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रामचंद्र गुहा का ब्लॉग: अभी आज़ादी दूर है, आज भी दंगों में या वैसे भी मुसलमानों को ज्यादा नुकसान सहना पड़ता है

स्वतंत्रता के 69 साल के बाद हमें भारतीय उससे तो कहीं ज्यादा स्वतंत्र है जितना ब्रिटिश हमे छोड़कर गए थे लेकिन उतना भी स्वतंत्र नहीं हुए जितना कि हमारे संविधान बनाने वालों ने आशा की थी।

Author August 15, 2016 4:38 PM
2002 गुजरात दंगे की फाइल फोटो (Express archive)

आजादी के 69 साल बाद क्या भारतीय स्वतंत्र है? हर भारतीय उस दिन स्वतंत्र होगा जब वह अपना वोट देने के लिए स्वतंत्र हो। अगर हम वेस्टर्न मॉडल की बात करें तो भारत में गरीब और वंचितों के वोट, अमीरों और समृद्ध लोगों की तुलना में ज्यादा है और वह वोट देने के लिए ज्यादा खतरा भी उठाते हैं। जैसे छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिलाएं नक्सलियों के बॉयकॉट के बाद भी बाहर निकलीं और वोट डाले। कुछ ऐसा ही कश्मीर और नागालैंड में भी देखने को मिला। कश्मीर और नागालैंड में महिलाओं और पुरुषों ने अलगाववादियों के फरमान के बाद भी वोट किया। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने टिप्पणी की थी कि कम से कम आम चुनाव के समय पूरे भारत के लोग एक है। भारत दुनिया की सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है, लेकिन हर आम चुनाव के बीच भारतीय कितने आजाद (स्वतंत्र) होते हैं?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए स्वतंत्रता के विचार को चार भागों में विभाजित किए जाने की जरुरत है। राजनैतिक, आर्थिक, सोशल और सांस्कृतिक स्वतंत्रता। राजनैतिक स्वतंत्रता में वोट देने के अधिकार (राइट टू वोट) के साथ रहने का अधिकार (राइट टू लीव), विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी और अन्यायपूर्ण कानून या दमनकारी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन (अहिंसक) का अधिकार शामिल है। भारत में, आंदोलन की स्वतंत्रता पर्याप्त है। विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पुरातन कॉलोनियल कानूनों के कारण कम है। किसी एक संगठन और अन्य के द्वारा किसी फिल्म, किताब, आर्टवर्क को केवल इस आधार पर प्रतिबंधित कर दिया जाता है कि वह उसकी संवेदनशीलता को ठेस पहुंचाता है। शायद महात्मा गांधी एकमात्र भारतीय नेता होंगे जिनकी बिना किसी डर के आलोचना की जा सकती है। भारत राजनैतिक आजादी की गारंटी देता है लेकिन सत्ता में रहने वाले राजनेता इसे दबाते रहे हैं। जैसे मीडिया हाउसों पर सत्ताधारी दल के नेताओं के खिलाफ गंभीर खबरों को दबाया जाना। अहिसंक सत्याग्रहियों के विरोध प्रदर्शन को देश को तोड़ने वाला बताकर जेल में डालना। कश्मीर में भारतीय पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को जिस निर्दयता से कंट्रोल किया गया वह इसका हालिया उदाहरण है। शक्तियों का इस तरह से गलत उपयोग करना लोकतंत्र की साख को नुकसान पहुंचाता है।

1950 से 1960 के बीच भारत अहिंसक असंतोष और बौद्धिक आलोचना के मामले में आज से ज्यादा सहिष्णु था, लेकिन आर्थिक आजादी के आधार पर कम असहिष्णु था। सी राजगोपालाचारी ने कहा था लाइसेंस-परमिट-कोटा राज जैसे प्रतिबंधों के कारण इंटरप्रेन्योर को यह नहीं समझ आता है कि क्या करना और क्या नहीं करना है। 1990 में आर्थिक आजादी की दिशा में सुधार हुआ। इसके बाद इंटरप्रेन्योर्स को आजादी मिली कि वह जिस सेक्टर में चाहे इन्वेस्ट कर सकते थे, जिसने उन्हें वैश्विक अर्थव्यव्स्था से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। हालांकि बिजनेस के लिए उपयुक्त देशों की सूची में आज भी भारत की लो रैंकिंग देशों में शामिल है। भारतीय को और आर्थिक आजादी चाहिए जैसा की 30-40 साल पहले किया गया था। अर्थव्यवस्था के विस्तार के कारण लोग शहर की तरफ आए, जिससे जाति और व्यवसाय के बीच की कड़ी कमजोर हुई और दलित इंजीनियर बना तथा ब्राह्मण इंटरप्रेन्योर बना।

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भारत में सामाजिक स्वतंत्रता पूर्वाग्रह के दो रूप है। जिनमें से एक जाति और दूसरा पितृसत्ता है, दोनों ही लोकतंत्र के लिए विरोधात्मक है। लोकतंत्र की परिभाषा के मुताबिक हर शख्स लिंग, जाति और धर्म के आधार पर जन्म से समान है। हिंदू शास्त्रों में दलितों को समुदायों में सबसे नीचे रखा गया है। इस्लाम और हिंदू दोनों शास्त्रों में महिलाओं को हीन प्राणियों की तरह से ट्रीट किया गया है। संविधान और राजनैतिक स्वरुप इसको बदलने की मांग करता है। सवाल उठता है कि कितना कामयाब रहे हैं ये ऐसा करने में? 1950 में दलित अपने मालिकों के आदेश पर वोट करता था, उसी तरह महिलाएं अपने पतियों के निर्देश पर वोट देती थीं। महिलाएं और दलित के साथ आज भी दैनिक जीवन में भेदभाव किया जाता है। ग्रामीण इलाकों में जब भी दलित इंसानी जीवन जीने की कोशिश करता है, उस पर हमला किया जाता है। ऐसा ही महिलाओं के साथ हॉनर किलिंग को लेकर होता है जो अपना मैरिज पार्टनर चुनने का साहस करती हैं। महिलाएं और दलित, समाज में सामाजिक रुप से स्वतंत्र नहीं है। सामजिक पूर्वाग्रह, जाति और लिंग के अलावा उन लोगों के खिलाफ भी है जो समान जेंडर से प्यार करते हैं। तथ्य यह है कि आईपीसी की धारा 377 को नहीं हटाया गया। जिसका उपयोग उत्पीड़न और डराने-धमकाने के लिए किया जाता है, जो कि हमारे लोकतंत्रिक रिकॉर्ड पर एक और धब्बा है।

अब हम सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर आते हैं कि जो कि हमें अपने पंसद के भगवान की पूजा करने का अधिकर देता है, अपनी पसंद की भाषा चुनने, खाने, पहनने का अधिकार देता है। वास्तव में स्वतंत्र भारत की यह सबसे बड़ी कामयाबी राष्ट्रवाद के उस मॉडल को खारिज करता है जिसमें एक भाषा-एक देश की बात कही जाती है। धार्मिक स्वतंत्रता के मामले में यह थ्योरी में आदर्श है लेकिन व्यवहारिक तौर पर अस्वीकृत है। जैसे कि भारत में चीन के मुकाबले मुस्लिम अपनी आस्था पर अमल करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन अधिकतर सांप्रदायिक दंगे के समय में उन्हें कृष्ट झेलना पड़ता है। यहां तक शांति के दौरान भी कामयाब और समृद्ध मुस्लिमों को हिंदुओं के पड़ोस में घर नहीं मिलता है। भारतीय अपनी पसंद की भाषा बोलने के लिए स्वतंत्र है। वे कुछ हद तक अपनी पसंद की आस्था का अभ्यास करने के लिए भी स्वतंत्र हैं। व्यक्तिगत पसंद के अन्य मामलों में उन्हें रुकावट का सामना करना पड़ता है। खुद को मुस्लिम रक्षक मानने वाले ( Muslim vigilantes) मांग करते हैं कि मुस्लिम महिलाओं के दमनकारी ड्रेस कोड अपनाने पर रोक लगाई जानी चाहिए। वहीं हिंदू रक्षक महिलाओं और पुरुषों को निर्देश देते हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं।

स्वतंत्रता के 69 साल के बाद भारतीय उससे तो कहीं ज्यादा स्वतंत्र है जितना ब्रिटिश हमें छोड़कर गए थे लेकिन उतना भी स्वतंत्र नहीं हुए जितना कि हमारे संविधान बनाने वालों ने आशा की थी। हमारे राजनैतिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक स्वतंत्रता सभी छोटे या बड़े मायनों में बाधाओं से बंधे हुए हैं।

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