्हें अस्थिर करने का खेल खेलते रहे।

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पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना में एक जन सभा से पहले कार्यक्रम स्थल पर BJP और नरेंद्र मोदी समर्थक। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः शशि घोष)

निशिकांत ठाकुर।

यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिस तरह से चुनाव जीतने के लिए एड़ी—चोटी का जोर लगाया था, अपनी पूरी टीम को चुनाव के मैदान में उतार डाला था, उसके बावजूद चुनौती को स्वीकार करके तृणमूल कांग्रेस ने जो उसे जिस तरह पटखनी दी, उस चोट को भाजपा शायद ही कभी भूल पाए। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं होता कि जिन्होंने भाजपा को वोट दिया, उनका चुन-चुनकर सामाजिक बहिष्कार किया जाए, उनके साथ सरेआम मारपीट की जाए, उनसे किसी वस्तु की खरीद-बिक्री न करने का आह्वान किया जाए।

अगर ऐसा किया जा रहा है तो निश्चित रूप से यह भारतीय संविधान का अपमान है और इस प्रकार के किसी भी आह्वान का विरोध होना ही चाहिए। भारत के प्रत्येक नागरिक को अधिकार है कि वह अपनी स्वेच्छा से जिस किसी भी प्रत्याशी को अपना मतदान कर सकता है। ऐसा भारत में कभी भी और कहीं भी नहीं हुआ होगा कि मतदाता ने जिस पार्टी के पक्ष में मतदान किया हो, उसके विरोधी उसके जानी दुश्मन बन गए हों। वैसे, पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर जिले में जो कुछ हुआ है, उसके विरुद्ध केशपुर थाने में मुकदमा दर्ज तो करा दिया गया है। अब देखना यह है कि जांच के बाद सामने क्या आता है।

हां, यह तो होता है कि हारने वाला आरोप-दर-आरोप लगाता है, केस-मुकदमा तक लड़ता है, जबकि उसकी हार की वजह जनता होती है जिसने उसके पक्ष में वोट नहीं किया। लेकिन, आजकल ऐसे आरोप विजेता घोषित प्रत्याशी के प्रति मतदाताओं के मन में नफरत भरने के लिए लगाए जाते हैं। वैसे, देश में चुनावों के दौरान शराब और नोट बांटना कोई नई बात नहीं है। कुछ प्रत्याशी इसी के बल पर जीतकर विधानसभा और लोकसभा पहुंच जाते हैं। लेकिन, पश्चिम बंगाल के चुनाव में ऐसा नहीं हुआ होगा, यह नहीं कहा जा सकता।

चुनाव जीतने और चुनाव हारने वाली, दोनों पार्टियों में कोई ‘कमजोर’ नहीं थी। एक केंद्र सहित कई राज्यों में सत्तारूढ़ और दूसरा दल स्थानीय स्तर पर मजबूत सत्तारूढ़। मुकाबला तो निश्चित रूप से जबरदस्त था, लेकिन केंद्रीय सत्तारूढ़ दल की जो अपनी आक्रामक मार्केटिंग नीति होती थी, वह उनकी बंगाल में चली नहीं और स्थानीय सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस से हार गई। ऐसे में इतनी बड़ी हार को भाजपा भला कैसे बर्दाश्त कर सकती है?

चुनाव से पूर्व और चुनाव के बाद दोनों दलों के बीच खूब मारपीट हुई। यहां तक कि केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और राज्य के सर्वोच्च पद पर विराजमान राज्यपाल जगदीप धनकड़ को भी इसमें हिस्सा लेना पड़ा, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल महोदय ने अपने मान-सम्मान की परवाह न करते हुए मोटरसाइकिल पर बैठकर घटनास्थल का दौरा किया, वह भी बिना ट्रैफिक कानून का पालन किए बगैर हैलमेट लगाए। यह दौरा राज्यपाल महोदय का सामान्य नहीं था, बल्कि अपने दल के प्रति एक समर्पण था जिसने उन्हें मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर कई घटनास्थलों पर जाना पड़ा।

ऐसी उलट सक्रियता देख-सुनकर कई पूर्व राज्यपालों के कार्यकाल याद आते हैं जिन्होंने बहुमत वाली सरकार को गिरा दिया। आए दिन कोई-न-कोई राज्यपाल ऐसी घटनाएं देश को याद दिलाता रहता है। ताजा मामला महाराष्ट्र का है, जहां राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राज्य में लागू राष्ट्रपति शासन को हटाने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजे जाने सहित अन्य संवैधानिक औपचारिकताएं पूरी करने से पहले ही भाजपा विधायक दल के उस नेता को सूबे के मुख्यमंत्री पद की चुपके से शपथ दिला दी, जिसने महज दो सप्ताह पहले ही अपने दल का बहुमत न होने की वजह से सरकार बनाने से इनकार कर दिया था।

आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका रहा जब आनन-फानन में इतनी सुबह किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन हटाकर किसी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई हो। दरअसल, राज्यपालों द्वारा अपने दायित्वों के निर्वहन में संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी और मनमानी का सिलसिला करीब चार दशक पुराना है जब केंद्र और राज्यों से कांग्रेस का सत्ता पर एकाधिकार टूटा और गैर-कांग्रेसी दलों की सरकारें भी बनने लगीं।

इन चार दशकों के दौरान केंद्र में चाहे जिस दल या गठबंधन की सरकार रही हो, सभी ने अपने विरोधी दलों की राज्य सरकारों को परेशान करने और दलबदल को बढ़ावा देकर उन्हें गिराने में राज्यपालों का भरपूर इस्तेमाल किया और राज्यपाल भी खुशी-खुशी इस्तेमाल हुए या केंद्र सरकार को खुश करने के लिए अपने स्तर पर ही राज्य सरकारों को तरह-तरह से परेशान करते रहे या उन्हें अस्थिर करने का खेल खेलते रहे।

इस सिलसिले में सबसे पहले और कुख्यात उदाहरण के तौर पर जीडी (गणपतराव देवजी) तपासे का नाम उल्लेखनीय है, जिन्होंने हरियाणा का राज्यपाल रहते हुए वर्ष 1982 में चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में लोकदल के विधायकों का बहुमत होते हुए भी अल्पमत वाली कांग्रेस के नेता भजनलाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी और बाद में भजनलाल ने लोकदल के कुछ विधायकों से दलबदल करा कर अपना बहुमत साबित किया था। इस सिलसिले में दूसरा नाम आता है ठाकुर रामलाल का, जिन्होंने आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के रूप में वर्ष 1983 में तेलुगूदेशम पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को उस समय बर्खास्त कर उनके ही एक बागी मंत्री एन.भास्करराव को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी थी जब रामाराव अपने दिल का ऑपरेशन कराने अमेरिका गए हुए थे।

ठीक इसी तरह का एक काला अध्याय वर्ष 1983 में ही जगमोहन ने जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल रहते हुए रचा था। उन्होंने मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला को बर्खास्त कर उनके बहनोई गुल मुहम्मद शाह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। राज्यपालों की मनमानी के इस सिलसिले में वर्ष 1989 कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई की बर्खास्तगी का मामला तो भारत के संसदीय इतिहास का एक अहम अध्याय है। बोम्मई की सरकार को तत्कालीन राज्यपाल पी. वेंकट सुबैया ने मनमाने तरीके से यह कहते हुए बर्खास्त कर दिया था कि सरकार विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी है। बोम्मई ने अपनी बर्खास्तगी को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी, बोम्मई ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

एसआर बोम्मई बनाम भारत सरकार के नाम से मशहूर हुए इस मामले में वर्ष 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया, वह अनुच्छेद—356 के इस्तेमाल, यानी राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के संदर्भ में मील का पत्थर बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बोम्मई सरकार की बर्खास्तगी असंवैधानिक थी और उन्हें बहुमत साबित करने का मौका मिलना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकार के बहुमत या अल्पमत में होने का फैसला संबंधित सदन यानी लोकसभा या विधानसभा ही हो सकता है। इसी फैसले में शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की पुष्टि संसद के दोनों सदनों से भी होना जरूरी है और दोनों सदनों से पुष्टि हो जाने के बाद भी उस फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। इसी के साथ अनुच्छेद—356 लागू करने में केंद्र सरकार की शक्ति को सीमित करने के लिए कई शर्तें भी कोर्ट ने जोड़ी थीं।

अनुच्छेद—356 के इस्तेमाल और राज्यपाल के अधिकारों के बारे में जो बातें सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कही थीं, लगभग उन्हीं से मिलती—जुलती बातें केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा और शक्ति संतुलन पर राय देने के लिए गठित सरकारिया आयोग ने भी अपनी सिफारिशों में कही थीं। यह और बात है कि सरकारों ने इन बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। नतीजा यह रहा कि राज्यपालों की कलंक-कथा में नए अध्याय जुड़ने का सिलसिला जारी रहा।

उत्तर प्रदेश में वर्ष 1998 में कल्याण सिंह की अगुवाई में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकार थी, जिसे एक नाटकीय घटनाक्रम के बीच तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। हालांकि, वे महज डेढ़ दिन ही मुख्यमंत्री रह सके थे, क्योंकि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कल्याण सिंह की बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार दे दिया था। कल्याण सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने थे। इसी तरह वर्ष 1998 में बिहार में राबड़ी देवी की सरकार को तत्कालीन राज्यपाल विनोदचंद्र पांडे ने बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था। केंद्र में उस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। राष्ट्रपति शासन का फैसला लोकसभा में पारित होने के बावजूद राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था, लिहाजा वाजपेयी सरकार को मजबूरन राबड़ी देवी की सरकार को फिर से बहाल करना पड़ा था।

इसके बाद वर्ष 2005 में ऐसा ही खेल खेलते हुए झारखंड में राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी ने अल्पमत के नेता शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री की पद की शपथ दिला दी थी, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण उन्हें महज नौ दिन में ही इस्तीफा देना पड़ा। बाद में अर्जुन मुंडा के नेतृत्व में भाजपा नीत एनडीए की सरकार बनी थी। बिहार के राज्यपाल के रूप में ऐसी ही मनमानी सरदार बूटासिंह ने की थी। फरवरी 2005 में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने लायक बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था, लिहाजा बूटा सिंह की सिफारिश पर मई 2005 में विधानसभा भंग कर दी गई थी। उस समय केंद्र में कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार थी।

हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा भंग करने के फैसले को असंवैधानिक करार दिया था। यह तो कुछ बड़े और महत्वपूर्ण उदाहरण मौजूदा सरकार के पहले के हैं, लेकिन वर्ष 2014 में मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद तो राजभवन और सत्तारूढ़ दल के दफ्तर में व्यावहारिक तौर पर कोई भेद ही नहीं रहा। पिछले सात वर्षों के दौरान केंद्र सरकार और राज्यपालों के लिए सरकारें बनाने-गिराने के खेल में संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक परंपराओं की बेरहमी से धज्जियां बिखेरी गई हैं। हालांकि, इस दौरान दो मामलों में केंद्र सरकार को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुंह की खानी पड़ी, लेकिन उसने कोई सबक नहीं लिया, लिहाजा राज्यपालों के रवैये में भी कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया।

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद किसी राज्य सरकार को दलबदल के जरिये अस्थिर करने और फिर अनुच्छेद—356 का इस्तेमाल कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की शुरुआत दिसंबर 2014 में अरुणाचल प्रदेश से हुई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फैसले में राज्यपाल के रवैये पर सख्त टिप्पणियां करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य की कांग्रेस सरकार को फिर से बहाल करने का आदेश दिया। ऐसा लगता है जो स्थिति बंगाल में अभी दिखाई दे रही है, उसका परिणाम कुछ ऐसा ही होने वाला है।

Nishikant Thakur, Journalist, Jansatta Blog

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।

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