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‘क‍िसानों ने द‍िखाया व‍िराट रूप और जगाई बड़ी उम्‍मीद भी’

"वर्तमान में चल रहा किसान आंदोलन जाति और सांप्रदायिक दीवारों को पार कर गया है, और इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्व है।"

Farmers Protest, Kisan Andolanदिल्ली बॉर्डर पर डटे किसान। (फोटो- PTI)

“भगवान श्री कृष्ण की तरह भारतीय किसानों ने अपना विशाल और पराक्रमी रूप प्रदर्शित किया है। कुरुक्षेत्र में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपने महाकाय रूप के दर्शन दिए थे (गीता का ग्यारहवाँ अध्याय देखें)। इसी प्रकार, भारतीय किसान अपना विशाल और पराक्रमी रूप प्रदर्शित कर रहे हैं। जैसा कि एक महान एशियाई नेता ने कहा था “जब करोड़ों किसान आंधी या तूफ़ान की तरह उठेंगे , तो यह इतनी शक्तिशाली और तेज़ ताकत होगी कि पृथ्वी पर कोई भी शक्ति इसे दबा नहीं पाएगी।”

अधिकांश जगहों पर ध्रुवीकरण करने वाली ताकतों को देखकर मुझे भारत की स्थिति पर निराशा हो रही थी, लेकिन इस किसान आंदोलन ने जाति और धार्मिक रेखाओं को पार कर अध‍िसंख्‍य लोगों को एकजुट करके , मेरी विलुप्त होती उम्मीद को पुनर्जीवित किया है। अब मुझे विश्वास है कि भारत अपने एकता के आभाव की मुख्य बाधा को पार कर लेगा, एक महान ऐतिहासिक संघर्ष होगा जो हमें पिछड़ा और गरीब बना रही ताकतों के खिलाफ एकजुट करेगा, और हम एक दिन एक शक्तिशाली औद्योगिक विशाल देश के रूप में उभरेंगे, जिसमें हमारे लोग उच्च जीवन स्तर और सभ्य जीवन का आनंद ले पाएंगे।

भारतीय किसान दीर्घायु हों !

वर्तमान में भारत में आज दो विपरीत ताकतें काम कर रही हैं। एक वो जो लोगों को धार्मिक (या जाति) के आधार पर विभाजित, उनको ध्रुवीकृत कर रही हैं और दूसरी जो लोगों को एकजुट कर रही हैं। इसे समझने के लिए, पहले यह समझना ज़रूरी है कि भारत अभी भी एक अविकसित देश है, जिसमें जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसी सामंती ताकतें प्रभावशाली हैं। धर्मनिरपेक्षता औद्योगिक समाज की एक विशेषता है, लेकिन भारत अभी भी अर्ध सामंती है। हालांकि भारतीय संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित करता है, लेकिन जमीनी हकीकत बहुत अलग है। सच्चाई यह है कि अधिकांश हिंदू और मुसलमान हृदय से सांप्रदायिक हैं।

जब कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टियां सत्ता में थीं, सांप्रदायिकता मौजूद होने के बावजूद कुछ हद तक सीमा में थी , इसलिए नहीं कि इन दलों को मुसलमानों के लिए कोई वास्तविक सहानुभूति थी, लेकिन क्योंकि वे मुस्लिम वोट बैंक चाहते थे। इसलिए तब तक सांप्रदायिकता काफी हद तक अव्यक्त थी, केवल सांप्रदायिक दंगों आदि में छिटपुट रूप में ही दिखाई देती थी । 2014 के बाद जब भाजपा केंद्र में सत्ता में आई तो सांप्रदायिकता खुली, उग्र और निरंतर हो गई है, और भारतीय समाज धार्मिक रूप से बड़े पैमाने पर ध्रुवीकृत हो गया है।

चूंकि भारत की अध‍िसंख्‍य आबादी ह‍िंदुओं की है (मुस्‍ल‍िम केवल 15-16% हैं), हिंदुत्ववादी भाजपा को इस ध्रुवीकरण से लाभ हुआ है, और इससे उनकी भविष्य में अधिकांश हिंदू बहुल राज्यों में चुनाव जीतने की संभावना है। यह भारतीय लोगों को धार्मिक आधार पर स्पष्ट रूप से विभाजित कर रहा है। हालांकि, भारत में एक ऐसी ताकत भी है जो लोगों को एकजुट कर रही है, और इसका एक ठोस उदाहरण चल रहे किसान आंदोलन में देखा जा सकता है जिसमें किसान धार्मिक और जातिगत रेखाओं को पार कर एक जुट हो कर आंदोलन कर रहे हैं।

भारत में व्यापक गरीबी, रिकॉर्ड और बढ़ती बेरोजगारी, बाल कुपोषण का भयावह स्तर (भारत में हर दूसरा बच्चा कुपोषित है, जैसा कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स द्वारा बताया गया है), आम आदमी के लिए उचित स्वास्थ्य सुविधा का लगभग कुल-अभाव, खाद्य पदार्थों, ईंधन की आसमान छूती कीमत, किसान संकट (जिसके कारण 300,000 से अधिक लोगों ने आत्महत्या की है), व्यापक भ्रष्टाचार, आदि है। यह संकट धर्म और जाति के परे सभी लोगों के लिए सामान्य है, इसलिए इनका समाधान एक एकजुट जनशक्ति ही कर सकती है जो धर्म और जाति की बाधाएं तोड़ सके, भारत में चल रहे किसान आंदोलन में इस जनशक्ति के आरम्भ की झलक दिखाई दे रही है।

यह प्रस्तुत किया जाता है कि यद्यपि भारत में विभाजनकारी ताकतें (यानी जाति और धर्म ) कुछ समय तक प्रभावी हो सकती हैं, परन्तु लंबे समय में एकजुट करने वाली शक्तियां विभाजनकारी ताकतों पर विजयी होंगी । ऐसा इसलिए है क्योंकि एक न एक दिन लोगों को एहसास ज़रूर होगा कि गरीबी, बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि आदि की भारत में व्यापक समस्याएं सभी के लिए आम हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण या गौ रक्षा, लव जिहाद आदि केवल नौटंकी हैं, और इससे निश्चित रूप से बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि, स्वास्थ्य सेवा की कमी आदि समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

केवल लोगों के एकीकृत होने और बड़े पैमाने पर एकजुट संघर्ष से ही एक महान ऐतिहासिक परिवर्तन संभव है जिससे भारत एक अविकसित देश से अति औद्योगिक आधुनिक देश में परिवर्तित होगा , जो भारतीय लोगों को उच्च स्तर और सभ्य जीवन देगा। ऐसा होना निश्चित है, लेकिन इसमें समय लगेगा।

भारतीय लोग अब धीरे-धीरे यह महसूस कर रहे हैं कि अगर वे साथ हो कर जाति और धार्मिक रेखाओं को पार कर एक महान शक्तिशाली एकजुट संघर्ष शुरू करते हैं तब ही वे इन बड़ी समस्याओं से बाहर निकलने की उम्मीद कर सकते हैं।वर्तमान में चल रहा किसान आंदोलन जाति और सांप्रदायिक दीवारों को पार कर गया है, और इसलिए इसका ऐतिहासिक महत्व है। इस आंदोलन को कुछ निहित स्वार्थी लोगों द्वारा खालिस्तानी, पाकिस्तान प्रेरित आदि के रूप में चित्रित करने का प्रयास बुरी तरह विफल रहा। किसान आंदोलन के नतीजे क्या होंगे, इसका अनुमान फिलहाल नहीं लगाया जा सकता, लेकिन इसने जो हासिल किया है वह है भारतीय लोगों को एकजुट करना। गरीबी और अन्य सामाजिक बुराइयों से भारतीय लोगों की मुक्ति का दिन अब क्षितिज पर देखा जा सकता है, हालांकि इसे प्राप्त करने के लिए एक सयुंक्त संघर्ष की लंबी अवधि की आवश्यकता होगी।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं और यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके न‍िजी हैं।)

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