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व‍िभाजन अंग्रेजों की साज‍िश थी, पाक‍िस्‍तान की अवधारणा में ही खोट

मुझे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों (हिंदुओं, ईसाईयों और सिखों) की दुर्दशा के बारे में बोलने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी , जिनके बारे में आये दिन रिपोर्ट में नियमित रूप से नाबालिक लड़कियों के जबरन धर्मांतरण, फर्जी ईशनिंदा ( blasphemy ) के आरोप और इन आरोपों पर उनकी भयानक हत्याएँ आदि की ख़बरें आती हैं।

Partition, Conspiracy, Britishers, India, Pakistan, Former SC Judgeतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (क्रिएटिवः जनसत्ता ऑनलाइन/नरेंद्र कुमार)

पाकिस्तान को अंग्रेजों की साजिश से बनाया गया था। 1857 की बग़ावत, जिसमें हिन्दुओं और मुसलामानों ने मिलकर अंगेज़ों के विरुद्ध लड़ाई की, को दबाने के बाद अंग्रेज़ों ने व्यवस्थित रूप से साम्प्रदायिक जहर फैलाया और ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को बढ़ावा दिया। इसका परिणाम १९४७ का विभाजन हुआ। विभाजन का उद्देश्य यह था कि भारत के लोग कमज़ोर रहें, आपस में लड़ते रहें ताकि वे विदेशी हथियार खरीदने में अपने संसाधनों को बर्बाद कर दें (और विदेशी हथियार कंपनियों का मुनाफा होता रहे) और एकजुट भारत एक आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र के रूप में कभी न उभर पाए  जैसे वर्तमान का चीन।

भारत व्यापक तौर पर आप्रवासियों (Immigrants) का देश है (जैसे उत्तरी अमेरिका)। भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश) में रहने वाले लगभग 92-93% लोग भारत के मूल निवासियों के वंशज नहीं हैं, बल्कि विदेशों से आए थे, मुख्यतः उत्तर पश्चिम से। यह हमारे उपमहाद्वीप में जबर्दस्त विविधता की व्याख्या करता है – कई धर्म (और धर्मों के भीतर संप्रदाय), जातियां, भाषाएं, जातीय समूह आदि। जो भी आप्रवासी समूह यहां आए अपनी संस्कृति, धर्म, भाषा, आदि लेकर आए। इसलिए ऐसी स्तिथि में केवल एक ही नीति सही है जो हमें एकजुट रख सकती है और प्रगति के पथ पर आगे ले जा सकती है, वह है ‘सुलेह-ए-कुल’ का रास्ता। इसके तहत सभी धर्मों और संप्रदायों को समान सम्मान दिया जाता है  और जो रास्ता हमें महान मुगल सम्राट अकबर द्वारा दिखाया गया था।

पाकिस्तान एक इस्लामिक राज्य के रूप में बनाया गया था। लेकिन कौन सा इस्लाम सही है? सिद्धांत में केवल एक इस्लाम है, लेकिन वास्तविकता बहुत अलग है। वास्तव में महान पैगंबर की मृत्यु के तुरंत बाद सुन्नियों और शियाओं के बीच भयंकर मतभेद पैदा हुआ। शिया सुन्नियों के पहले तीन ख़लीफाओं को अवैध समझते थे और केवल चौथे खलीफा ‘अली ‘ को ही मान्यता देते थे। कट्टर सुन्नियों ने शियाओं को, जो पाकिस्तान की आबादी के २०% हैं, हमेशा विधर्मी (heretics) माना है और अक्सर वे पाकिस्तान में शियाओं पर हमला करते हैं (जैसा कि हाल ही में हुआ)।

एक और मतभेद इस सवाल पर है कि क्या कोई मुसलमान केवल अल्लाह से सीधे तौर पर कुछ मांग सकता है (जैसे कि देओबंदी कहते हैं ) या कुछ मध्यस्थों जैसे कि अली या सूफी संत द्वारा (जैसा बरेलवी कहते हैं)।

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बहुसंख्यक मुसलमान दरगाहों पर जाते हैं, जो सूफी संतों की कब्रों पर बने पवित्र स्थान हैं। लेकिन वहाबियों (Wahabis) ने इसे बुत परस्ती (मूर्ति पूजा) करार दिया है और पाकिस्तान में दरगाहों पर अक्सर बम विस्फोट होते हैं।

मुझे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों (हिंदुओं, ईसाईयों और सिखों) की दुर्दशा के बारे में बोलने की ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी, जिनके बारे में आये दिन रिपोर्ट में नियमित रूप से नाबालिक लड़कियों के जबरन धर्मांतरण, फर्जी ईशनिंदा (Blasphemy) के आरोप और इन आरोपों पर उनकी भयानक हत्याएँ आदि की ख़बरें आती हैं।

अगर मान भी लिया जाये कि पाकिस्तान में 100% मुसलमान होते, तब भी 20% शियाओं, अहमदियों आदि का क्या किया जाना चाहिए ? क्या शुद्ध इस्लामी राज्य के लिए यह ‘विधर्मी ‘ जर्मन नाज़ियों के यहूदियों पर एक ‘अंतिम समाधान’ ( final solution ) के लायक हैं? और उन मुसलमानों का क्या करना चाहिए है जो ‘मन्नत ‘ मांगने के लिए दरगाहों पर जाते हैं? वे शायद पाकिस्तान में बहुमत में हैं (यहां तक कि प्रधानमंत्री इमरान खान अपनी पत्नी के साथ वहां जाते हैं)।

एब्राहिम लिंकन ने जून 1858 में अमेरिका में दिए गए एक भाषण में कहा था कि अपने आप में विभाजित देश खड़ा नहीं रह सकता (A House divided within itself cannot stand)। मैं प्रस्तुत करता हूं कि हमारा उपमहाद्वीप इतनी जबर्दस्त विविधता का क्षेत्र है कि पाकिस्तान जैसा इस्लामिक राष्ट्र स्वयं में विभाजित है, और लंबे समय तक नहीं रह सकता है।

वास्तव में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश एक ही देश है, हमारी संस्कृति एक ही है, हम देखने में एक जैसे लगते हैं, हमारे अधिकांश क्षेत्र में हिंदुस्तानी (खड़ी बोली) बोली जाती है और मुग़लों के ज़माने से हम एक थे।  हमारा बटवारा अंग्रेज़ों की एक घिनौनी साज़िश थी, मगर एक न एक दिन हम अवश्य फिर एकजुट होंगे एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र के अंतर्गत।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं। यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके न‍िजी हैं।)

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