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चुनावी राजनीति का हिस्‍सा भर नहीं है घोषणापत्र, चिंता की बात है इसका महत्‍व घटना

चुनावी घोषणापत्रों पर बढ़ती राजनीति और उनकी घटती अहमियत पर पंकज सिंह का ब्‍लॉग। उनका मानना है कि कुछ दशकों से चुनावी वादे झूठ का पुलिंदा और जुमला बनकर रह गए हैं।

पंकज सिंह

मौजूदा राजनीति में चुनाव और वादे एक-दूसरे का पर्याय बन चुके हैं। लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में वायदों का अपना महत्व है, और इन्हीं वायदों से यह पता चलता है कि आखिर हमारे राजनेता समाज और देश को कौन सी शक्ल देना चाहते हैं। दुर्भाग्यवश पिछले कुछ दशकों से चुनावी वादे झूठ का पुलिंदा और जुमला बनकर रह गए हैं। इनके बीच अगर कोई पूरी ईमानदारी और दिल की गहराइयों से जनता की बुनियादों समस्याओं को हल करने का वादा भी करता है, तो अमूमन उसे नक्कारखाने में एक तूती की तरह भुला दिया जाता है। इसके लिए हमारी राजनीति का मौजूदा माहौल और स्तर ही जिम्मेदार हैं। दुनिया को सत्य और अहिंसा का रास्ता दिखाने वाले देश में राजनीति का स्तर जिस तरीके से गिरता जा रहा है, वह एक बेहद गंभीर मामला है।

हम सभी देख रहे हैं कि चुनाव दर चुनाव वादों के माध्यम से झूठ और कोरी घोषणाओं की बाढ़ आती रही है। यह सिलसिला ग्रामीण स्तर से लेकर विधानसभा और लोकसभा के चुनाव तक अनवरत जारी रहता है। इन घोषणाओं के नेपथ्य में धनबल, बाहुबल या सस्ती लोकप्रियता के आधार पर चुनाव जीतकर सत्ता प्रतिष्ठानों में जनप्रतिनिधि के तौर पर पहुंचने वाले नेता न केवल अपने वादे भूल जाते हैं, बल्कि अपनी संवैधानिक जिम्मेवारी से भी आंख फेर लेते हैं। दूसरे शब्दों में झूठ का सहारा लेकर नेता चुनाव जीतते हैं और देश की जनता हर चुनाव हारती जाती है। इस तरह चुनाव के दौरान और उसके बाद देश के संविधान की धज्जियां उड़ाई जाती हैं।

पिछले कुछ चुनावों की ही बात करें तो विधानसभा या लोकसभा चुनाव इसके उदाहरण हैं। मध्यप्रदेश में ही 2013 का शिवराज सिंह चौहान का संकल्प पत्र उठाकर देखें तो उसके ज्यादातर वादे अधूरे हैं। 2015 का पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के वादों का घोषणापत्र भी इसी भूलने की प्रक्रिया का एक उदाहरण है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी राजनीतिक दलों ने चुनावी वादों की झड़ी लगा दी थी। जैसे बेरोजगारी भत्ते के तौर पर 12वीं पास को पांच से छह हजार और ग्रेजुुएट बेरोजगार को आठ से नौ हजार रुपए प्रति माह देने का वादा किया गया। कॉलेज जाने वाली छात्राओं को स्कूटी, हर घर में छह सिलेंडर मुफ्त देने और हर गांव को वाई-फाई जोन में तब्दील करने जैसी घोषणाएं इसी का हिस्सा थीं, लेकिन किसी दल ने यह नहीं बताया कि वह यह सब करेंगे कैसे? किसानों की कर्ज माफी, गरीबों को सस्ता मकान और अनाज, बेरोजगारी भत्ता और सरकारी कर्मचारियों के मामले तीन-चार दशकों से लगातार विभिन्न घोषणापत्रों का हिस्सा बनते रहे हैं, लेकिन किसी दल ने इन्हें गंभीरता से नहीं लिया है और चुनाव के बाद ये वायदे महज जुमले बनकर रह जाते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के आम चुनाव के अपने संकल्प पत्र में देश की तस्वीर और तकदीर बदलने के लिए कई वादे किए, जनता के बीच अच्छे दिन की उम्मीद जताई लेकिन चार साल बाद भी अच्छे दिनों के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।

हालांकि परिदृश्य इतना बुरा भी नहीं है। देश की आजादी के तुरंत बाद ही देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश की तस्वीर बदलने की भरसक कोशिश की और उसी का नतीजा है कि आज हम दुनिया के चंद सबसे मजबूत देशों में शुमार होते हैं। लाल बहादुर शास्त्री जी के काल खंड में भी योजनाओं को जमीन पर उतारने और जनता से किए गए वादों को पूरा करने की जद़्दोजहद साफ दिखाई देती है। जय जवान, जय किसान के नारे को शास्त्री जी ने जमीन पर उतारा। इंदिरा गांधी के शासनकाल में योजनाओं को जमीन पर उतारने का अतिवाद भी हमने देखा और फिर आपातकाल के बाद 1977 की जनता सरकार में भी वादों को सरकारी नीतियों में जगह मिली थी। इसके बाद जनता से किए गए वायदे के मुताबिक वीपी सिंह सरकार ने मंडल कमीशन को लागू किया, तो आर्थिक हालात को बदलने की कवायद के चलते नरसिम्हा राव सरकार ने भी देश को मुश्किल हालात से निकालने के लिए एक रास्ता चुना। आर्थिक उदारीकरण का यह रास्ता गलत था या सही, यह जुदा बात है, लेकिन जनता से वादे को सर्वोपरि रखने का उदाहरण तो यहां भी दिखता है। इस बीच इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों ने भी अपने घोषणापत्रों को गंभीरता से लेते हुए कुछ जरूरी काम पूरे किए।

हाल के दिनों में उदाहरण के रूप में देखें तो आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने अपने घोषणापत्र के 70 में से 50 से ज्यादा वायदे पूरे किए हैं और अब मध्य प्रदेश में एक नई लकीर खींचते हुए पार्टी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार आलोक अग्रवाल ने अपने वादों को स्टाम्प पेपर पर लिखकर दिया है। मध्य प्रदेश में हाल ही में पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने नर्मदा आंदोलन की जमीन से उपजे संघर्षशील नेता आलोक अग्रवाल को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। आलोक ने अपनी घोषणाओं को शपथपत्र के रूप में जनता के सामने रखा है, ताकि वादाखिलाफी की सूरत में प्रदेश के नागरिकों के पास आम आदमी पार्टी और उनके ऊपर अदालती कार्रवाई करने के लिए दस्तावेजी सबूत हो। इस शपथपत्र का नतीजा यह हुआ है कि प्रदेश के जनसंगठन, किसान-मजदूर संगठन व अन्य कई समूह भाजपा, कांग्रेस जैसी पार्टियों पर भी यह दबाव बना रहे हैं कि वे भी इस तरह की दस्तावेजी प्रतिबद्धता को सामने रखें। असल में, आम आदमी पार्टी राजनीतिक बदलाव के जिस वादे के साथ पांच साल पहले संसदीय राजनीति में आई थी, यह घोषणाएं उसी कड़ी का जरूरी और बुनियादी शपथ पत्र है। यह कदम राजनीति में बढ़ रही झूठ और जुमले की संस्कृति को चुनौती तो है ही, साथ ही साफ सुथरी और गंभीर राजनीति की ओर जाने का महत्वपूर्ण तरीका भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य पार्टियां भी इस क्रम को आगे बढ़ाएंगी और राजनीतिक सुधार की जो बात लगातार की जा रही है, उसे एक नई जमीन मिलेगी।

यहां यह परखना जरूरी है कि आखिर कैसे घोषणापत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज की गंभीरता में गिरावट आई है और क्यों घोषणापत्रों को महज चुनाव प्रचार का एक तरीका भर मान लिया गया है। कमोबेश सभी राजनीतिक दल घोषणापत्र को महज चुनावी राजनीति का एक हिस्सा भर मानते हैं, जिनमें लोक-लुभावन और निहायत ही अव्यावहारिक वायदों की भरमार होती हैं। असल में घोषणापत्रों को गंभीरता से न लेने का यह सिलसिला बीते 3 दशक में बढ़ा है। विभिन्न सरकारों ने बीते दशकों में वित्तीय हालात का हवाला देकर वादों से मुंह चुराने का सिलसिला शुरू किया है, इसे रोकने के लिए 2015 में चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता के दौरान किए जाने वाले वादों के संबंध में वित्तीय प्रावधान का उल्लेख करने के लिए भी कहा था। मध्य प्रदेश में 2013 के विधानसभा हों या फिर 2014 के लोकसभा चुनाव तब भी चुनाव आयोग ने दलों से घोषणा पत्र की प्रतियां मांगी थीं। लेकिन चुनाव आयोग की इस कवायद पर पूरी तरह से अमल नहीं हो पाया और नतीजा वही ढाक के तीन पात जैसा रहा। नतीजा यह रहा है कि अब मतदाता भी चुनाव घोषणापत्रों को महज रस्मी औपचारिकता मानने लगे हैं। दिलचस्प यह भी है कि कुछ दलों ने तो घोषणापत्र जारी करने की परंपरा को ही खत्म कर दिया है। इनमें बहुजन समाज पार्टी जैसी राष्ट्रीय पार्टी भी शामिल है।

वैश्विक स्तर पर घोषणापत्रों की बात करें, तो दुनिया की राजनीति को कई घोषणापत्रों ने सैकड़ों साल तक प्रभावित किया है। घोषणापत्रों का इतिहास यूं तो हजार साल से भी ज्यादा पुराना है। इनमें 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्पेन से आजाद हुए नीदरलैंड्स के कुछ हिस्सों की स्वतंत्रता का घोषणापत्र हो या फिर 18वीं सदी के आखिरी सालों में अमरीका का डिक्लेयरेशन ऑफ इंडेपेंडेंस, इन घोषणापत्रों ने दुनिया के आजाद देशों की शक्लो सूरत बनाने में मदद की। इसके बाद 1848 में आए कम्यूनिस्ट मैनिफेस्टो ने भी करीब 170 साल से दुनिया के राजनीतिक परिदृश्य को बेतरह प्रभावित किया है। इसी क्रम में 1905 की रूसी क्रांति का अक्टूबर घोषणापत्र, 1918 का अर्जेंटीना का यूनिवर्सिटी घोषणापत्र और 1947 का ऑक्सफोर्ड मैनिफेस्टो अलग से याद किए जाने के काबिल रहे हैं।

इसी बीच भारतीय स्वतंत्रता की घोषणा और उसके बाद आया हमारा संविधान भी दुनिया में राजनीतिक रूप से एक बेहद महत्वपूर्ण घोषणापत्र माना जाता है। दुर्भाग्य से हम अपने संविधान के दायित्वों और कार्यभार को उस स्तर पर पूरा करने में अब तक असफल रहे हैं, जिसकी अपेक्षा हमारे बुजुर्गों ने की थी। उम्मीद की बात यह है कि हम इस संविधान की मूल भावना को जीवत रखने के लिए लगातार एक जुट होते रहे हैं, हालांकि अभी मंजिल बहुत दूर है। इस मंजिल तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि हम राजनीतिक घोषणापत्रों को उनकी गंभीरता लौटाएं। इसके लिए चुनावी सुधार में घोषणापत्रों के प्रति राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। चुनाव घोषणापत्र को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए और किसी भी सरकार का आकलन उसके घोषणापत्र के वायदों के आधार पर किया जाना चाहिए। होना यह भी चाहिए कि यदि कोई दल सत्ता में आने के बाद अपना घोषणा पत्र पूरा न कर सके तो जनता को उस सरकार के खिलाफ अदालती कार्रवाई का अधिकार भी होना चाहिए। साथ ही अगर पर्याप्त कारण और संतोषजनक जवाब न मिलें तो चुनाव आयोग को उस दल की मान्यता रद करने जैसे कठोर कदम का प्रावधान भी करना चाहिए।

(लेखक आम आदमी पार्टी, मध्य प्रदेश के प्रदेश संगठन मंत्री और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। यहां व्‍यक्‍त विचार उनके निजी हैं।)