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वक्त़ की नब्जः वही पुरानी लीक

बेशक कर्नाटक की शुरू से कमजोर, नाकाम सरकार अगले हफ्ते तक गिर जाएगी और भारतीय जनता पार्टी वहां अपनी सरकार बनाने में सफल हो जाएगी, लेकिन कौन भरोसा कर सकेगा ऐसी सरकार पर, जो दलबदलुओं के बल पर बनी है?

Author July 14, 2019 2:27 AM
पीएम मोदी। फोटो: इंडियन एक्सप्रेस

दूसरी बार लोकसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले भाषण में वादा किया एक नया भारत बना कर दिखाने का। इसलिए समझना मुश्किल है कि पिछले हफ्ते उस पुराने भारत की सबसे गंदी आदतों की यादें ताजा करने का काम क्यों उनके साथियों ने किया है। एक तरफ गोवा में दलबदलुओं का ऐसा स्वागत किया भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने जैसे बहुत बड़े नायक हों। दूसरी तरफ देखने को मिला कर्नाटक में उसी किस्म का घटिया राजनीतिक नाटक, जो पुराने भारत की पहचान हुआ करता था कभी। वही पांच सितारा होटल में कैद विधायक। वही निजी विमानों में उनका आना-जाना। वही राज्य सरकार को अस्थिर करने की कोशिश।

कहने को तो भारतीय जनता पार्टी दूर से देख रही है यह नाटक, लेकिन यथार्थ सबको दिखता है। भाजपा प्रवक्ता चाहे जितना कहते फिर रहे हों कि सोलह विधायकों ने कांग्रेस और जनता दल को छोड़ने का फैसला किया है अपनी मर्जी से, लेकिन यकीन इस बात पर करना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी के एक राज्यसभा सांसद के निजी विमान में ये लोग मुंबई आए थे। वापस जब बंगलुरु गए थे तब भी उसी विमान में और फिर विधानसभा में हाजिरी देने के बाद वापस आए उसी निजी विमान में। पांच सितारा होटल में उनके रहने का खर्चा कौन दे रहा है? अगर अपनी मर्जी से यह सब कर रहे थे ये लोग तो उनको होटल में कैद करने की जरूरत क्या थी? कांग्रेस के नेता जब उनसे मिलने आए, तो उनको मिलने क्यों नहीं दिया गया?

इस पूरे नाटक से बू आती है उस पुरानी राजनीति की, जिसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए नए भारत में। उस पुरानी घटिया किस्म की राजनीति ने कांग्रेस पार्टी को अंदर से दीमक की तरह धीरे-धीरे तबाह किया है और अब उसी रास्ते पर चलने की कोशिश अगर भारतीय जनता पार्टी करती है, तो मुमकिन है कि उसका भी देखते-देखते वही हाल हो जाएगा, जो आज कांग्रेस का है। राज्य सरकारों को गिराने की परंपरा शुरू की थी इंदिरा गांधी ने 1959 में केरल की कम्युनिस्ट सरकार गिरा कर। उसके बाद विपक्ष की राज्य सरकारें गिराने की जैसे इंदिराजी ने आदत-सी डाल ली। इस आदत की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान देश को तब हुआ जब उन्होंने 1984 में फारुख अब्दुल्ला की सरकार गिराई थी।

फारुख 1983 में जीते थे, अपने पिता शेख अब्दुल्ला के नाम पर। शेख साहब का देहांत 1982 में हुआ था, सो उनकी कश्मीर के लिए कुर्बानियों को याद करके लोगों ने उनके बेटे को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन यह बात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अच्छी नहीं लगी, सो तकरीबन पहले दिन से फारुख अब्दुल्ला को हटाने का प्रयास शुरू किया उन्होंने। पहले प्रचार किया गया कि फारुख अब्दुल्ला अलगाववादी ताकतों का समर्थन कर रहे हैं। कश्मीर में और पंजाब में भी। फारुख पर देशद्रोह तक का आरोप लगाने लगे कांग्रेसी। फिर फारुख के कुछ असंतुष्ट विधायकों को प्रोत्साहित किया नेशनल कॉन्फेंस छोड़ कर फारुख के जीजा के गुट में शामिल होने का। मुख्यमंत्री बन तो गए गुलाम मोहम्मद शाह कांग्रेस के छब्बीस विधायकों के समर्थन से, लेकिन कश्मीर घाटी में अस्थिरता का दौर तबसे शुरू हुआ और आज तक उस समस्या का समाधान पूरी तरह नहीं कोई कर पाया है।

फारुख की सरकार गिराने के कुछ महीने बाद इंदिरा गांधी ने आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव की सरकार गिराई, लेकिन एनटी रामाराव ने अपनी सरकार के गिरने को स्वीकार नहीं किया और अपने विधायक लेकर दिल्ली पहुंचे राष्ट्रपति के सामने साबित करने कि विधानसभा में उनकी कितनी ताकत है। नुकसान इस बार इंदिराजी का निजी तौर पर हुआ, क्योंकि पूरा विपक्ष संगठित हुआ और उनको चुनौती देने लगा।

इस तरह की हुआ करती थी राजनीति उस पुराने भारत में, जिसको मोदी बदलने का वादा करते हैं। इस वादे को अगर पूरा करना चाहते हैं प्रधानमंत्री, तो उनको इस राजनीतिक सभ्यता को भी बदलना होगा। बेशक कर्नाटक की शुरू से कमजोर, नाकाम सरकार अगले हफ्ते तक गिर जाएगी और भारतीय जनता पार्टी वहां अपनी सरकार बनाने में सफल हो जाएगी, लेकिन कौन भरोसा कर सकेगा ऐसी सरकार पर, जो दलबदलुओं के बल पर बनी है? जब जनता के प्रतिनिधि दल बदलने का काम करते हैं, तो बेवफाई उन लोगों के साथ करते हैं, जिन्होंने उन्हें चुन कर भेजा है। ऊपर से उनके चरित्र में भी अक्सर कोई खोट होती है।

इंडियन एक्सप्रेस अखबार में पिछले हफ्ते कर्नाटक के उन सोलह विधायकों के बारे में विस्तार से एक लेख छपा, जिसने साबित किया कि इनमें से ज्यादातर वही लोग थे, जो नाराज थे सिर्फ इसलिए कि उनको मंत्री नहीं बनाया गया कुमारस्वामी की सरकार में। ऐसे लोग अगर भारतीय जनता पार्टी में आने लगेंगे, तो किस मुंह से नरेंद्र मोदी नैतिकता की बातें कर सकेंगे? किस मुंह से वादा करेंगे नए भारत के निर्माण का?

नए भारत के सुनहरे सपने पर साया पड़ने लगा है गंदी राजनीति का। सोशल मीडिया पर खबरें वायरल होने लगी हैं कि करोड़ों रुपयों का लालच दिया जा रहा है दोनों तरफ से असंतुष्ट विधायकों को। कांग्रेस पार्टी की छवि पहले से इन चीजों को लेकर खराब है, सो असली नुकसान अगर हुआ है तो भारतीय जनता पार्टी का। कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी इस तरह सरकार बना भी लेती है तो उसको नुकसान ज्यादा और लाभ कम होने वाला है, क्योंकि जिस तरह की राजनीति खेली जा रही है उससे दिखने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की सभ्यता में कोई अंतर नहीं है।

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