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ब्‍लॉग: ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन का मजाक उड़ाने वालों को अपना नजरिया बदलने की जरूरत

ओलंपिक पदकों से सराबोर देशों में खेल सिर्फ खेल होता है, जिसके लिए खिलाड़ियों को बचपन से तैयार किया जाता है।

रियो में साक्षी मलिक ने कांस्‍य और पीवी सिंधू ने रजत पदक जीता है।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

इस समय रियो ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन को लेकर निराशा का माहौल है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या वाकई हमें निराश होने की जरुरत है? और यदि है भी तो क्या निराशा के मापदण्ड मात्र खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर या देश को मेडल न मिलने तक सिमट जाने चाहिए? क्या चंद तथाकथित बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों की आधारहीन टिप्पणियों से 118 भारतीय खिलाड़ियों की प्रतिभाएँ परिहास का कारण बन जाएगीं? भारतीय खिलाड़ी अपना श्रेष्ठ देकर रियो ओलंपिक के लिए क्‍वालिफाई हुए थे। रियो ओलंपिक 2016 तक पहुँचने में भारत और भारतीय खिलाड़ियों ने हमेशा निराशा नहीं किया।

भारत के खिलाड़ियों में से चंद कुछ ही खिलाड़ी ऐसे होते हैं जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में सम्पन्नता, व्यक्तिगत प्रशिक्षण और मार्गदर्शक माता-पिता होते हैं। निःसंदेह ओलंपिक विजेता बनने के लिए ये कारक बहुत सहायक होते हैं। इसका उदाहरण भारत के वे सम्पन्न खिलाड़ी हैं जिनकी मेहनत और समर्पण भावना के साथ साथ उनकी अपनी सुदृढ़ सामाजिक, आर्थिक व पारिवारिक परिस्थितियों का भी उनकी विजय पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अन्यथा शेष खिलाड़ियों के पास अपनी व्यक्तिगत खेल क्षमता के अतिरिक्त सब कुछ वैसा ही साधारण सा विपन्नता और संघर्षों से भरा सामाजिक परिवेश होता है, जिनमें कम पढ़ेलिखे माता पिता, पैबंदों में झांकती विपन्नता और जिजीविषा की जुगाड़ के साथ लिपटी समर्पित खेलभावना चाहकर भी कुछ न कर पाने की पीड़ा देती रहती है। फटे जूतों वाले मिल्खा सिंह से लेकर दो बच्चियों की परवरिश के तनाव में पारिवारिक व्यवस्थाओं के साथ संघर्ष करतीं मेरीकॉम तक, रियो में अपनी बीमार मां को गरीबी की गोद में सुलाकर गए महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त गाँव के नौकायन खिलाड़ी दत्तु बबन भोकनल तक जाने कितने अनाम भारतीय खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ अपनी खेल श्रेष्ठता के बल पर ओलंपिक में क्‍वालिफाई तो हो जाते हैं, परन्तु कहीं न कहीं उनकी प्रारब्धीय पृष्ठभूमि उनका पीछा नहीं छोड़ती।

ऐसे में हम भारतीयों को निराश किस पहलू पर होना चाहिए। बरसों से ढर्रे पर चली आ रही उस शिक्षाप्रणाली के लिए, जहाँ स्कूलों में खेल सिर्फ एक्सट्राक्यूरिकुलर एक्टिविटी के अन्तर्गत आते हैं। ओलंपिक पदकों से सराबोर देशों में खेल सिर्फ खेल होता है, जिसके लिए खिलाड़ियों को बचपन से तैयार किया जाता है। भारतीय समाज में खेल आभिजात्य वर्ग में प्रतिष्ठा का, तो साधारण मध्यमवर्गीय समाज में थोड़े से मनोरंजित हो जाने से अधिक कुछ और अर्थ नहीं रखता रहा है। साठ और सत्तर के दशकों तक खेले गए भारतीय गाँवों में कबड्डी व कुश्ती तथा शहरों में हॉकी को क्रिकेट की चमचमाती सम्पन्नता ने बुरी तरह हाशिए पर पहुँचाने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी।

भारत सरकार द्वारा सन् 1984 में प्रथम राष्ट्रीय खेल नीति बनाने के बाद से अब तक अनेक खेलों के विकास और प्रोत्साहन के लिए अनेक कल्याणकारी तथा उत्‍कृष्‍ट योजनाओं एवं कार्यक्रमों की शुरुआत की गई है। भारत में खेलों के प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अनेक संस्थान भी स्थापित किए गए हैं। बस यद्यपि इन समस्त खेल संस्थानों के बारे में आम लोगों को जानकारी ही नहीं है। यही कारण है कि गणितीय तौर पर इन सुविधाओं की उपलब्धता के बावजूद भी खेलों के साथ हम न्याय नहीं कर पा रहे हैं।

रियो ओलंपिक में भारत के बेहतर प्रदर्शन के बावजूद भी मेडल न लाने पर खिलाड़ियों की आलोचना और परिहास करने वाले लोगों को अपनी निराशा को इन सभी तथ्यों से भी जोड़कर देखना चाहिए। भारत में खेल हेतु एक रचनात्मक मॉडल, समग्र दृष्टिकोण और सुदृढ़ आर्थिक ढांचे का निर्माण अति आवश्यक है। जिन खिलाड़ियों ने ओलंपिक में मेडल जीते वे निःसंदेह अकूत धनराशि के पुरस्कारों के हकदार हैं, परन्तु उनका क्या जो पहले से अपना सब कुछ लुटाकर गए थे, प्रदर्शन भी अच्छा किया, पर परिस्थितिजन्य तरीके से पराजित हो गए, मेडल नहीं ला पाए, तो घर आकर भी वही ढाक के तीन पात। ऐसा उपेक्षित व्यवहार भी निराशा का पूरक पहलू है। निराशा से मुक्ति के लिए खिलाड़ियों को वित्तीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सुरक्षा की वास्तविक प्रतिश्रुति देनी होगी।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा स्‍वतंत्र लेखिका हैं। इस लेख में उनके द्वारा प्रकट किए गए विचार पूर्णतया निजी हैं।

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