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बाखबरः गालियां खाके बेमजा न हुआ

साफ हुआ कि आज के आलोचक फिल्म की आलोचना नहीं करते। आलोचना के नाम पर फिल्म का प्रमोशन करते हैं और उसका बाजार बनाते हैं। आलोचना का नया बाजार खुल गया है, जहां आलोचना विज्ञापन की भूमिका अदा करती है।

Author July 14, 2019 2:23 AM
भाजपा कांग्रेस पर हंसे यह तो समझ में आता है, लेकिन एंकर भी हर मौके पर कांग्रेस पर हंसें और कूटें, यह मीडिया की तमीज से परे नजर आता है। शिकारियों के साथ मिलकर कुछ एंकर स्वयं भी शिकारी बन जाते हैं। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

कर्नाटक का महानाटक। एक से एक कामिक दृश्य हैं, जो कभी मुंबई के पांच सितारा से और कभी गोवा से आते हैं। चैनल ब्रेकिंग लाइनों से भरे रहते हैं : कांग्रेस के दस और जेडीएस के तीन विधायक बागी हुए! कर्नाटक सरकार अब गिरी कि अब गिरी!
एंकर हंसते हुए कांग्रेस के प्रति नकली हमदर्दी जताते हैं कि हाय! कैसी अंतर्कलह है? एक सरकार तक नहीं संभाली जा रही?
कर्नाटक का एक कांग्रेसी नेता आरोप लगाता है कि भाजपा पैसे और पद का लालच देकर तोड़ रही है। शिवकुमार पांच सितारा में घुसना चाहते हैं, लेकिन पुलिस नहीं जाने देती। जब वे जिद करते हैं, तो मुंबई पुलिस मिलिंद देवड़ा सहित उनको हिरासत में ले लेती है।
कि इतने में विघटन गोवा पहुंच जाता है, जहां दस कांग्रेसी विधायक भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष नड््डा जी के साथ लाइन लगा कर खड़े हैं। एक चैनल लाइन देता है : कांग्रेस बिखर रही है।
एक भी एंकर उन आरोपों को अपना नहीं बनाता, जो कहते हैं कि पद और पैसे का लालच देकर खरीद-फरोख्त की जा रही है।
ये कैसे दिन आ गए हैं कि कांग्रेस के लिए रोने वाले भी नहीं नजर आते।
राहुल अमेठी विजिट करते हैं और चैनल बताने लगते हैं कि उन्होंने कार्यकताओं को ही हार का जिम्मेदार ठहराया। फिर वही अहंकार! वही नामदार! राहुल ने अपने को भी जिम्मेदार ठहराया, इसे चैनल क्यों भाव दें। कुछ एंकरों के लिए राहुल एक स्थायी ‘पंचिंग बैग’ हैं, जब चाहे दो-चार जड़ दो!
भाजपा कांग्रेस पर हंसे यह तो समझ में आता है, लेकिन एंकर भी हर मौके पर कांग्रेस पर हंसें और कूटें, यह मीडिया की तमीज से परे नजर आता है। शिकारियों के साथ मिलकर कुछ एंकर स्वयं भी शिकारी बन जाते हैं।
इस बेशर्म खबर को भी तोड़ते हुए खबर आती है कि नामी मानवाधिकारवादी वकील इंदिरा जयसिंह और सहयोगी आनंद ग्रोवर के दिल्ली और मुंबई स्थित ठिकानों पर सीबीआई छापे डाल रही है। ‘यह बदलेखोरी है’ कह कर इंदिरा जी कार में बैठ कर निकल जाती हैं।
इस बीच नागपुर विश्वविद्यालय, ‘राष्ट्र निर्माण में आरएसएस का योगदान’ पढ़ाने के लिए बीए के पाठ्यक्रम में एक यूनिट तय कर देता है। इस पर एक परिचित-सी हाय-हाय होने लगती है कि यह पाठ्यक्रमों के भगवाकरण की शुरुआत है, लेकिन इस बार हाय हाय वादी आलोचक हाय हाय करने से पहले ही कहने लगते कि पाठ्य्रकमों में संघ के बारे में भी बताया जाए, इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है, लेकिन उसके आलोच्य बिंदुओं को भी पढ़ाया जाए।
एक अंग्रेजी एंकर को संघ का पाठ्यक्रम में लगना इतना पसंद आता लगा कि मानो कोर्स में अभी दाखिला ले लेंगी।
इन दिनों फिल्म वाले मीडिया पर ही चढ़े हुए हैं। क्यों न चढ़ें? जब आए दिन मीडिया उनकी दो कौड़ी की किसी नई रिलीज के पहले हीरो हीरोइनों की आरती उतारता रहता है तो वे मीडिया को क्यों न ठोकें!
इस बार ‘तमिल फिल्म संघ’ ने फिल्म आलोचकों को फिल्मों की आलोचना करने से वर्जित कर दिया और कह दिया कि फिल्मों की कठोर आलोचना बर्दाश्त नहीं होगी। एंकर रोते रहे कि ये तो अभिव्यक्ति की आजादी पर ही हमला है, लेकिन बाद में पता नहीं क्यों इसे लेकर एंकर एकाध टिप्पणी के बाद एकदम चुप लगा गए।
इसी बीच एक अंग्रेजी चैनल ने मर्दवाद की आलोचना करते हुए भी प्रेमिका पर मर्दवादी ‘थप्पड़लीला’ का समारोह करने वाली और ‘स्त्री-विद्वेष’ बेचने वाली फिल्म ‘कबीर सिंह’ के ढाई सौ करोड़ कमाने पर दुख मनाने की जगह खुशी जाहिर की।
एक ने तो कहा भी कि इसकी आलोचना के बावजूद इसने ढाई सौ करोड़ की कमाई कर डाली। कितनी बढ़िया बात!
साफ हुआ कि आज के आलोचक फिल्म की आलोचना नहीं करते। आलोचना के नाम पर फिल्म का प्रमोशन करते हैं और उसका बाजार बनाते हैं। आलोचना का नया बाजार खुल गया है, जहां आलोचना विज्ञापन की भूमिका अदा करती है।
यकीन न हो तो कंगना रनौत के उस वीडियो की लंबी खबर और तज्जन्य बहसों को देख लीजिए, जहां आपको आलोचना मीडिया और मार्केटिंग के सारे नए सूत्र काम करते मिल जाएंगे:
कंगना की ‘मेंटल है क्या’ की जगह नए नाम की फिल्म ‘जजमेंटल है क्या’ रिलीज होने को है। उसके धांसू प्रोमो के लिए जरूरी है कि कुछ धांसू एक्शन किया जाय। इन दिनों सबसे सुरक्षित एक्शन होता है मीडिया की ठुकाई। सो, कंगना जी बिना किसी तात्कालिक कारण के एक पत्रकार के बहाने सारे मीडिया पर अपने ‘देशराग’ के साथ बरस पड़ती हैं, लेकिन वाह रे मीडिया, कि उनको ‘बैन’ करने की धमकी देकर भी वह उनके गाली भरे वीडियो को बार-बार दिखा कर बहस कराने लगता है और इस तरह ‘जजमेंटल है क्या’ का विवाद प्रेरित ‘प्रोमो’ होने लगता है।
अपनी ‘विक्टिमहुड’ को ‘सेलीब्रेट’ करते हए वे अपनी क्षुब्ध किंतु मृदु वाणी में पत्रकारों को एक से एक सुंदर गाली सुनाती चली जाती हैं कि पत्रकार दीमक की तरह देश की एकता को, इंटेग्रिटी को ‘अटैक’ करता रहता है। देशद्रोहिता फैलाता है। ये सूडो जर्नलिस्ट। मीडिया दोगला है। बिकाऊ है। ये चिंदी पत्रकार मुफ्त का खाना खाने घुस जाते हैं। नालायको। देशद्रोहियो। सस्ते बिकाऊ। झूठी अफवाहें फैलाते हैं। पचास साठ रुपए में बिक जाते हैं… तुम्हारा चूल्हा मेरी वजह से क्यों जले?
गालियां खाकर भी एंकर कहते हैं कि कंगना की मीडिया की आलोचना किसी हद तक सही है, लेकिन मीडिया को गंदी गालियां क्यों दे रही हैं? कोई पूछे कि वे गालियां दे रही हैं, तो आप ले क्यों रहे हैं?
इसे कहते हैं : गालियां खाके बेमजा न हुआ!

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