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Farmers protest: ‘खत्म न हुआ गतिरोध तो भविष्य भयावह है, कहीं ‘Bloody Sunday’ जैसा न हो’

जस्टिस काटजू के मुताबिक, "वर्तमान में सरकार उन किसानों के दबाव में है, जिन्होंने दिल्ली को घेर रखा है और इसके चलते सड़कों को अवरुद्ध कर दिया गया है। इसलिए सरकार द्वारा यह कानूनों को तुरंत निरस्त करने की संभावना नहीं है।"

Farmers Protest, Farm Laws, SC, NDA, BJPकेंद्र में पीएम मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के लाए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली में डेरा डालकर आंदोलन पर बैठे किसान। (फोटोः पीटीआई)

वर्तमान में चल रहे भारतीय किसान आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व है और मैं इसकी व्याख्या करना चाहता हूं।

1. हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य भारत को अविकसित देश से एक उच्च विकसित, अत्यधिक औद्योगिक रूप से परिवर्तित करना होगा। ऐसा किए बिना हम बड़े पैमाने पर गरीबी, रिकॉर्ड बेरोजगारी, व्यापक बाल कुपोषण (भारत में हर दूसरा बच्चा कुपोषित है, ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार), हमारी 50% महिलाएं एनेमिक हैं, हमारी जनता के लिए स्वास्थ्य सेवा और अच्छी शिक्षा का अभाव है, किसान संकट (3,00,000 से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं), खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों आसमान छू रही और व्यापक भ्रष्टाचार आदि।

2. एक अल्प विकसित देश से विकसित भारत का यह ऐतिहासिक परिवर्तन केवल शक्तिशाली जनसंघर्ष से ही संभव है, क्योंकि कई शक्तिशाली ताकतें हैं जो इसका विरोध करेंगी।

3. इस शक्तिशाली जन संघर्ष को सफल बनाने के लिए हमें आपस में एकता रखनी होगीI वर्तमान में हम दुर्भाग्य से जाति और धर्म के आधार पर विभाजित हैं। भारत में अब तक के आंदोलन ज्यादातर धर्म के आधार पर होते थे। राम मंदिर आंदोलन या जाति के आधार पर। जाट, गुर्जर और दलित आंदोलन। परिणाम जो भी हो, पर मौजूदा किसान आंदोलन जाति और धर्म की बाधाओं को तोड़ चुका है और यह इससे ऊपर उठ गया हैI इस प्रकार इसने हमारे लोगों में एकता कायम की है। इसने हमारे राजनेताओं को भी दूर रखा है, जो अक्सर समाज को जाति या धार्मिक आधार पर (वोट बैंकों के लिए) हमारे समाज को बांटते थे। यह एकता बिल्कुल आवश्यक थी, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है और यह इसका वास्तविक महत्व है।

किसान भारत सरकार के इशारे पर संसद द्वारा हाल ही में बनाए गए तीन किसान कानूनों को रद्द करने और कानून द्वारा उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार ये कदम उठाने को तैयार नहीं है। इस गतिरोध को तोड़ने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी हालिया सुनवाई में, इन कानूनों को लागू न करके वार्ता आयोजित करने के लिए अनुकूल माहौल बनाने का सुझाव दिया है। सरकार को न्यायालय के इस बुद्धिमानी सुझाव को स्वीकार करना चाहिए और किसानों को भी ऐसा करना चाहिए।

सरकार को यह महसूस करना चाहिए कि 135-140 करोड़ की हमारी विशाल जनसंख्या का 60% से अधिक हिस्सा खेती-किसानी पर निर्भर है। यह एक विशाल वोट बैंक का गठन करता है, जो कि भविष्य में चुनाव में सरकार को हरा सकता है यदि यह किसानों का विरोध करता है।

दूसरी ओर, किसानों को यह महसूस करना चाहिए कि तीन कानूनों को तत्काल निरस्त करने से सरकार की प्रतिष्ठा गिर जाएगी। प्रशासन का 1 सिद्धांत है कि सरकार को दबाव में आत्म समर्पण नहीं करना चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो इसे कमजोर सरकार माना जाएगा, और फिर अधिक दबाव और मांगें आएंगी। वर्तमान में सरकार उन किसानों के दबाव में है, जिन्होंने दिल्ली को घेर रखा है और इसके चलते सड़कों को अवरुद्ध कर दिया गया है। इसलिए सरकार द्वारा यह कानूनों को तुरंत निरस्त करने की संभावना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस परिस्थिति में एक उचित प्रस्ताव दिया है और दोनों पक्षों को इसे स्वीकार करने की सलाह दी। सरकार कह सकती है कि उसने कानूनों को निरस्त नहीं किया है। किसान कह सकते हैं कि उन्हें लागू नहीं किया जा रहा है। यह दोनों के लिए आंशिक सफलता होगी और एक मध्य रास्ता ( via media ) है। तीनों कानूनों के क्रियान्वन के रोक के बाद, सरकार को एक किसान आयोग का गठन करना चाहिए जिसमें किसान संगठनों के प्रतिनिधि, सरकार के प्रतिनिधि और कुछ कृषि विशेषज्ञ शामिल हों, जो कई बैठकें आयोजित करें (जो कई महीनों तक खिंच सकती हैं) किसान समस्याओं के सभी पहलुओं पर विचार करें, और फिर सर्वसम्मति जो सभी पक्षों को मंज़ूर हो, कानून के रूप में अधिनियमित किया जा सकता है।

यह वर्तमान गति का एकमात्र उचित समाधान है। अगर वर्तमान गतिरोध समाप्त होना है, तो दोनों पक्षों को थोड़ा झुकना चाहिए और बहुत अधिक कठोर रुख नहीं अपनाना चाहिए। अगर गतिरोध समाप्त न हुआ तो भविष्य भयावह है।

‘SC के सुझाव को कर लें स्वीकार वरना…’: चल रहे किसान आंदोलन से संबंधित कल की सुनवाई में, सुप्रीम कोर्ट ने वर्तमान गतिरोध को हल करने के लिए एक बहुत ही समझदारी भरा रास्ता दिखाया। चूंकि, किसान इस बात पर जोर दे रहे हैं कि संसद द्वारा अधिनियमित किए गए तीनों कानूनों को वापस लिया जाए, लेकिन लगता है कि सरकार ऐसा नहीं करेगी, इसलिए उचित समझौता फार्मूला वही प्रतीत होता है जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुझाया गया है।

सरकार को इन कानूनों के कार्यान्वयन को रोकना चाहिए, ताकि एक सौहार्दपूर्ण समझौते तक पहुंचने के लिए बातचीत को सुविधाजनक बनाया जा सके। विद्वान अटॉर्नी जनरल ने कहा कि उन्हें अदालत के इस सुझाव का जवाब देने से पहले सरकार से निर्देश लेना होगा। गेंद अब सरकार के पाले में है और मैं इसे अदालत के समझदारीपूर्ण सुझाव को स्वीकार करने का आग्रह करता हूं।

कोई भी यह समझ सकता है कि किसानों को जिन तीन कानूनों पर आपत्ति हो रही है, उन्हें तत्काल निरस्त किया जाना सरकार की प्रतिष्ठा के लिए नुकसान माना जा सकता है। प्रशासन का एक सिद्धांत है कि सरकार को दबाव के सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए, क्योंकि अगर वह ऐसा करता है, तो उसे कमजोर सरकार माना जाएगा, और फिर अधिक दबाव और मांगें आएंगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को कानूनों को निरस्त करने के लिए नहीं कहा है, केवल उनके कार्यान्वयन पर रोक लगाने की सलाह दी है। यह अध्यादेश ( Ordinance ) बनाकर सरकार द्वारा किया जा सकता है। इसके बाद एक किसान आयोग का गठन किया जा सकता है, जिसके सदस्य किसान संगठनों के प्रतिनिधि, सरकार के प्रतिनिधि और कृषि विशेषज्ञ होंगे। यह निकाय कई महीनों तक कई बैठकें आयोजित कर सकता है, और जब एक आम सहमति बन जाती है, जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो, वही उपयुक्त कानून बनाकर लागू किया जा सकता है।

ऐसा मध्य रास्ता अपनाने से सरकार कह सकती है कि 3 कानूनों को निरस्त नहीं किया गया है, और किसान कह सकते हैं कि उन्हें लागू नहीं किया जाएगा। यह दोनों के लिए एक आंशिक जीत होगी, और दोनों की प्रतिष्ठा बनी रहेगी, इसलिए मैं सरकार और किसान संगठनों को वर्तमान गतिरोध को हल करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के इस बुद्धिमानी सुझाव को तुरंत स्वीकार करने के लिए आग्रह करता हूं।

मुझे डर है कि न्यायालय के सुझाव न मानने से कहीं ऐसा न हो जैसा जनवरी 1905 में सेंट पीटर्सबर्ग में खूनी रविवार ( Bloody Sunday ) के दिन, या अक्टूबर 1795 में पेरिस में वेंडेमीएरी ( Vendemiarie ) के दिन हुआ, जब नेपोलियन के तोपों के गोलों के बौछार ने भीड़ को तितर-बितर कर दिया था।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं और यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके न‍िजी हैं।)

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