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वक्त की नब्जः हिंसा का हासिल

नफरत का परिणाम यह है कि दिल्ली की कई बस्तियां पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं या उनमें नफरत का जहर इतना फैल गया है कि हिंदुओं और मुसलमानों में दुबारा भाईचारा कायम करने में बहुत वक्त लग सकता है। दंगे रुक जाते हैं हमेशा, लेकिन नफरत जब किसी शहर के हवा-पानी में घुल जाती है, जहर बन कर रह जाती है उस शहर की रगों में।

शुरुआत हुई थी नागरिकता कानून में संशोधन लाए जाने से बहुत पहले, जब गृहमंत्री ने महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों को जीतने के लिए नागरिकता को हथियार बना कर बार-बार आश्वासन दिया था अपने भाषणों में कि किसी भी हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध या पारसी को अपनी नागरिकता गंवाने की कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। नाम अगर नहीं लिया देश के इस शक्तिशाली राजनेता ने तो सिर्फ मुसलमानों का।

दिल्ली के दंगों में एक संदेश है। आशा करती हूं कि यह संदेश प्रधानमंत्री निवास तक पहुंच जाए। संदेश है कि नफरत की राजनीति से हमेशा पैदा होती है हिंसा। इस हिंसा को रोका जा सकता है, लेकिन जिस नफरत से वह पनपती है, उसके दाग कभी नहीं मिटते हैं। अदृश्य दर्द के घावों की तरह रह जाते हैं दशकों तक टूटे मकानों में, बर्बाद हुई बस्तियों में और उन परिवारों के अकल्पनीय दुख में, जिनका कोई बेटा, बाप या भाई बेमौत मारा गया हो सिर्फ नफरत के कारण।

प्रधानमंत्री निवास तक यह संदेश पहुंचना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अभी तक उन्होंने स्वीकार नहीं किया है कि नफरत की आग लगाई थी उनके अपने साथियों ने, उनके मंत्रियों ने और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने। शुरुआत हुई थी नागरिकता कानून में संशोधन लाए जाने से बहुत पहले, जब गृहमंत्री ने महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों को जीतने के लिए नागरिकता को हथियार बना कर बार-बार आश्वासन दिया था अपने भाषणों में कि किसी भी हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध या पारसी को अपनी नागरिकता गंवाने की कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। नाम अगर नहीं लिया देश के इस शक्तिशाली राजनेता ने तो सिर्फ मुसलमानों का। मगर जो कहना चाह रहे थे मुसलमानों को, उस बात को पूरा मुसलिम समाज समझ गया। इसके बाद जब नागरिकता कानून में संशोधन लाया गया धर्म के आधार पर, पहली दफा भारत के इतिहास में, तो संदेश भारत के आम मुसलमानों तक पूरी तरह पहुंच गया और विरोध प्रदर्शन शुरू होने लगे दिसंबर 15 को दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय से।

पुलिस की ज्यादतियां इस विश्वविद्यालय में देख कर शुरू हुआ शाहीन बाग का किस्सा। दिल्ली की ठंडी रातों में महिलाएं बैठी रहीं अपना विरोध जताने। मोदी सरकार के किसी भी मंत्री ने इन औरतों से मिल कर बात करने की तकलीफ की होती, तो फौरन जान जाते कि उनकी चिंता असली थी। मैंने जब इन महिलाओं से मिल कर समझाने की कोशिश की थी कि सीएए से उनकी नागरिकता को कोई खतरा नहीं है, तो उन्होंने मुझे उलटा समझाया कि इस बात को वे अच्छी तरह जानती हैं, लेकिन गृहमंत्री ने बार-बार कहा है कि सीएए के बाद देश भर में आएगा एनआरसी और उनको डर इससे है, क्योंकि उनको मालूम है कि अपनी भारतीयता साबित करनी होगी सिर्फ मसलमानों को। गरीब मुसलमानों के पास कहां रखे होते हैं दस्तावेज? जब शाहीन बाग जैसे विरोध प्रदर्शन होने लगे देश भर में, तो प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान से आश्वासन दिया कि फिलहाल एनआरसी लाने का कोई प्रयास नहीं कर रही है उनकी सरकार।

तब तक शरजील इमाम जैसे जिहादी शामिल हो गए थे विरोध प्रदर्शनों में। सो, जब दिल्ली का चुनाव अभियान शुरू हुआ, भारतीय जनता पार्टी के नेता शाहीन बाग को ‘गद्दारों’ का अड्डा साबित करने में लग गए। ऐसे भाषण दिए गए, जिनसे सीएए का विरोध करने वालों को पाकिस्तानी और जिहादी कहा गया। चुनाव आयोग के हस्तक्षेप से कुछ लोगों को चुनाव प्रचार करने पर कुछ लोगों पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन दिल्ली पुलिस की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं हुई। नफरत फैलती रही इतनी कि दंगे तो होने ही थे। बेशक भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती थी कि दंगे उस समय शुरू हों जब अमेरिका के राष्ट्रपति भारत में खास मेहमान थे, लेकिन क्यों नहीं कपिल मिश्रा जैसे लोगों को नियंत्रण में रखा गया?

नफरत का परिणाम यह है कि दिल्ली की कई बस्तियां पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं या उनमें नफरत का जहर इतना फैल गया है कि हिंदुओं और मुसलमानों में दुबारा भाईचारा कायम करने में बहुत वक्त लग सकता है। दंगे रुक जाते हैं हमेशा, लेकिन नफरत जब किसी शहर के हवा-पानी में घुल जाती है, जहर बन कर रह जाती है उस शहर की रगों में। यह संदेश क्या पहुंचेगा प्रधानमंत्री निवास तक?

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