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12 साल की उम्र में ही सरोजिनी नायडू ने पास कर ली थी मैट्रिक की परीक्षा, विदेश में पढ़ाई के लिए निज़ाम ने दिया था वजीफा

सरोजिनी नायडू ने गांधीजी के अनेक सत्याग्रहों में भाग लिया और 'भारत छोड़ो' आंदोलन में वह जेल भी गईं। 1925 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं।

निशिकांत ठाकुर

ढक लो मेरे नयन, हे मेरे प्रेम , मेरी नयन जो कि हैं आनंद से निढाल!
ऐसे प्रकाश की तरह, जो कि है तीक्ष्ण और सशक्त!
अहा! मौन मेरे अधर, अधरों के ही स्पर्श से
मेरे अधर जो कि हैं गान से निढाल! (सरोजिनी नायडू)

भारत कोकिला की उपनाम से सुपरिचित सरोजिनी नायडू की कविताओं में प्रेम एक सरस-सहज प्रवाह की तरह दिखाई देता है। प्रेम की यह उपस्थिति उनके लिए केवल कविताओं का विषय नहीं थी। डॉ. अघोरनाथ चट्टोपाध्याय की बेटी और गोपालकृष्ण गोखले की शिष्या सरोजिनी के जीवन के हर क्षेत्र में यह प्रभाव दिखाई देता है। चाहे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए संगठन का कार्य हो या फिर सामाजिक क्षेत्र में कार्य, उनसे मिलने वाला कोई भी व्यक्ति उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था।

ग़रीबी, अभाव, स्ट्रीट लाइट की रोशनी में अपनी पढ़ाई करके उससे तपकर निकले डॉक्टर अघोरनाथ चट्टोपाध्याय तथा वरदा सुंदरी देवी के घर आठ भाई बहनों में सबसे बड़ी लड़की का जन्म 13 फ़रवरी 1879 में हुआ था। जिसका नाम प्यार से माता पिता ने सरोजिनी रखा। बालकाल से ही वह तीक्ष्ण बुध्दि की थी। वैसे तो डॉक्टर अघोरनाथ के सभी बच्चे उद्भट विद्वान और एक से एक थे, जिनमें चार बेटे वीरेंद्र नाथ, भूपेंद्र नाथ, रानेंद्र नाथ और हरिंद्रनाथ तथा चार बेटियाँ मृणालिनी, सुनलिनी और सबसे छोटी सुहासिनी शामिल हैं। ये सभी उच्च शिक्षा के साथ-साथ समाजसेवा के अपने कार्यों के लिए आज भी याद किए जाते हैं।

अघोरनाथ चट्टोपाध्याय का बचपन अपने पुरखों के गाँव ब्रह्मनगर में बीता था। यह पूर्वी बंगाल के प्राचीनतम गाँवों में से एक है। 1878 में वे न्यू हैदराबाद कालेज के संस्थापक और प्रिंसिपल बने और शिक्षा शास्त्री और वैज्ञानिक कहलाए। आगे चलकर यही कालेज निजाम कालेज के नाम से विख्यात हुआ। यहीं उनकी बेटी सरोजनी का जन्म हुआ, जिसे आज हम भारत कोकिला कहते हैं।

एक बार डॉक्टर अघोरनाथ रेलगाड़ी से यात्रा करने जा रहे थे। उन्हें प्रथम श्रेणी का टिकट खरीदने से जबरदस्ती रोका गया। फिर सैनिकों द्वारा बलपूर्वक द्वितीय श्रेणी में चढ़ाया गया। ट्रेन के डब्बे में उपस्थित यात्रियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “भाइयों आप इस बात के साक्षी हैं कि मैं इस डब्बे में स्वेच्छा से नहीं चढ़ा हूँ। मुझे इसके लिए विवश किया गया।” उन दिनों अंग्रेजों की समांतशाही अपने पूरे उफान पर थी। इस अपमान से डॉ. अघोरनाथ व्यग्र हो गए और उसके खिलाफ मुहिम चलाना, अंग्रेजों को भारत से भगाना उनका उद्देश्य बन गया।

अपनी कुशाग्र बुध्दि के कारण सरोजिनी ने अपने तीन वर्ष के पाठ्यक्रम को एक वर्ष में पूरा कर लिया और बारह वर्ष की उम्र में ही 1891 में मैट्रिकुलेशन प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई। चूंकि हैदराबाद में उस समय कोई हाई स्कूल नहीं था इसलिए सरोजिनी को मद्रास जाकर परीक्षा देनी पड़ी थी। इस बीच सरोजिनी ने कविता और नाटक लिखना शुरू किया। फारसी नाटक ‘मेहर मुनीर’ निजाम को बहुत पसंद आया और उन्होंने इंगलैंड जाने आने के खर्च के साथ ही 300 पाउंड का वजीफा प्रतिवर्ष सरोजिनी को देने की घोषणा की। वह 16 वर्ष की ही उम्र में इंग्लैंड पहुँचीं। सरोजिनी कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में दाखिला लेना चाहती थीं, लेकिन कम आयु के कारण उन्हें दाखिला नहीं मिला।

इसी कारण उन्होंने किंग्स कॉलेज में दाखिला ले लिया। वहीं उनकी भेंट एडमंड गौस से हुई जिनसे उन्हें कवयित्री बनने की प्रेरणा मिली। दो वर्ष किंग्स कॉलेज में पढ़ने के बाद सरोजिनी ने गर्टन कॉलेज में दाखिला ले लिया। इंग्लैंड में वह इतनी परिपक्व हो गईं कि उनकी कविताओं ने उन्हें बुलंदी के शिखर पर अग्रसर कर दिया। स्वदेश लौटने के बाद दिसंबर 1898 में डॉ. गोविंद रजुलू नायडू के साथ दांपत्य सूत्र में बंध गई। डॉ. नायडू ने एडनबरा यूनिवर्सिटी से चिकित्सा शास्त्र की उपाधि प्राप्त की थी। उसी दिन से सरोजिनी चटोपाध्याय, सरोजिनी नायडू बन गईं।

अब सरोजिनी नायडू का कविता के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र में भी दृष्टि विस्तार होने लगा था। सरोजिनी नायडू गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु, प्रणेता और अग्रणी मानती थीं। गोखले ने सरोजिनी नायडू के लिए लिखा है कि मैं तुम्हे अपनी ओर से बहुत सम्मान और उत्साहपूर्ण बधाई देता हूँ। तुम्हारा भाषण श्रेष्ठतम कोटि की बौद्धिक वकृत्त्ता से अधिक एक कला कृति था । हम सब ने एक पल के लिए ऐसा अनुभव किया हम किसी उन्नत स्तर तक उठ गए हैं।

सरोजिनी नायडू के पिता अघोरनाथ 1915 में कलकत्ता और राजनीतिक पिता गोपाल कृष्ण गोखले का पूना में निधन हो गया। इन दोनों की कमी को पूरा करने के लिए सरोजिनी के जीवन में महात्मा गांधी का प्रवेश हुआ। गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से सत्याग्रह आंदोलन का सफल संचालन करने के बाद भारत आए थे भारत आकर उन्होंने भारतीय राजनीति को प्रभावित करना शुरू कर दिया था।

1916 में लखनऊ में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में सरोजिनी नायडू की भेंट पंडित जवाहरलाल नेहरू से पहली बार हुई उस भेट से प्रभावित होते हुए पंडित नेहरू ने कहा, “मुझे याद है, उन दिनों सरोजिनी नायडू के अनेक भाषणों का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा है। उनके भाषण राष्ट्रीयता से ओतप्रोत होते हैं और मैं एक शुद्ध राष्ट्रवादी हूँ। अपने अध्ययन काल में मेरे मस्तिष्क में जो अस्पष्ट से समाजवादी विचार बन गए थे, वे अब लोप हो गए हैं।” फिर देश के विभिन्न क्षेत्रों में घूम-घूम कर अपने ओजस्वी और भावपूर्ण भाषणों से अपने ज्ञान और विवेक का परिचय देती रहीं। देश के सारे उच्च कोटि के स्वतंत्रता सेनानी उनकी प्रशंसा करने लगे। वह जब भी कलकत्ता जाती विश्व कवि कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर से निश्चित रूप से मिलती। 1917 को हैदराबाद से उन्होंने विश्वकवि को अपनी कविता संग्रह ‘भग्न पंख’ एक तुच्छ उपहार कह कर भेजा।

सरोजिनी नायडू ने गांधीजी के अनेक सत्याग्रहों में भाग लिया और ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में वह जेल भी गईं। 1925 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। वे उत्तरप्रदेश की गवर्नर बनने वाली पहली महिला थीं। वे ‘भारत कोकिला’ के नाम से जानी गईं। नायडू ने कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण के समय कहा था, “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को (सभी को) जो उसकी परिधि में आते हों, एक आदेश देना चाहिए कि केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं में वे अपनी सीटें खाली करें और कैलाश से कन्याकुमारी तक, सिन्धु से ब्रह्मपुत्र तक एक गतिशील और अथक अभियान का श्री गणेश करें।”

पंडित जवाहलाल नेहरू के बारे में एक बार सरोजिनी नायडू से कहा था, “प्रधानमंत्री आते-जाते रहते हैं, लेकिन जवाहरलाल नेहरू एक ही है। वह सितारों तक जाने और वहाँ से आशा तथा साहस का संदेश और आत्मा की वह संपदा लेने के लिए व्यग्र रहता है, जिसे स्वतंत्रता कहते हैं।” फरवरी 1949 तत्कालीन गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी से मिलने गईं। अचानक उनका सिर कार की नीची छत से टकरा गया। 18 को उन्हें साँस लेने में कठिनाई महसूस होने लगी उन्हें ऑक्सीजन चढ़ाया गया। एक मार्च को उन्होंने नर्स से कहा कि मैं चाहती हूँ कि मुझसे कोई बात न करे। यही उनके अंतिम वाक्य साबित हुए।

दो मार्च को प्रातः से तीन बजे उनके प्राण पखेरू उड़ गए और वह सदैव के लिए गहरी नींद में सो गईं। लखनऊ में गोमती नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार किया गया। भारत कोकिला श्रीमती सरोजिनी नायडू के जन्मदिवस (13 फरवरी) को भारतवर्ष में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। महान वक्ता, प्रेरणस्रोत और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भारत कोकिला को बार बार नमन। एक महिला होकर उन्होंने इस संग्राम में जो कुछ किया वह इतिहास में दर्ज है हमारी भारतीयता के इस प्रकाशपुंज को हमारा भारतीय समाज, भारतीय युवा हमेशा याद करता रहेगा। एक बार फिर नमन। (इस लेख के लिए मूलभूत तथ्य एम आई राजस्वी की पुस्तक ‘भारत कोकिला सरोजिनी नायडू’ से साभार लिए गए हैं)।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)।

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