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Blog: आरक्षण और बढ़ाना चाहिए या खत्म करना चाहिए? कैसे होगा? समझिए

आजादी के 70 सालों के बाद भी भारत में आरक्षण व्यवस्था खत्म नहीं हो पायी है और बल्कि इसमें विस्तार ही हुआ है। यह विस्तार इस हद तक पहुंच गया है कि अब अगड़ी जातियां भी आरक्षण की मांग करने लगी हैं।

Author December 2, 2018 4:37 PM
आरक्षण के मुद्दे पर लंबी बहस हो सकती है, लेकिन फिलहाल इसका कोई विकल्प दिखाई नहीं देता। (pti photo/file)

बीते गुरुवार को महाराष्ट्र विधानसभा में मराठा समुदाय को 16% आरक्षण देने का प्रस्ताव एकमत पारित हो गया। यह प्रस्ताव राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही कानून का रुप ले लेगा। इसका मतलब ये होगा कि महाराष्ट्र में एससी/एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के अलावा मराठा समुदाय को भी शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलना शुरु हो जाएगा। महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण लागू होने के बाद आरक्षण की सीमा बढ़कर 68% हो जाएगी। जिसके बाद महाराष्ट्र भी उन राज्यों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा, जिनमें आरक्षण की सीमा 50% से भी ज्यादा हो चुकी है। बता दें कि तमिलनाडु में सबसे ज्यादा 69%, हरियाणा में 67%, तेलंगाना में 62% और राजस्थान में 54% तक आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। ध्यान देने वाली बात ये है कि देश में इन दिनों आरक्षण की मांग को लेकर कई राज्यों में आंदोलन चल रहे हैं। खास बात ये है कि आरक्षण की मांग अब उन जातियों या समुदायों द्वारा की जा रही है, जिनकी गिनती संपन्न समुदायों में की जाती है। इनमें गुजरात का पाटीदार समुदाय का आंदोलन, आंध्र प्रदेश का कापू समुदाय का आंदोलन, हरियाणा का जाट समुदाय का आंदोलन और राजस्थान का गुर्जर समुदाय का आंदोलन प्रमुख है।

यहां ये सवाल उठना लाजमी है कि संपन्न और अगड़ी जातियां भी आरक्षण की मांग क्यों कर रही है? और वहीं दूसरी तरफ आरक्षण को लेकर कुछ लोगों द्वारा सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं? इस सवाल के जवाब के लिए थोड़ा इतिहास का रुख करना होगा। हमारे देश में जातिवादी व्यवस्था की जड़े काफी गहरी रही हैं। जिसके चलते समाज के दबे-कुचले समुदायों को लंबे समय तक हाशिए पर रहना पड़ा था। जिसके बाद अंग्रेजी शासनकाल में देश के अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े समुदाय के लोगों के सामाजिक उत्थान के लिए आरक्षण की मांग उठी। शुरुआती विरोध के बाद इस मांग को मान लिया गया और इसे लेकर आजादी के बाद भारतीय संविधान में कानून भी बना दिया गया। शुरुआत में आरक्षण का प्रावधान करते समय ये माना गया था कि अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्ग के सामाजिक उत्थान के बाद आरक्षण व्यवस्था को खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे ये आरक्षण व्यवस्था भारतीय लोकतंत्र में वोटबैंक का आधार बन गई। राजनैतिक पार्टियों ने वोट पाने के लिए आरक्षण के मुद्दे को भुनाया। जिसका नतीजा ये निकला कि आजादी के 70 सालों के बाद भी भारत में आरक्षण व्यवस्था खत्म नहीं हो पायी है और बल्कि इसमें विस्तार ही हुआ है। यह विस्तार इस हद तक पहुंच गया है कि अब अगड़ी जातियां भी आरक्षण की मांग करने लगी हैं।

हैरानी की बात ये है कि आरक्षण व्यवस्था लागू होने के बावजूद देश के अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों के सामाजिक जीवन में कोई आमूल-चूल बदलाव नहीं आया है और कुछ लोग ही इस आरक्षण व्यवस्था का फायदा उठा रहे हैं। इसके बावजूद राजनैतिक परिदृश्य को देखते हुए इसके आसार बेहद कम हैं कि देश में आरक्षण की मांग में कुछ कमी आएगी। बीते दिनों आर्थिक आधार पर भी आरक्षण देने की मांग उठी थी, लेकिन वोटबैंक की राजनीति के आगे ये पहल भी दम तोड़ती नजर आयी। बता दें कि आरक्षण का मुद्दा ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ हमारे देश का मुद्दा है। हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी 56% तक आरक्षण की व्यवस्था है। हालांकि बीते दिनों ही बांग्लादेश सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए कहा था कि वह देश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था खत्म करने जा रही है। अभी इस पर वहां की संसद में मंथन होगा, लेकिन सरकार का यह कदम काफी अहम माना जा रहा है। पाकिस्तान में तो सरकारी नौकरियों में आरक्षण 92% तक है। यकीनन इन देशों में भी आरक्षण को लेकर कुछ तबकों को आपत्ति है। लेकिन वहां भी इसका फिलहाल कोई विकल्प नहीं मिल पाया है।

आरक्षण को खत्म करना बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता। चूंकि देश में कुछ तबकों के लोग इस आरक्षण व्यवस्था के कारण ही मुख्यधारा में आ रहे हैं और सशक्त हो रहे हैं। आरक्षण को लेकर लंबी-चौड़ी बहस हो सकती है, लेकिन इसका फिलहाल अपने देश में भी कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा है। सरसरी तौर पर कहें तो इसका विकल्प सर्वसुलभ और मुफ्त शिक्षा व्यवस्था हो सकती है। खासकर सरकार को देश के सरकारी स्कूलों में होने वाली पढ़ाई के स्तर को सुधारने के लिए गंभीर प्रयास करने की जरुरत है, क्योंकि देश का अधिकतर गरीब और पिछड़ा तबका इन्हीं सरकारी स्कूलों से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पाता है। यदि सभी बच्चे समान स्तर की गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मुफ्त में हासिल कर सकेंगे तो फिर सभी को एक ही प्लेटफॉर्म पर प्रतिस्पर्धा करने में शायद ही कोई परेशानी हो। तब हो सकता है कि देश की आरक्षण व्यवस्था को लेकर बात की जा सके। लेकिन फिलहाल तब तक आरक्षण व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है। यहां सबसे अहम बात ये है कि इसके लिए शुरुआत, देश के नेताओं और राजनैतिक पार्टियों को करनी होगी और देश के पिछड़े और गरीब तबके को सशक्त करने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।

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