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वक्त की नब्ज़ः जनता के सेवक या महाराजा

जिस देश में जिंदगी भर कमाने के बाद भी आम आदमी एक छोटा-सा घर नहीं बना सकता, उस देश में हमारे राजनेताओं को क्यों अधिकार हो महलों में रहने का और वह भी जनता के पैसों से? जब तक इस परंपरा को हम बदलेंगे नहीं, तब तक हमारे राजनेताओं का घमंड भी नहीं कम होगा।

Author April 2, 2017 3:44 AM
शिवसेना सांसद रवींद्र गायकवाड़। (Photo source: ANI)

क्या आपको उम्मीद थी कि शिवसेना के रवींद्र गायकवाड़ की शर्मनाक हरकत देख कर उनके खिलाफ उनकी पार्टी और संसद की तरफ से कोई कार्रवाई की जाएगी? क्या आप हैरान हुए, जब अन्य राजनीतिक दलों के सांसद टीवी पर आकर उनके पक्ष में बोले? सच पूछिए तो मुझे जरा भी हैरत नहीं हुई, इसलिए कि दशकों से दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में घूमने के बाद मैं जानती हूं अच्छी तरह कि हमारे जनप्रतिनिधियों में कितना भाईचारा है। लोकसभा के अंदर उनके बीच जितनी तल्खी दिखती है, वह असल में है नहीं। कभी आप इनको लोकसभा के बाहर मिलते-जुलते देखेंगे, तो ऐसा लगेगा कि बचपन के दोस्तों में बातचीत हो रही है। सो, मुझे जरा भी हैरत नहीं हुई जब कांग्रेस की रेणुका चौधरी को टीवी पर कहते सुना कि ‘हमने एअर इंडिया के अधिकारी की बातें तो सुनी हैं, लेकिन हम यह नहीं जानते कि गायकवाड़ साहब के साथ उन्होंने क्या किया था।’

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पता नहीं कहां थीं श्रीमतीजी, जब हर चैनल पर दिखाया जा रहा था कि एअर इंडिया के उस बुजुर्ग अधिकारी को कैसे उस्मानाबाद के आदरणीय सांसद साहब ने अपनी चप्पल से पीटा। हमने यह भी देखा बाद में कि गायकवाड़ साहब ने किस गर्व से स्वीकार किया कि उन्होंने उस बेचारे अधिकारी की पिटाई की थी। पिटाई का कारण भी बताया। ‘मेरे पास बिजनेस क्लास का बोर्डिंग कार्ड था और वे लोग मुझे इकॉनमी में बिठा रहे थे।’ वाह भई जनता के सेवक, क्या शान है आपकी! खैर, इस शर्मनाक हरकत के बाद देश की तमाम एअरलाइनों ने तय किया कि इस सांसद के लिए उनके विमानों में कोई जगह नहीं होगी।

नतीजा यह कि आसमान में बिजनेस क्लास से लुढ़क कर सांसद महोदय जमीन पर रेल गाड़ी में सफर करने पर मजबूर हुए। बहुत कोशिश की हवाई जहाज से जाने की, लेकिन उनकी सारी कोशिशें नाकाम रहीं। नाम बदल कर टिकट बुक करने की कोशिश भी नाकाम रही। सो, सांसदजी अपना बयान बदल कर अपने आप को पीड़ित साबित करने में लग गए। शिवसेना के उनके सांसद साथियों के बयान आने लगे अखबारों में, जिनमें उन्होंने कहा कि एअरलाइन वाले ‘माफिया’ और ‘गुंडा’ किस्म के लोग हैं, सो उनके साथ वही होना चाहिए, जो गायकवाड़ साहब ने किया था।

बहुत बेशर्म हैं हमारे राजनेता, लेकिन गायकवाड़ साहब की इस हरकत ने प्रधानमंत्री को अच्छा मौका दिया है उनको अपनी औकात में लाने का। रजनेताओं का घमंड कुछ इसलिए ज्यादा है अपने देश में, क्योंकि हमने उनकी आदत डाल रखी है राजा-महाराजों की तरह रहने की। जिस मुल्क में जनता रोटी, कपड़ा, मकान को तरसती है, जिस मुल्क में आज भी चुनावों में मुख्य मुद्दे होते हैं बिजली, पानी, सड़क, स्कूल उस मुल्क के लोग चुप करके बर्दाश्त करते आए हैं कि संसद में पहुंचने के बाद उनके प्रतिनिधि आलीशान कोठियों में रहेंगे, जिनमें उनके लिए बिजली, पानी, टेलीफोन, हवाई और रेल सफर सब मुफ्त में मिलता है। क्या इस गलत परंपरा को समाप्त करने का वक्त नहीं आ गया है?
किसी भी दूसरे लोकतांत्रिक देश में जनता पर बोझ नहीं डाला जाता है अपने प्रतिनिधियों के रहन-सहन का इस तरह। इस परंपरा को हमने चीन और पूर्व सोवियत संघ जैसे देशों की नकल करके उस समय अपनाया, जब समाजवाद के नाम पर हमने जनता के तथाकथित सेवकों का वेतन कम रखा। इतना कम कि उस पर गुजारा भी करना इतना मुश्किल था कि उनको अन्य सुविधाएं दी गर्इं। सो, लटयन दिल्ली में सांसदों को घर दिए गए और देना मुश्किल नहीं था चालीस-पचास वर्ष पहले, जब एक बड़ी कोठी का किराया सिर्फ दो सौ रुपए हुआ करता था। आज उसी कोठी को किराए पर लेना हो तो कम से कम तीस लाख रुपए हर महीने देने की गुंजाइश रखनी पड़ती है। नवनिर्वाचित सांसदों को कोठियां नहीं, फ्लैट मिलते हैं, जिनका मासिक किराया दो लाख रुपए से कम नहीं है।

भारत सरकार के पास दिल्ली में कई पुराने सरकारी होटल हैं, जो तकरीबन खाली पड़े हैं दशकों से। सांसदों के लिए अकबर और सम्राट होटलों में हम क्यों नहीं रहने का इंतजाम कर सकते हैं? ऊपर से हैं हर राज्य सरकार के आलीशान भवन, जिनमें भी रहने का इंतजाम किया जा सकता है, लेकिन हाल यह है अपने देश का अरविंद केजरीवाल जैसा क्रांतिकारी नेता भी चुनाव जीतने के बाद रहना चाहता है लटयन दिल्ली की किसी आलीशान कोठी में।

नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे परिवर्तन और विकास का नारा देकर, तो मैंने उनके एक मंत्री से पूछा था कि क्यों नहीं भारतीय जनता पार्टी अपने सांसदों को लेकर कम से कम यह परिवर्तन लाती कि उनको सरकारी मकान नहीं मिलेंगे। परिवर्तन का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता है। चुप करके मेरी पूरी बात सुनने के बाद उन्होंने कहा, ‘आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं, लेकिन यह हम अगली बार करेंगे इस बार नहीं, क्योंकि बहुत बड़ा परिवर्तन होगा।’
सवाल है कि जो प्रधानमंत्री नोटबंदी जैसा महापरिवर्तन एक झटके में ला सकता है, उसे यह छोटा-सा परिवर्तन लाने में क्यों संकोच हो? जिस देश में जिंदगी भर कमाने के बाद भी आम आदमी एक छोटा-सा घर नहीं बना सकता, उस देश में हमारे राजनेताओं को क्यों अधिकार हो महलों में रहने का और वह भी जनता के पैसों से? जब तक इस परंपरा को हम बदलेंगे नहीं, तब तक हमारे राजनेताओं का घमंड भी नहीं कम होगा। इतनी खातिर की है हमने उनकी कि वे भूल गए हैं कि जनता के सेवक हैं, राजा नहीं।

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