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आतंकवाद के धर्म की गूढ़ मीमांसा

रमजान महीने के दौरान भारतीय सेना का आतंकवादियों के विरुद्ध जम्मू-कश्मीर में अपना ऑपरेशन स्थगित रखने की प्रतिबद्धता में राजनीतिक विवशताएं हो सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आतंकवाद के लिए कैसा रमजान या कैसा इस्लाम?

Author नई दिल्ली | May 17, 2018 12:11 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

धर्म और आतंकवाद कभी संबंधी नहीं हो सकते, क्योंकि विश्व का कोई भी धर्म आतंकवाद जैसी कुप्रवृत्ति का समर्थन कर ही नहीं सकता। धर्म मनुष्यता का संरक्षक है, वहीं आतंकवाद इसका संहारक है। अर्थात दोनों के उद्देश्य विपरीत और विरोधी प्रकृति के हैं। इतनी स्पष्टता के पश्चात् भी आतंकवाद को रमजान की पवित्रता से जोड़ना धर्म का सम्मान अवश्य हो सकता है, लेकिन आतंकवाद और आतंकवादियों के लिए प्रश्रय का अभयदान ही है। रमजान महीने के दौरान भारतीय सेना का आतंकवादियों के विरुद्ध जम्मू-कश्मीर में अपना ऑपरेशन स्थगित रखने की प्रतिबद्धता में राजनीतिक विवशताएं हो सकती हैं, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आतंकवाद के लिए कैसा रमजान या कैसा इस्लाम? क्या यह कदम आतंकवाद को धर्म दे रहा है या उनकी गतिविधियों को धार्मिक मीमांसाओं की स्वतंत्रता प्रदान कर रहा है।

एक महीने में साजिशों और षडयंत्रों को रचने की बैखोफ आजादी और धार्मिक मानदण्डों पर कश्मीरियों के मस्तिष्कों को तराश पाने की निडर स्वच्छंदता निःसंदेह आतंकवादियों के लिए रमजान का तोहफा ही साबित हो सकती है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा इंटरनेशनल बॉर्डर और लाइन ऑफ कंट्रोल के पास सैकड़ों बार सीजफायर उल्लंघन, सीमा पार से होने वाली अमानवीयता भरी गोलीबारियां, स्थानीय नागरिकों की हत्याएं और इन सबसे बढ़कर देश के सम्मानीय सुरक्षा कर्मियों की शहादतें क्या वास्तव में इन सभी का रमजान से कोई संबंध दिखाई देता आया है, कदापि नहीं। फिर रमजान की पाकीज़ियत को आतंकवाद की दरिंदगी से जोड़ना कहां की शराफत हो सकती है।

राष्ट्रों को विशेष रूप से हमारे भारत को प्रारम्भ से ही अपनी शराफत का खामियाजा चुकाना पड़ा है और पड़ता है और शाटद पड़ता रहेगा, मानो यह उसका प्रारब्ध बन गया है। नासूरों पर मलहम लगाने वाले ही बीच बीच में जख्म को कुरेदने लगते हैं और लगता है कि बीमारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। भारत के लिए पाकिस्तानी आतंकवाद ऐसी ही लाइलाज बीमारी बन गई है। अपने-अपने हिसाब से सब उसका इलाज कर रहे हैं, पर सम्भवतः सबकी अपनी स्वार्थपरकताएं स्वयं यह चाहती हैं कि बीमारी बनी रहे, तो बेहतर है। देश में समस्याएं और मुद्दे ज्वलंत बने रहते हैं, मनुष्य अब कश्मीर में संख्याएं बन गए हैं और इसलिए उनके रुधिरों के इस्तेमाल राजनीतिक पिपासा की शांति से अधिक और कोई मायने नहीं रखते।

कश्मीर, आतंकवाद, शहीद, इस्लाम, जेहाद, पत्थर, पैलेटगन, ये कीवर्ड्स बन गए हैं। इनकी अपनी सीमित परिभाषाएं हैं, जो हर रोज बदलती हैं या यूं कहें कि एक दूसरे में रूपांतरित होती रहती हैं। कश्मीर को धरती का स्वर्ग कही जाने वाली परिभाषा भी इसी तरह रूपांतरित हो गई है। कश्मीर अब अपने स्वर्ग की भयावह परिभाषा का स्वरूप ले चुका है। वह सचमुच का स्वर्ग बन गया है, जहां लोग अपने दैहिक रूप में न रह पाने के लिए बाध्य कर दिए गए हैं और आतंकवादी यमदूत का काम कर रहे हैं।

इन मायनों में कहा जाए तो आतंकवाद को धर्म से जोड़ा जा सकता है। आतंकवादी अपने धर्म के अनुकूल काम कर रहे हैं। हां यह अवश्य है कि मानवता की कसौटी पर आतंकवाद का धर्म नकारात्मक भले ही है, पर वे अपने धार्मिक उन्माद के साथ मानवता की हत्या करते आ रहे हैं। यानि आतंकवाद का धर्म है, जिसमें अधर्म की गूढ़ता का रहस्य छिपा हुआ है। ऐसे में रमजान के साथ आतंकवाद को जोड़ देने की एल्गोरिद्म सिद्ध हो जाती है। भारत तुम्हें यह सूत्रसिद्धि सहन करनी होगी।

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