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क्या सचमुच “गाली प्रूफ” हैं नरेंद्र मोदी? उनके पलटवार वाले शब्दों से ऐसा लगता है?

संसद से बाहर भी प्रधानमंत्री के स्तर के नेताओं से भी भाषा की मर्यादा तोड़ी जाती रही है। नरेंद्र मोदी इसके भी अपवाद नहीं हैं। वह भले ही खुद को "गाली प्रूफ" बता रहे हों, लेकिन असल में वह जुबानी वार-पलटवार में कम नहीं रहे हैं।

ताजा विवाद राहुल गांधी के डंडा वाले बयान पर है। प्रधानमंत्री ने इसी बयान के संदर्भ में खुद को “गाली प्रूफ” कहा। (फोटो-सोशल मीडिया)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 फरवरी को लोकसभा में कहा कि 20 साल से सुनते-सुनते वह “गाली प्रूफ” हो गए हैं। इसी क्रम में उन्होंने नाम लिए बिना राहुल गांधी को ट्यूबलाइट कह दिया। अगले दिन राज्यसभा में भी उन्होंने ऐसी बात कही जिसे रिकॉर्ड से बाहर करना पड़ा। प्रधानमंत्री के शब्द को संसदीय कार्यवाही के रिकॉर्ड से बाहर निकालना असामान्य बात है। हालांकि यह बीच-बीच में होता रहा है। नरेंद्र मोदी भी इसके अपवाद नहीं रहे हैं।

संसद से बाहर भी प्रधानमंत्री के स्तर के नेताओं से भी भाषा की मर्यादा तोड़ी जाती रही है। नरेंद्र मोदी इसके भी अपवाद नहीं हैं। वह भले ही खुद को “गाली प्रूफ” बता रहे हों, लेकिन असल में वह जुबानी वार-पलटवार में कम नहीं रहे हैं।

नरेंद्र मोदी ने सोनिया गांधी को ‘जर्सी गाय’, राहुल को ‘हाइब्रिड’ बछड़ा, ‘ट्यूबलाइट’, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘देहाती औरत’, ‘नाइट वाच मैन’, सुनंदा पुष्कर को पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड, मीडिया को बाजारू तक कहा है। यह भी सच है कि कांग्रेस ने मोदी के लिए नीच, बंदर, रावण, भस्मासुर, हिटलर, मुसोलिनी, मौत का सौदागर जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है।

बीते लोकसभा चुनाव के दौरान जब राहुल गांधी ने चौकीदार चोर है का नारा दिया तब भी नरेंद्र मोदी ने कस कर पलटवार किया। “मैं भी चौकीदार” का जवाबी अभियान चलाया। उनके समर्थकों की ओर से राहुल को कोर्ट में भी घसीटा गया और वहां उन्हें माफी मांगनी पड़ी।

ताजा विवाद राहुल गांधी के डंडा वाले बयान पर है। प्रधानमंत्री ने इसी बयान के संदर्भ में खुद को “गाली प्रूफ” कहा। लेकिन वह संसद के बाद असम की सभा में भी इस बयान का जिक्र करना नहीं भूले। यानि सदन और बाहर यह एक मुद्दा बन रहा है।

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