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दूसरी नजरः राज्य का चुनाव, राष्ट्रव्यापी प्रभाव

कर्नाटक में चुनाव होने जा रहा है, यह मीडिया की वजह से, पढ़ने या सुनने में ऐसा लगता है मानो भारत युद्ध के मोर्चे पर जा रहा है।

Author May 5, 2018 23:50 pm
कर्नाटक में चुनाव होने जा रहा है, यह मीडिया की वजह से, पढ़ने या सुनने में ऐसा लगता है मानो भारत युद्ध के मोर्चे पर जा रहा है। अपनी विशिष्टता के अनुरूप नरेंद्र मोदी पांच दिनों में पंद्रह रैलियों को संबोधित करेंगे। इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने राज्यों की चुनावी लड़ाई में अपने को इस कदर नहीं झोंका था जिस तरह मोदी ने अपने को झोंक रखा है।

कर्नाटक में चुनाव होने जा रहा है, यह मीडिया की वजह से, पढ़ने या सुनने में ऐसा लगता है मानो भारत युद्ध के मोर्चे पर जा रहा है। अपनी विशिष्टता के अनुरूप नरेंद्र मोदी पांच दिनों में पंद्रह रैलियों को संबोधित करेंगे। इससे पहले किसी भी प्रधानमंत्री ने राज्यों की चुनावी लड़ाई में अपने को इस कदर नहीं झोंका था जिस तरह मोदी ने अपने को झोंक रखा है।
यह ऐसे शख्स की रणनीति है जिसका बहुत कुछ दांव पर है। इस रणनीति से उत्तर प्रदेश में काफी फायदा हुआ था, जहां भाजपा का मुकाबला सत्तारूढ़ (सपा) और पूर्व सत्तारूढ़ (बसपा) से था। मोदी का वाराणसी की लोकसभा सीट से चुना जाना, उनका हिंदी बोलना और सांप्रदायिक टकराव बढ़ाने में उनकी पार्टी की महारत आदि कई कारण थे जो सहायक साबित हुए।

कर्नाटक, गुजरात नहीं
यह रणनीति गुजरात में संकटपूर्ण तरीके से नकामी के करीब पहुंच गई। एक गुजराती की लाज रखने की अंतिम क्षणों में की गई मोदी की अपील ने उनकी पार्टी को बचा लिया और भाजपा लड़खड़ाते हुए सात सीटों के मामूली बहुमत से दौड़ की आखिरी लाइन तक पहुंच गई। वह रणनीति अब कर्नाटक में आजमाई जा रही है।
चुनावी एजेंडे पर गुजरात में भाजपा और उसकी सरकार का नियंत्रण था; कर्नाटक में कांग्रेस और उसकी सरकार का है। गुजरात में ‘भूमिपुत्र’ मोदी थे, कर्नाटक में सिद्धारमैया हैं। गुजरात में मोदी गुजराती में बोलते थे, कर्नाटक में वे अपनी बात अनुवादक के जरिए कहने को बाध्य हैं। गुजरात में एक और मौका मांगने वाला चेहरा मोदी का था (और कोई भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया गया था), कर्नाटक में भाजपा का चेहरा येदियुरप्पा हैं। गुजरात में भाजपा जनता के एक हिस्से का ध्रुवीकरण करने में कामयाब हो गई थी, कर्नाटक में उसकी इस तरह की कोशिशें (दक्षिण कर्नाटक में) अब तक नाकाम रही हैं।

चुस्त प्रशासन
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार मई 2013 में बनी थी। स्थिर कीमतों पर राज्य का जीडीपी 2012-13 में 6,43,292 करोड़ रु. था। यह बढ़ कर 2017-18 में 9,49,111 करोड़ रु. हो गया। राज्य की वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर 8 फीसद सालाना से अधिक थी। कर्नाटक का औसत निवासी बेहतर आर्थिक स्थिति में है: प्रतिव्यक्ति आय, स्थिर कीमतों पर, उसी अवधि में, छलांग लगा कर 77,309 रु. से 1,74,551 रु. पर पहुंच गई, जो कि 125 फीसद की वृद्धि थी। इसके बरक्स, पूरे देश की प्रतिव्यक्ति आय करीब 59 फीसद बढ़ी। बेरोजगारी कर्नाटक में अन्य सभी राज्यों से कम है (2.6 फीसद)। गुजरात में यह 5 फीसद है और भारत में 5.9 फीसद।
टैक्स और जीडीपी के अनुपात को व्यवहार में स्थिर रखते हुए (औसत 9.5 फीसद) सिद्धारमैया वृद्धि दर को बढ़ाने में सफल रहे। इसी तरह वे राजकोषीय घाटे को तीन फीसद की सीमा में रखते हुए अधिक उधार लेने, अधिक निवेश और अधिक व्यय करने में भी कामयाब रहे। पांच सालों के दौरान औसत राजकोषीय घाटा 2.26 फीसद था और औसत अतिरिक्त राजस्व था 0.08 फीसद। सामाजिक मदों में खर्च लगातार, कुल खर्च के चालीस फीसद से अधिक रहा है। इससे हुए लाभ जाहिर हैं। मसलन शिशु मृत्यु दर में गिरावट आई, बिजली की खपत में बढ़ोतरी हुई, और कहीं ज्यादा तादाद में नई परियोजनाओं की घोषणा हुई।
सिद्धारमैया ने अपना राजनीतिक दांव भी काफी चतुराई से चला है। जनता दल (एस) को भाजपा की बी-टीम कह कर उन्होंने विपक्ष के वोटों को विभाजित कर दिया है। यह लेबल कुमारस्वामी पर चिपक गया है। कन्नड़ भाषा के इस्तेमाल पर जोर देकर (और हिंदी का विरोध करते हुए) उन्होंने मोदी के वक्तृत्व के असर को कुंद कर दिया है। मोदी के हिंदी में दिए हर भाषण को लोगों का एक वर्ग हिंदी थोपने के रूप में देखेगा! लिंगायतों को अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता देने की मांग का समर्थन करके उन्होंने भाजपा के एक भरोसेमंद वोट बैंक में दरार डाल दी है। भाजपा से कांग्रेस की तरफ जाने वाले हर लिंगायत वोट का दोहरा मूल्य है!

कनार्टक उठ खड़ा होगा?
मतदान में अभी छह दिन बाकी हैं। कांग्रेस सरकार को हर हाल में इन दिनों में सांप्रदायिक सौहार्द और शांति बनाए रखना चाहिए। निर्वाचन आयोग को पैसा बांटने पर रोक लगाने में अपनी असहायता का बहाना नहीं करना चाहिए (जैसा कि उसने 2016 में तमिलनाडु में किया)। सिद्धारमैया को यह साबित करना चाहिए कि दो सीटों से लड़ने का उनका फैसला कांग्रेस के अधिक से अधिक उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने में बाधक नहीं रहा। इसके अलावा, उनका चुनाव अभियान 2 रेड््डी+1 येड््डी पर केंद्रित होना चाहिए- एक नारा जो मोदी ने दिया!
इस बार भाजपा जीतने की शेखी नहीं बघार रही है। इस बार उसकी पूरी कोशिश कांग्रेस को बहुमत पाने से रोकने और जनता दल (एस) के साथ मिल कर सरकार बनाने की है। भाजपा के लिए यह फायदे का और सिद्ध फार्मूला है (मणिपुर, गोवा, मेघालय)!

कर्नाटक चुनाव मतदाताओं के लिए एक बड़ा मौका है, जो देश में राज-काज में आ रही गिरावट को लेकर चिंतित हैं। इनमें दलित हैं, अल्पसंख्यक हैं, स्त्रियां हैं, लिबरल और धर्मनिरपेक्ष लोग हैं, पर जिन्हें अपने हिंदू होने पर फख्र है। इनमें वे लोग भी हैं जो नोटबंदी से बुरी तरह प्रभावित हुए और वे लोग भी हैं जो दोषपूर्ण जीएसटी से त्रस्त हैं। इनमें वे भी हैं जो 2014 में पहली बार मतदाता बने और जो नौकरी मिलने के वादे के झांसे में आ गए और जिनका पूरी तरह मोहभंग हो गया जब उन्हें कहा गया कि ‘वे जाएं और पकौड़ा तलें’। क्या वे अज्ञान, असहिष्णुता, कट्टरता और हिंसा की उभरती राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ और ऐसी चीजों को ‘सामान्य’ बनाने के भाजपा नेतृत्व के रवैए के खिलाफ उठ खड़े होंगे? अपने सहज-बोध से, मुझे लगता है कि ऐसे ही मतदाताओं का बहुमत है, पर यह तो 15 मई 2018 को ही पता चलेगा।सबसे कम दांव पर लगा है जनता दल (एस) का। कांग्रेस का काफी कुछ दांव पर लगा है, और सबसे ज्यादा भाजपा का। नतीजे जो भी हों, उनकी लंबी परछार्इं मई 2019 तक बनी रहेगी।

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