जनता की स्वतंत्रता की रक्षा का अपना कर्तव्‍य निभाए कोर्ट

पत्रकार जो सरकार या मंत्री की आलोचना करते हैं, उन पर अक्सर NSA या UAPA जैसे भयावह अधिनियम के अंतर्गत देशद्रोह का आरोप लगाया जाता है और हिरासत में ले लिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया के रिटायर्ड जज जस्टिस (रि.) मार्कण्‍डेेय काटजू (photo by narendra kumar)

मैंने हाल ही में भारतीय सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ सिटिंग जज से टेलीफोन पर बात की, और उनसे कहा कि भारतीय नागरिकों के विशाल बहुमत की धारणा यह है कि संविधान के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा का अपने कर्तव्य का बड़े पैमाने पर त्याग दिया है, जिसके लिए न्यायाधीशों ने शपथ ली थी। जिस सिटिंग जज से मैं बात कर रहा था , मैं उनसे बहुत वरिष्ठ हूं। मैंने उनसे कहा कि सेवानिवृत्‍ति के उपरांत मैं जज नहीं रह गया हूँ, पर जनता का सदस्य हूँ। इसलिए मैं जनता के प्रतिनिधि के रूप में बोल रहा हूँ, न्यायाधीश के रूप में नहीं, और, जनता की धारणा यह है कि सुप्रीम कोर्ट अब नेताओं और अधिकारियों के मनमानेपन और अवैधता के खिलाफ नागरिकों की रक्षा का अपना संवैधानिक कर्तव्य नहीं निभा रहा है। मैंने उन जज साहेब से कहा कि लॉकडाउन समाप्त होने के बाद मैं सुप्रीम कोर्ट के कुछ न्यायाधीशों के साथ बंद कमरे की बैैठक में अपने विचार रखना चाहूंगा।

इन जाने-माने मामलों पर गौर करें- सफूरा ज़र्गर, एक युवा गर्भवती कश्मीरी महिला को नागरिकता संशोधन अधिनियम की आलोचना करने के लिए गढ़े गए आरोपों में गिरफ्तार किया जाना, डॉ.कफील खान को एनएसए के तहत नजरबंद करना, शरजील इमाम का मामला..।

जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को सोशल मीडिया पर पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का कार्टून साझा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को राजनेताओं को भ्रष्ट बताने वाले कार्टून बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और लोक गायक कोवन को तमिलनाडु में गिरफ्तार किया गया था शराब कारोबार में भ्रष्टाचार के संबंध में जयललिताकी आलोचना करने के लिए।

पत्रकार जो सरकार या मंत्री की आलोचना करते हैं, उन पर अक्सर NSA या UAPA जैसे भयावह अधिनियम के अंतर्गत देशद्रोह का आरोप लगाया जाता है और हिरासत में ले लिया जाता है। किशोरचंद वांगखेम (Kishorechand Wangkhem ) को मणिपुर के सीएम बीरेन सिंह की आलोचना करने के लिए गिरफ्तार किया गया था।

पत्रकार पवन जायसवाल को केवल इसलिए गिरफ्तार किया गया था क्योंकि उन्होने मिर्जापुर के एक प्राथमिक स्कूल में बच्चों को मिड डे मील के नाम पर केवल रोटी और नमक दिए जाने पर रिपोर्ट की । पत्रकार अभिजीत अय्यर मित्रा को तत्कालीन सी.जे.आई (और अब सांसद गोगोई) की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेन्च ने जमानत देने से इनकार कर दिया। उनका एक मात्र ‘अपराध’ केवल यह था कि उन्होने कोणार्क मंदिर पर व्यंग्यपूर्ण ट्वीट पोस्ट किया था (जिसके लिए उन्होनेतुरंत ही माफ़ी भी मांगी थी )

11 मई 2020 को, एक गुजराती ऑनलाइन पोर्टल ‘ द फेस ऑफ द नेशन ’ के संपादक धवल पटेल को पकड़ कर उन पर राजद्रोह के इलज़ाम लगाए गए। उन्‍होंने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।उसमें वे केवल इतना कह रहे थे कि गुजरात के कि सीएम विजय रूपानी को बदले जाने की संभावना है।

इस तरह के अनगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं। सवाल यह है कि द्रौपदी के वस्त्रहरण के दौरान जिस तरह भीष्म पितामाह ने अपनी आंखें मूंद ली थीं, क्‍या उसी तरह सुप्रीम कोर्ट को इन घोर और भयावह अवैधताओं को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए? उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों के क्या मायने रह जाएंगे जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने खुद को लोगों के अधिकारों का संरक्षक कहा था?

26 जनवरी 1950 को घोषित भारतीय संविधान में लोगों के मौलिक अधिकारों का एक समूह है, जो अमेरिकी संविधान के बिल ऑफ़ राइट्स (Bill of rights) पर आधारित है। न्यायपालिका को इन अधिकारों का संरक्षक बनाया गया था, अन्यथा वे केवल कागज पर बने रहते I

1950 में संविधान की घोषणा के कुछ महीने बाद ‘रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (Romesh Thapar vs State of Madras) AIR 1950 SC 124 में सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने फैसला दिया कि लोकतंत्र में लोगों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। न्यायालय ने कहा कि “सरकार के प्रति आलोचनात्मक विचार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने का आधार नहीं माना जा सकता “।

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जस्टिस अब्दुल कुद्दोज़ ( Justice Abdul Quddhose ) ने इसी दृष्टिकोण से यही बात अलग शब्दों में हाल ही के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कही। एन. राम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्‍य में विद्वान न्यायाधीश ने कहा, “नागरिकों को सरकार का कोई भय नहीं होना लोकतंत्र का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। उन्हें उन विचारों को व्यक्त करने से डरना नहीं चाहिए जो सत्ता में रहने वालों को पसंद न हो।” उन्‍होंने कहा कि “सरकार की नीतियों की आलोचना तब तक देशद्रोह नहीं है जब तक कि वह सार्वजनिक अव्‍यवस्था फैलााने या हिंसा के लिए भड़काने वाली बात न हो।”

न्यायमूर्ति कुद्दोज़ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले करतार सिंह बनाम पंजाब, 1956 एस सी 541 (Kartar Singh vs State of Punjab, AIR 1956 SC 541) को ध्यान में रखते हुए कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को ‘थिक स्किन्‍ड’ यानी मोटी चमड़ी विकसित करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, आलोचना को सहन करने के लिए अधिकारियों के पास मज़बूत कंधे होने चाहिए।यह निर्णय आज की मौजूदा स्थिति में बहुत प्रासंगिक है। आजकल सत्ता में राजनेता अक्सर बहुत ही जल्दी उत्तेजित होते हैं, उनका अहं विशाल होता है और वे किसी भी तरह की आलोचना नहीं सुन सकते।

घनी बनाम जोन्स 1970 1QB 693 (Ghani vs Jones 1970 1 QB 693) में लॉर्ड डेनिंग (Lord Denning) ने कहा था “इंग्लैंड के कानून में लिबर्टी ऑफ़ मूवमेंट (liberty of movement) को इतनी अधिक मान्यता दी गयी है कि इसमें किसी भी तरह की बाधा या रुकावट नहीं डाली जा सकती। ” जब भी एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (habeas corpus petition)(अवैध गिरफ्तारी से छूटने की प्रार्थना) एक ब्रिटिश न्यायाधीश के सामने आती है, तो वह अन्य सभी फाइलों को हटा देता है, और इस याचिका को हर दूसरे मामले से अधिक प्राथमिकता देता है, क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित है।

लेकिन 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद हिरासत में लिए गए कश्मीरी नेताओं के बंदी प्रत्यक्षीकरण मामलों (habeas corpus cases) में सुप्रीम कोर्ट का प्रदर्शन कैसा था? मामलों को महीने-दर-महीने स्थगित कर दिया गया और कई अभी भी लंबित हैं। जबकि, अर्नब गोस्वामी की याचिका, जिन्हें सरकार के लिए उनकी आत्मीयता के लिए जाना जाता है, को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी। इससे क्या संदेश जाता है?

मेरी राय में सुप्रीम कोर्ट (और हाई कोर्ट ) को इन अवैध रूप से गिरफ्तार किए गए लोगों पर चल रहे मुकदमों पर सुओ मोटू कॉग्नीज़न्स (suo motu cognizance) लेना चाहिए था। न केवल गलत करने वाली सरकार, बल्कि उन पुलिस अधिकारियों पर भी, जिन्होने इन अवैध आदेशों का पालन किया, भारी जुर्माना लगाना चाहिए और कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।

पुलिसकर्मियों को गैरकानूनी आदेश का पालन करने से इनकार कर देना चाहिए। न्यूरेम्बर्ग मुक़दमों (Nuremberg trials) में नाजी युद्ध-अपराधियों ने दलील दी थी कि वे केवल अपने वरिष्ठ अधिकारी हिटलर के आदेशों का पालन कर रहे थे, लेकिन उस दलील को खारिज कर दिया गया और कई मुजरिमों को फांसी दी गई।

अब समय आ गया है कि अदालतें जनता की स्वतंत्रता की रक्षा का अपना कर्तव्‍य निभाने में सक्रियता दिखाएं।

(लेखक , सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया के रिटायर्ड जज हैं। यहां व्‍यक्‍त विचार पूरी तरह उनके निजी हैं, जनसत्‍ता.कॉम के नहीं।)

पढें ब्लॉग समाचार (Blog News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट