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जुमलेबाजी में नरेंद्र मोदी को भी मात दे रहे राहुल गांधी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेते हुए राहुल ने कहा, ''मोदी जी, आप दिन गिनकर के रख लें। जैसे ही कांग्रेस यहां (छत्तीसगढ़) सत्ता में आएगी, 10 दिनों के भीतर किसानों का कर्ज़ माफ हो जाएगा और यह पैसा नीरव मोदी, विजय माल्या और अनिल अंबानी के पास से आएगा।''

फोटो सोर्स- एक्सप्रेस आर्काइव

देश के चुनावों में ‘जुमलेबाजी’ क्या एक सनातन सत्य है? क्योंकि, राजनेताओं की कथनी और करनी में फर्क जनता अर्से से देखती आ रहा है। नेताओं के बयान बिना तथ्य के सुर्ख़ियों में रहते हैं। यहां तक की राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र भी चुनाव बाद अप्रासंगिक हो जाते हैं। जितनी भी पार्टियां सत्ता में आई हैं उनके घोषणा-पत्र और ज़मीनी काम में काफी अंतर देखा गया है। बात साफ है कि मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दल लंबी-लंबी फेंकने से नहीं चूकते। आलम यह है कि राजनीतिक जुमले को लेकर बीजेपी पर कटाक्ष करने वाली कांग्रेस के नेता भी 5 राज्यों के होने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी जुबान से तथ्य को कोसो दूर कर दिया है। छत्तीसगढ़ की एक चुनावी सभा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान चर्चा में है। राहुल गांधी ने एक रैली में कहा कि वह छत्तीसगढ़ के किसानों का कर्ज़ विजय माल्या, नीरव मोदी और अनिल अंबानी के पैसों से माफ कर देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लेते हुए राहुल ने कहा, ”मोदी जी, आप दिन गिनकर रख लें। जैसे ही कांग्रेस यहां (छत्तीसगढ़) सत्ता में आएगी, 10 दिनों के भीतर किसानों का कर्ज़ माफ हो जाएगा और यह पैसा नीरव मोदी, विजय माल्या और अनिल अंबानी के पास से आएगा।”

राहुल गांधी के इस बयान को उनके विरोधी तथ्यहीन बता रहे हैं। मीडिया डोमेन में उनके बयानों की समीक्षा कई तरह से की जा रही है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल उठाएं हैं कि कांग्रेस अगर छत्तीसगढ़ में सरकार बना लेती है तो क्या वाकई वह नीरव मोदी, विजय माल्य और अनिल अंबानी का पैसा किसानों को दे सकती है? क्या एक राज्य सरकार के लिए यह मुमकिन है? दरअसल, किसानों की कर्जमाफी की बात करना अलग विषय है। लेकिन, किसी दूसरे कॉरपोरेट से पैसा खींचकर किसानों को देना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। ऐसा भी नहीं कि कोई सरकार संवैधानिक नीतियों के खिलाफ जाकर काम करेगी।

हालांकि, इससे पहले 2014 के चुनाव में बीजेपी ने कालाधन को मुद्दा बनाया था। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उस दौरान चुनाव प्रचार के दौरान सभी वोटरों के खाते में 15 लाख रुपये देने की बात कही थी। हालांकि, बाद में बीजेपी ने खुद स्वाकार किया कि यह चुनावी जुमला था। अच्छे दिन आने वाले हैं, महंगाई और करप्शन का नाश— बीजेपी के ये सारे वादे आज भी चर्चा में रहते हैं। सुविधा के मुताबिक विरोधी दल वक्त दर वक्त हमला बोलते रहते हैं। खुद कांग्रेस इन वादों को लेकर लगातार आक्रामक रही है। लेकिन, विधानसभा चुनावों में कांग्रेस वही जुबान बोलती दिखायी दे रही है जो 2014 में बीजेपी बोल रही थी। राहुल ने भी बीजेपी के 15 लाख वाले पुराने बयान की तुलना में विवादित कॉरपोरेट हस्तियों की जेब से किसानों के कर्ज माफ करने की बात कही है।

जुमलेबाजी के गोत्र से निकले बयानों का संबंध ऐसा नहीं कि सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस से ही है। बल्कि देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को रिझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़तीं। दिल्ली की सत्ता पर करिश्माई ढंग काबिज होने वाली AAP के शीर्ष नेता भी चुनाव पूर्व लोकपाल और दिल्ली को स्वायत्त राज्य बनाने जैसी तमाम बाते कर रहे थे। यहां तक कि मुख्यमंत्री केजरीवाल चुनाव पूर्व सरकारी मकान लेने के भी पक्ष में खड़े नहीं थे। लेकिन, चुनाव के उपरांत धीरे-धीरे अधिकांश आदर्शवादी बातें पीछे छूटती चली गयीं। खुद पार्टी से अलग हुए नेताओं ने AAP पर जातिवादी और परंपरागत राजनीति का हिस्सा होने के आरोप लगाए। इसके अलावा तमाम क्षेत्रीय दल भी अपने घोषणा-पत्र में कहे कुछ और कर डाले कुछ और। हालांकि, वर्तमान में जिस अंदाज में राजनीतिक दल धुआंधार प्रचार कर रहे हैं और जुबानी हमले बोल रहे हैं उसमें अभी बहुत जमुलेबाजी देखने को मिल सकती है।

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