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दूसरी नजरः निरंकुश सत्ता का उन्माद

वित्तमंत्री के साल भर के विधायी एजेंडे में वित्त विधेयक अमूमन सबसे महत्त्वपूर्ण विधेयक होता है।

Author April 2, 2017 3:54 AM
अरुण जेटली को लेकर पी चिदबरम का ब्लॉग

वित्तमंत्री के साल भर के विधायी एजेंडे में वित्त विधेयक अमूमन सबसे महत्त्वपूर्ण विधेयक होता है। वित्तमंत्री की मंजूरी से, नीतिगत निर्णय पहले राजस्व विभाग द्वारा लिये जाते हैं और फिर उन निर्णयों से विधेयक का मसविदा तैयार करने वालों को अवगत करा दिया जाता है। वित्त विधेयक का मसविदा बनाने में कानून मंत्रालय के अफसरों समेत दर्जनों अफसर सौ से ज्यादा घंटे अपना सिर खपाते हैं। वरिष्ठ अधिकारी घंटों मसविदे का अनुशीलन करते हैं ताकि खुद को आश्वस्त कर सकें कि जो नीतिगत निर्णय लिये गए थे वे विधेयक में ठीक-ठीक आ गए हैं।
नीतिगत निर्णयों की अंतिम जवाबदेही वित्तमंत्री की होती है। वित्त विधेयक के मसविदे की भी अंतिम जवाबदेही वित्तमंत्री की होनी चाहिए, खासकर तब, जब वित्तमंत्री कानून के भी विद्वान हों।
वित्त विधेयक-2017 की बाबत मेरे तीन मुद््दे हैं।

संविधान पर हमला
संविधान के अनुच्छेद 110 के मुताबिक वित्त विधेयक पूरी तरह धन विधेयक होता है, (देखें बॉक्स), लेकिन वित्त विधेयक-2017, क्या सचमुच धन विधेयक है? मैं नहीं मानता कि अरुण जेटली जी को अनुच्छेद 110 में बताई गई सीमाओं और गुंजाइशों का पता नहीं होगा। न तो मैं यह मानता हूं कि जेटली जी सोचते होंगे कि ‘केवल’ शब्द निरर्थक है। न ही मैं यह मानता हूं कि वे उन उद्धरणों से अनजान होंगे जो राज्यसभा की बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने उद्धृत किए।
अर्सकाइन मे ने कहा था: ‘‘एक विधेयक जिसमें गणनात्मक ब्योरे होते हैं और इसके अलावा कुछ नहीं होता, निस्संदेह धन विधेयक है। अगर यह किसी और विषय को शामिल करता है, और वह आनुषंगिक या आकस्मिक नहीं है, तो वह धन विधेयक नहीं है।
प्रथम लोकसभाध्यक्ष जीवी मावलंकर ने 1956 में व्यवस्था दी थी: ‘‘मैं वित्तमंत्री से कहना चाहूंगा, और न केवल उनसे, बल्कि उनके उत्तराधिकारियों से भी, कि वे देखें कि विधेयक में केवल वही प्रावधान आएं जो कर-निर्धारण से ताल्लुक रखते हों। इसका पालन किया जाना चाहिए, और किसी अन्य प्रावधान पर तभी ध्यान दिया जाए जब वह पूरी तरह आनुषंगिक हो।’’
वित्त विधेयक-2017, संविधान के अनुच्छेद 110 पर हमला है। वित्त विधेयक की 189 में से 55 धाराओं का कर-निर्धारण से कोई लेना-देना नहीं है। इसके अलावा, ये 55 धाराएं वित्त विधेयक की अन्य धाराओं की आनुषंगिक नहीं हैं, जो कर-निर्धारण से संबंधित हैं। वित्त विधेयक में ये संदिग्ध धाराएं वित्तमंत्री ने अपने वैधानिक विवेक के खिलाफ जाकर शामिल कराई हैं। असल मकसद था विधेयक को राज्यसभा की छानबीन से बचाना। उन्हें इस अपकृत्य के परिणाम का तभी भान होगा जब सर्वोच्च न्यायालय बताएगा कि धन विधेयक में क्या शामिल किया जाना चाहिए और क्या नहीं।

कर आतंकवाद
कर-अधिकारियों की मनमानी कार्रवाइयों से बचाव के लिए करदाता के पास एक ही ढाल थी: कर-अधिकारी के लिए यह जरूरी था कि कार्रवाई के पीछे वह ‘विश्वास-योग्य’ कारण बताए और उस कारण को आधिकारिक रूप से दर्ज भी किया जाए। करदाता को भी वे कारण बताना जरूरी था, ताकि वह अदालत में उन तथाकथित कारणों को चुनौती दे सके, और अगर अदालत उन कारणों को बेबुनियाद, अप्रासंगिक और अनुचित पाए तो कार्यवाही को रद्द कर दे। वित्त विधेयक-2017 ने कानून को बदल दिया है। विधेयक के क्लाज 50 और 51 ने आय कर अधिनियम की धारा 132 और 132ए में एक ‘व्याख्या’ जोड़ी है जो इस प्रकार है:
‘‘संदेहों के निराकरण के लिए यहां यह घोषित किया जाता है कि विश्वास-योग्य कारण, जो कि इस उप-धारा के तहत आय कर अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाता है, वह किसी भी व्यक्ति, प्राधिकरण या अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष उजागर नहीं किया जाएगा।’’
यह ‘व्याख्या’ मान्य कानून के खिलाफ है। कानून को पूर्वप्रभाव से, 1 अप्रैल 1962 से या 1 अक्तूबर 1975 से लागू करके कानून को ‘डांवांडोल’ किया जा रहा है! अगर करदाता को कारण नहीं बताए जाएंगे, तो वह उन तथाकथित कारणों कोे अदालत में कैसे चुनौती देगा, अदालत से किस बिना पर कार्यवाही को रद््द करने की मांग करेगा? कार्यवाही को शुरू में ही चुनौती देने का प्रभावी अवसर पाए बगैर, करदाता को सीधे आय कर न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? क्लाज 50 और 51 संदेहास्पद हैं, और अब यह लड़ाई अदालत में पहुंचेगी।
सियासी चंदा
राजनीतिक चंदे को साफ-सुथरा बनाने के प्रयासों का मैं समर्थक हूं। मैं चुनावी बांड की तजवीज का स्वागत करता हूं। वित्त विधेयक-2017 के प्रावधानों के तहत, एक दानदाता बांड खरीद सकता है और केवल बांड को जारी करने वाले बैंक को दानदाता/खरीदार का नाम मालूम होगा। दानदाता एक या अधिक पार्टियों को चंदे के बतौर ये बांड दे सकता है, लेकिन न तो इस तरह चंदा देने वाले और न ही लेने वाले-राजनीतिक दल को अपने रिटर्न में नामों का खुलासा करना पड़ेगा! अगर मकसद पारदर्शिता लाना तथा सियासी चंदे को साफ-सुधरा बनाना है, तो चंदा किसने दिया और किस राजनीतिक दल ने लिया, यह गुप्त क्यों रहना चाहिए? वित्त विधेयक-2017 ने काले धन को सफेद बनाने की राह आसान की है। कंपनियों तथा अन्य दानदाताओं को चेताया जाना चाहिए: भविष्य में कोई सरकार कानून में संशोधन कर देगी और चंदा देने वालों तथा पाने वाले राजनीतिक दलों, सभी के नाम सार्वजनिक कर देगी।
संसद ही बहस का एकमात्र मंच है। पहले दो मुद््दों पर, बहस अदालत में चली जाएगी। तीसरे मुद््दे पर, बहस सार्वजनिक मंचों पर होगी। तीनों मुद््दों पर अभी अंतिम रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता।

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