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पुरी रथ यात्रा सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि महाप्रभु श्री जगन्नाथ का मौलिक अधिकार भी

यदि रथ यात्रा एक बार आयोजित नहीं की जाती है, तो इसे अगले 12 वर्षों तक आयोजित नहीं किया जा सकता है। ऐसे में इस बार रथ यात्रा को रद्द करना महाप्रभु श्री जगन्नाथ के मौलिक अधिकार का उल्लंघन भी होता।

Rath Yatra, Puri, Odishaभगवान जगन्नाथ रथयात्रा (फाइल फोटो)

डॉ. नित्यानंद अगस्ती

जब से भारत में कोरोना महामारी शुरू हुई, तभी से विभिन्न प्लेटफार्मों पर बहस और चर्चाएं चल रही थीं कि इस साल ओडिशा के पुरी में श्री जगन्नाथ मंदिर का वार्षिक उत्सव और विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा आयोजित की जाए या नहीं। इस यात्रा में महाप्रभु श्री जगन्नाथ का आशीर्वाद लेने के लिए दुनिया भर से लाखों की संख्या में भक्त पुरी आते हैं। कोरोना काल में जब शारीरिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना अनिवार्य है, ऐसे में इस उत्सव में लाखों लोग जुटें इस पर चर्चा होना उचित है।

सार्वजनिक स्थल पर लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को कोई खतरा न हो और यह उत्सव भी पूर्ण रूप से रद्द ना हो, इसके लिए दुनिया भर के भक्तों ने ओडिशा सरकार को कई सार्थक सुझाव भेजे। मंदिर प्रबंध समिति के अनुरोध के बाद गृह मंत्रालय ने शारीरिक दूरी बनाए रखते हुए रथों के निर्माण की भी अनुमति दी। महाप्रभु श्री जगन्नाथ की स्नान यात्रा पूरी हुई एवं रथों का भी निर्माण भी समाप्ति की और बढ़ता गया।

हालांकि रथयात्रा से सिर्फ 10 दिन पहले एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की और भक्तों के बीच COVID-19 के प्रसार का हवाला देते हुए वार्षिक उत्सव को स्थगित करने की मांग की। हालांकि COVID-19 के प्रसार को रोकने के लिए शुरुआत में ही विशेष व्यवस्था के साथ, इस वर्ष की रथ यात्रा को छोटे स्तर पर आयोजित करके याचिकाकर्ता की एक वैध आशंका को दूर किया जा सकता था।

लेकिन, जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 18 जून 2020 को पुरी में इस साल रथ यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था। महाप्रभु श्री जगन्नाथ संस्कृति की प्राचीन काल से प्रचलित रथ यात्रा की परंपरा को रद्द करने के निर्णय से दुनिया भर में अनगिनत भक्तों की भावनाएं आहत हुईं। हालांकि यह निर्णय COVID-19 महामारी के मद्देनजर लिया गया था, लेकिन ऐसा भी प्रतीत हुआ कि ये जल्दबाजी में पारित आदेश था।

इसे महसूस करते हुए, दुनिया भर के भक्तों ने केन्द्र और राज्य सरकार दोनों से अपील की कि वे कानूनी उपायों का पालन करें और पूर्ण प्रतिबंध लगाए बिना हर संभव प्रतिबंधों के साथ रथयात्रा को पूरा करने की अनुमति देने के लिए और अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएं। श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं और उनपर सुनवाई करते हुए अदालत ने 22 जून 2020 को कड़ी शर्तों और हर संभव उपाय के साथ रथ यात्रा की अनुमति दी और 23 जून को प्रतिबंधों के बीच पुरी में रथ यात्रा आयोजित की गई।

सरकार के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह सम्मान करते हुए भक्त भी अपने घरों के अंदर टेलीविजन पर महाप्रभु श्री जगन्नाथ का आशीर्वाद लेने के लिए सीमित हो गए। हालांकि यह अनूठा त्यौहार महाप्रभु श्री जगन्नाथ और उनके भक्तों के मिलन का प्रतीक है, किन्तु इस साल के त्यौहार पर बड़ दाण्ड में कोई आम भक्त नहीं देखा गया। संभवतः यही महाप्रभु श्री जगन्नाथ की इच्छा थी। आमतौर पर कहा जाता है, महाप्रभु श्री जगन्नाथ अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न गतिविधियों में संलग्न होते हैं – “मम भक्त बिनोदार्थे करोमि विविध क्रिया”।

इस बार रद्द होती यात्रा तो 12 साल तक नहीं किया जा सकता था आयोजित:  पुरी में रथ यात्रा हर साल आषाढ़ शुक्लपक्ष द्वितीया को पुरी में आयोजित की जाती है। इस दिन महाप्रभु श्री जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपने पहले प्रकट होने के पवित्र स्थान पर जाते हैं (जिसे श्री जगन्नाथ मंदिर से 4 किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर कहा जाता है) और वहां सात दिन बिताते हैं।

तीनों देवता तीन नवनिर्मित रथों पर सवार होते हैं। महाप्रभु श्री जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष है, सुभद्रा का रथ देवदलन है और बलभद्र का तालध्वज है। दुनिया भर से हजारों भक्त इस वार्षिक उत्सव में शामिल होते हैं और श्री जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक बड़ दाण्ड में रथ खींचते हैं। पुरी बड़ दाण्ड में रथ पर विराजमान महाप्रभु श्री जगन्नाथ के दर्शन भक्तों के लिए एक पवित्र क्षण माना जाता है। जैसा कि स्कंद पुराण में वर्णित है;

दोले तू दोलगोविन्दम चापे तू मधुसूदनम
रथे तू वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्मं न विद्यते ।

महाप्रभु श्री जगन्नाथ दोल यात्रा में भगवान दोलगोविंद, चाप यात्रा में भगवान मधुसूदन और रथ में भगवान वामन के रूप में विराजमान होते हैं। मान्यता है कि पुरुषोत्तम क्षेत्र या पुरी में, दोलगोविंद, मधुसूदन, और रथ में विराजमान भगवान वामन के दर्शन से मोक्ष या जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है। यह महाप्रभु श्री जगन्नाथ की विशिष्टता है जो पूरे ब्रह्मांड में सभी प्राणियों को आशीर्वाद देने के लिए वर्ष में एक बार अपने मंदिर से बाहर निकलते हैं। गुंडिचा मंदिर में सात दिन बिताने के बाद तीनों देवता फिर से अपने-अपने रथों पर सवार होकर वापस मुख्य मंदिर में आते हैं, और उस त्यौहार को बाहुड़ा कहा जाता है।

यह सिर्फ एक त्यौहार नहीं है, बल्कि, पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर (प्रशासन) अधिनियम, 1952 के तहत बनाए गए अधिकारों (रिकॉर्ड- II, पृष्ठ 69-81) के रिकॉर्ड द्वारा अनिवार्य रूप से महाप्रभु श्री जगन्नाथ का अधिकार है। इस त्यौहार की विशिष्टता के कारण इसे हर साल आयोजित किया जाता है और यदि रथ यात्रा एक बार आयोजित नहीं की जाती है, तो इसे अगले 12 वर्षों तक आयोजित नहीं किया जा सकता है। ऐसे में इस बार रथ यात्रा को रद्द करना महाप्रभु श्री जगन्नाथ के मौलिक अधिकार का उल्लंघन भी होता। हालांकि कोर्ट के आदेश के बाद कड़ी शर्तों के बीच यात्रा संपन्न हुई।

Rath Yatra, Religion, Puri डॉ. नित्यानंद अगस्ती

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं और रथ यात्रा को रद्द करने के फैसले पर पुनर्विचार के लिए “अपील फ्रॉम एकेडमिक्स” नाम से मुहिम छेड़ी थी)

 

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