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कपिल स‍िब्‍बल जैसे नेताओं की बात मान कर भी नहीं उबर सकती कांग्रेस

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की राय में कांग्रेस का वोटबैंक अब उसके साथ नहीं रह गया है। जात‍ि और धर्म के आधार पर वोट बैंक ज‍िसके पास होगा, उसी पार्टी का आज देश में भव‍िष्‍य है। ऐसे में कांग्रेस के द‍िन खत्‍म हो गए लगते हैं।

Partition, Conspiracy, Britishers, India, Pakistan, Former SC Judgeतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (क्रिएटिवः जनसत्ता ऑनलाइन/नरेंद्र कुमार)

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने अपने पत्रों और साक्षात्कारों में कांग्रेस पार्टी के पुनरुत्थान के लिए लोकतांत्रिक बदलाव लाने का आह्वान किया है।उन्होंने ‘पार्टी में अफ़सोस की स्थिति’ की बात कही और कहा कि कांग्रेस को जनता ने भाजपा के लिए ‘प्रभावी विकल्प’ के रूप में नहीं देखा।

वह ऊपर से थोपे जाने के बजाय नेताओं के चयन, सामूहिक नेतृत्व और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं चाहते हैं। दूसरे लोग राहुल गांधी को ‘आक्रामक और प्रभावशाली’ भावना की कमी के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं और कहते हैं कि कांग्रेस का नेतृत्व कमज़ोर हो गया है। अन्य कई लोग कहते हैं कि कांग्रेस की केंद्र और राज्य इकाइयों में तालमेल नहीं है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता क‍ि इन सभी आरोपों में कुछ सच्चाई है। बिहार में हाल के राज्य चुनावों में कांग्रेस ने खराब प्रदर्शन किया।

जैसा कि कई राज्यों के उपचुनावों में भी हुआ (हाल ही में गुजरात में लोकसभा उपचुनावों में सभी 3 कांग्रेस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई)। मेरा मानना है कि न तो कपिल सिब्बल और न ही अन्य लोगों ने गहराई से कांग्रेस की इस दुर्दशा का सही विश्लेषण किया है। भारत में स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व करने के कारण स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस एक जबर्दस्त प्रतिष्ठा के साथ उभरी।

इस कारण इसने केंद्र और राज्यों दोनों में अधिकांश चुनावों में जीत हासिल की। जनमानस की स्मृति कमज़ोर होती है और कांग्रेस के नेताओं को जल्द ही एहसास हो गया कि वे केवल इस प्रतिष्ठा के दम पर हमेशा चुनाव नहीं जीत सकते। भारत एक अर्धसामंती देश है जिसमें जाति और धर्म शक्तिशाली ताकतें हैं।

इसलिए कांग्रेस ने एक गठबंधन बनाया जो भविष्य के चुनावों में भी जीत सुनिश्चित कर सके। इसमें 3 मुख्य समूह (1) उच्च जातियां (2) मुसलमान (3) अनुसूचित जाति थे। यूपी और बिहार जैसे बड़े उत्तर भारतीय राज्यों में उच्च जातियां (ब्राह्मण, राजपूत, बनिया, भूमिहार आदि) कुल आबादी का लगभग 16-18% हैं। मुसलमान लगभग 16-18% और अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 20% है।

इस गठबंधन का मतलब 50% से अधिक मत कांग्रेस को मिल जाते थे, जबकि चुनाव जीतने के लिए केवल 30% से अधिक मतों की आवश्यकता है। इस तरह कांग्रेस आज़ादी के बाद कई दशकों तक पूरे भारत में चुनाव जीतती आयी। यह गठबंधन अब टूट गया है। उच्च जातियों ने भाजपा के प्रति अपनी निष्ठा को स्थानांतरित कर दिया है।

दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद मुसलमानों ने कांग्रेस छोड़ दी (और यूपी में SP के साथ , बिहार में RJD के साथ गठबंधन किया) और यूपी में अनुसूचित जातियों ने अपनी पार्टी बनाई – BSP (जो कुछ अन्य राज्यों में भी उपस्थिति रखती है )। नतीजतन कांग्रेस के पास अब कोई जातिगत या धार्मिक वोट बैंक नहीं रह गया है। कांग्रेस कुछ सीटों पर सफल होती है।

लेकिन यह या तो किसी उम्मीदवार के व्यक्तिगत प्रभाव के कारण होता है, या किसी अन्य पार्टी (जैसे बिहार में RJD) पर गुल्लक की सवारी करके – जिसके वोट गठबंधन में होने पर मिलते हैं। इसलिए कपिल सिब्बल और अन्य लोगों के मायूसी और उदासी भरे विलाप के बावजूद कांग्रेस के लिए कोई भविष्य नहीं देखा जा सकता है।

भारत में ज़्यादातर लोग वोट बैंक के रूप में वोट करते हैं लेकिन कांग्रेस अब किस जाति या धर्म का प्रतिनिधित्व करती है? मेरे विचार में किसी का नहीं। भले ही इसके नेतृत्व में बदलाव हो और लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनायी जाएँ, जैसा कि कपिल सिब्बल की मांग है, इससे क्या फर्क पड़ेगा ? यह इन्हें कोई जाति या धार्मिक वोट बैंक नहीं देगा। मेरे विचार से अब कांग्रेस के दिन समाप्त हो गए हैं।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं। यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके न‍िजी हैं।)

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