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प्रसंगवशः खाप के खिलाफ

जाति और गोत्र से जुड़े सामंती निर्णयों में खाप पंचायतें अकेली नही हैं, राजनीतिक दलों का भी उन्हें समर्थन प्राप्त है। हकीकत यह है कि खाप पंचायतें राजनीतिक दलों के लिए बहुत बड़ा वोट बैंक हैं। यही कारण है कि इनके अमानवीय निर्णयों पर राजनीतिक दल चुप्पी साधे रहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट। (express photo)

सर्वोच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग धर्मों और जातियों के वयस्कों के स्वेच्छा से विवाह करने के मामले में बड़ी राहत दी है। इसमें उसने खाप पंचायतों के दखल को पूरी तरह गैरकानूनी करार दिया है। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड की तीन सदस्यी खडंपीठ ने खाप पंचायतों के ऐसे बेजा हस्तक्षेप को रोकने के लिए दिशा निर्देश जारी किए हैं। साथ में यह भी स्पष्ट किया है कि आॅनर किलिंग पर विधि आयोग गंभीरता से विचार कर रहा है। जब तक नया कानून नहीं बन जाता, तब तक मौजूदा आधार पर ही कार्यवाही होगी। अदालत ने कहा कि एक लोकतांत्रिक देश में ऐसा कैसे संभव है कि कुछ लोग अपने को संविधान से ऊपर मान कर चलें। ऐसे समूहों का आचरण पूर्णतया असंवैधानिक है। उसने दोहराया कि कोई भी समूह या पंचायत राजा की तरह किसी भी लड़के-लड़की को अपने सामने हाजिर होने को नहीं कह सकती। किसी भी जाति-बिरादरी की खाप पंचायत का उद्देश्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाना होता है, पर हो इसके ठीक उलट रहा है। गौरतलब है कि हरियाणा के करौरा जनपद के कैथल गांव के समान गोत्र वाले एक लड़के और लड़की के विवाह कर लेने पर खाप पंचायत के सदस्यों ने लड़के का कत्ल कर दिया था और लड़की की उसके परिवार वालों ने जहर देकर हत्या कर दी थी। इससे पहले भी खाप पंचायतों से जुड़े झज्जर के गांव जौणधी, ढराणा, पानीपत के गांव सींक और नया गांव बास आदि में समान गोत्र में विवाह पर हत्याओं के दर्जनों मामले बहुचर्चित रहे हैं।

हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब में पिछले एक-दो वर्षों में खाप पंचायतों के फैसलों को लेकर दर्जनों विवाद जन्म ले चुके हैं। इन विवादों में पे्रमी जोड़ों को या तो गांव छोड़ना पड़ा या फिर उनकी अंतिम परिणति हत्या या आत्महत्या के रूप में हुई। इसलिए वहां आज भी गोत्र परंपरा प्रेम विवाहों में बाधक सिद्ध हो रही है। हरियाणा में तो ऐसे प्रकरण अक्सर हो जाते हैं। पर जाति पंचायतों के मध्ययुगीन नियमों के चलते ऐसे मुद्दों पर विरोध और बहस दब कर रह जाती रही है। यहां तक कि वहां का प्रशासन तक खाप पंचायतों के निर्णयों के सामने बेबस दिखाई देता है। नतीजतन, अभी तक इन पंचायतों के परंपरागत कानूनों के सामने भारतीय संविधान भी बौना साबित होता रहा है।

सच यह है कि जाति और गोत्र से जुड़े सामंती निर्णयों में खाप पंचायतें अकेली नही हैं, राजनीतिक दलों का भी उन्हें समर्थन प्राप्त है। हकीकत यह है कि खाप पंचायतें राजनीतिक दलों की बहुत बड़ी वोट बैंक हैं। यही कारण है कि इनके अमानवीय निर्णयों के प्रति राजनीतिक दल चुप्पी साधे रहते हैं। इन पंचायतों की अपनी जातीय खापें और गोत्र परिषदें हैं। समाजशास्त्रियों ने खाप पंचायतों को जाटों की उत्तर भारत की राजनीतिक व्यवस्था के रूप में पारिभाषित किया है। वास्तविकता यह है कि ये खापें न सिर्फ जाति और गोत्र तक सीमित हैं, बल्कि इनमें एक निश्चित क्षेत्र में निवास करने वाली अनेक बिरादरियां भी शामिल हैं, जो उस क्षेत्र में गोत्र के रूप में जानी जाती हैं। अब ये खापें राजनीतिक शक्तियों की तुलना में ज्यादा ताकतवर नजर आने लगी हैं।

आजादी के बाद आशा बंधी थी कि वैधानिक प्रयासों से विवाह और जाति के कठोर बंधन शिथिल होंगे। पर राजनीतिक दलों ने जिस तरह जाति को सत्ता का साधन बना कर प्रयोग किया, उससे सरकारों की दशा और दिशा का निर्धारण होना शुरू हो गया। सत्ता में चाहे जो रहे, पर आज जाति से जुड़े सम्मान, प्रतिष्ठा और वोट की राजनीति उसे ऐसे सामाजिक मुद्दों के सामने घुटने टेकने को मजबूर करती रही है। पंचायतों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। सच यह है कि इन खाप पंचायतों ने बदलते समय के साथ अपनी संस्थात्मक भूमिका का निर्वहन ठीक से नहीं किया। यही वजह है कि इन्हें आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। जब-जब इन पंचायतों के सामने प्रेम विवाह के प्रकरण सामने आते हैं, ये लोग रक्षात्मक प्रतिक्रिया में जाति, समुदाय और गोत्र से जुड़ा अपना अस्तित्व बचाने को तत्पर हो जाते हैं। सही मायनों में जातीय मिथकों, सामुदायिक श्रेष्ठता और गोत्र की नई अस्मिता के संरक्षण से देश की सामाजिक-सांस्कृतिक श्रेष्ठता को खतरा पैदा हो रहा है। लिहाजा, प्रेम विवाहों के मामलों में भी जाति और गोत्र को लेकर पंचायतों के फरमान भावी पीढ़ी के दिलो-दिमाग में सामाजिक प्रतिशोध का नया बीजारोपण कर रहे हैं। इस विषय पर समय रहते गंभीर चिंतन-मनन की आवश्यकता है।

समाजशास्त्रीय सच्चाई यह है कि वर्तमान में संयुक्त परिवारों के टूटने से बालकों के सामाजीकरण की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। एक ओर माता-पिता की आर्थिक दबावों के चलते अनुपस्थिति से लगातार उन्हें प्रेम, स्नेह और वात्सल्य से वंचित होना पड़ रहा है। दूसरी ओर समाज का खुलापन, संचार क्रांति और मीडिया संस्कृति उनमें पारिवारिक प्रेम और वात्सल्य के प्रति पनपती वंचना के भाव की प्रतिपूर्ति बाहरी प्रेम से करने पर मजबूर कर रही है। कड़वा सच यह है कि इन बच्चों की वंचनाओं और उत्सुकताओं से संवाद बनाने का समय न तो परिवार के पास है और न ही स्कूल के पास। यही कारण है कि युवा वर्ग में समान आयु वर्ग (पीयर ग्रुप) के साथ घनिष्ठ संपर्क से रूमानी रिश्ते बनते हैं, सभ्यता के उत्तर-आधुनिक मानक बन रहे हैं और जाति-धर्म-संप्रदाय रहित सामाजिक और वैवाहिक संबंधों के नए तेवर खुल रहे हैं। उनके इन संबंधों में परिवर्तन की चाहत, तात्कालिक स्पंदन, अपनी शर्तों पर जीने की उत्कट अभिलाषा और कुछ कर गुजरने का साहस भी साफ तौर पर देखा जा सकता है।

आज चर्चा भले वैश्वीकरण की हो रही है, पर सामाजिक सोच के दायरे सिकुड़ रहे हैं। ऐसी दशा में देश की सर्वोच्च अदालत ने यह ज्वलंत निर्णय देकर जो सीख दी है उसके आलोक में हमें अपने पूर्वाग्रहों का समय रहते मूल्याकंन करने की आवश्यकता है। संविधान की धारा इक्कीस देश के हर व्यक्ति को शांतिपूर्वक और सम्मान से जीने का अधिकार देती है। इस सच को सामने रखते हुए वर्तमान समाज को भी इस जाति और विवाह के ढांचे का मूल्याकंन करना समय की मांग है। युवाओं के सामाजिक जीवन में अनुशासन की सीख देने में हम कमजोर रहे हैं। नतीजतन, इनके जीवन में जाति विवाह और गोत्र को लेकर इन संस्थाओं का कोई अर्थ नहीं रह जाता। निश्चय ही देश की सर्वोच्च अदालत ने खाप पंचायतों को गैरकानूनी करार देते हुए जिस तरह प्रेमी जोड़ों की सुरक्षा का भार पुलिस-प्रशासन पर डाला है उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। उम्मीद है कि अदालत के इस निर्णय के बाद अब खाप पंचायतों के साथ इनके पक्षकार राजनीतिक दल भी नई पीढ़ी के नए मानस को समझने का प्रयास करेंगे।

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