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पिता ने दी किताबों की सौगात

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है न! न जाने क्यों, लेकिन दिल्ली के इस मेले से मुझे बेहद लगाव है।

Author Published on: January 14, 2017 2:18 AM
(File Photo)

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है न! न जाने क्यों, लेकिन दिल्ली के इस मेले से मुझे बेहद लगाव है। बहुत छोटे से चाहे जिस भी शहर में रही होऊं, पिताजी के साथ उनकी ऊंगली पकड़ कर दिल्ली की ओर चल पड़ती थी। मां एक बड़ा सा टिफिन लगा देती थी, जिसमें ढेर सारा खाना होता था, एक छोटे झोले में मेरे और पिताजी के कपड़े। हम मेले वाली सुबह ही दिल्ली पहुंच जाते थे और उसके बाद पिताजी के ही किसी दोस्त के घर पर रुक कर तब तक पुस्तक मेले का आनंद लेते जब तक मेला खत्म नहीं होता। पुस्तक मेले के दिन मेरे लिए साल के बेहतरीन दिनों में से होते थे, क्योंकि इन दिनों मैं पिताजी के झोले में अपनी पसंद की चाहे जितनी किताबें डाल देती पिताजी सारी किताबें ले लेते।

वैसे पिताजी ने कभी किताबें लेने के लिए नहीं रोका। पिताजी के साथ रहते हुए मैंने बहुत अच्छे कपड़े/जूते पहने हों या न पहने हों, बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ी होऊं या न पढ़ी होऊं, बहुत अच्छे होटल में खाना खाया हो या न खाया हो, नए-नए महंगे-महंगे शहरों में घूमी होऊं या न घूमी होऊं, लेकिन मैं ये गर्व के साथ कहती हूं, कि मेरे पिता ने मुझे दुनिया की बेहतरीन किताबें पढ़ने को दीं।किताबें ही हैं, जो मुझे मेरे पिता से भरपूर मिलीं और उसका फायदा ये हुआ कि मैंने जिंदगी को अपनी निगाह से अपनी समझ से देखने-समझने की कोशिश की। कई लोग कहते हैं, किताबें कुछ नहीं होतीं, लेकिन जो नजरिया किताबें देती हैं, वो कोई अनुभव भी नहीं दे सकता। हमेशा चाहती हूं, कि मैं अपने घर में भी एक कमरे को एकदम पिताजी की उस लाइब्रेरी जैसा बना दूं, जहां ज़मीन से लेकर छत तक चारों ओर किताबें ही किताबें थीं।

मेरा हर शब्द मेरे पिता का दिया हुआ है, उन्होंने ही मुझे बहादुर बनाया और मुझे इस काबिल बनाया कि मैं अपनी जिंदगी के बड़े से बड़े फैसले खुद ले सकूं। लड़कियां दहेज में गहने/कपड़े/लत्ते लेकर जाती हैं, लेकिन यह सच है, कि मैं दो/तीन सूटकेस भर कर किताबें ले गई और एक सूटकेस में अपने गिनती भर कपड़े और एक-दो जोड़ी जूते। गहने-वहने जैसी फालतू चीज़ तो बिल्कुल नहीं। कभी प्रतीक ने भी नहीं पूछा कि दहेज क्यों नहीं लाई? गहने क्यों नहीं लाई? मोटर गाड़ी क्यों नहीं लाई? मुझे सोने की घड़ी क्यों नहीं दी? ससुराल वालों का ज़रूर मुंह फूला होगा!… लेकिन प्रतीक ने दहेज में आई उन किताबों को हमारे होने वाले बच्चों को एक विरासत के तौर पर उन्हें सौंपने को जरूर कहा था…

मेरे करीबी मुझसे कहते हैं, कि किताबें पढ़-पढ़ कर मेरे भीतर की असली लड़की कहीं खो गई है, मैं किताबों की नायिकाओं जैसी ही हो गई हूं। जिस किताब को पढ़ती हूं, उस किताब में खुद को रखकर सोचने लगती हूं… यदि ऐसा है भी, तो अच्छी बात है न। किताबों जैसा भी हो जाना सबके बस की बात नहीं। शायद इसलिए मैं जितना अधिक किताबों से जुड़ पाती हूं, उतना अधिक इंसानी चेहरों से नहीं। बड़ी मुश्किल होती है लोगों से खुलने और जुड़ने में। पहले सोचती थी कि मैं ऐसी क्यों हूं, लेकिन अब इस बात को स्वीकार कर चुकी हूं, कि मैं ऐसी ही हूं और कभी नहीं बदलने वाली। ये सच है कि मैं अपनी उन किताबों की दुनिया में ही जीती हूं। उनके किरदारों को ही अपने आसपास तलाशती हूं, वे नहीं मिलते तो नये चेहरों में घुलने-मिलने की बिल्कुल कोशिश नहीं करती।
आज रविवार है और सुबह उठते ही दिल्ली विश्व पुस्तक मेले की वो सुबहें और वहां फैली रौनक मेरे जेहन में कौंध गई, जो पिताजी का हाथ थामे तेज-तेज कदमों से हिंदी किताबों के हॉल की ओर बढ़ते देखने को मिलती थी। अब पिताजी मेरे साथ नहीं हैं, मुझसे दूर हैं तो कोई किताबों के इस मेले में ले जाने वाला भी नहीं है। वो मेरे पास होते तो इस बार भी उनकी ऊंगली पकड़कर विश्व पुस्तक मेले की ओर चल पड़ती और अपनी पसंद की ढेर सारी किताबें चुन-चुन कर उनके झोले में भर देती।
-रंजना त्रिपाठी की फेसबुक वॉल से

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