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पुस्‍तक समीक्षा: मां समान नदी के प्रति इंसान इतना क्रूर कैसे हो गया कि उसे गुहार लगानी पड़ रही है…

सदियों तक देश की दशा और‍ दिशा तय करने वाली यमुना की लहरें अब काली हो गई हैं। एक हद तक उसी तंत्र की तरह, जिसने हमारे वैचारिक और मान‍सिक अवचेतन को भी बर्बाद कर दिया है।

Author January 15, 2017 1:42 PM
यह पुस्‍तक यमुना और मानव से फिर से जोड़ने की बात करती है, इस आशा के साथ कि यमुना अपना पुराना तेज, वेग और स्‍वरूप वापस पा सकेगी।

यह सर्वमान्‍य तथ्‍य है कि नदियों के किनारों पर सभ्‍यताएं फलती-फूलती हैं। मगर क्‍या हो अगर नदियों को फलने-फूलने देने की जगह उनका गला घोंट दिया जाए। तब क्‍या वह किसी सभ्‍यता को उसका आधार दे पाने में सक्षम साबित होंगी?

वरिष्‍ठ लेखिका पूजा मेहरोत्रा की पुस्‍तक ‘मैं यमुना हूं और जीना चाहती हूं’ न सिर्फ एक नदी के प्रादुर्भाव से लेकर उसके समुद्र में समा जाने की गाथा कहती है, बल्कि एक कड़वा सच भी सामने लाती है। जीवनदायिनी कहलाने वाली यमुना आज खुद अपने अस्तित्‍व को बचाने के लिए गुहार क्‍यों लगा रही है? क्‍या इस प्राचीन देश की तीन दिव्‍य नदियों में से एक यमुना को भी सरस्‍वती की तरह धरती में समा जाना चाहिए? विरले ही इस बात से इनकार करेंगे कि भारत के मैदानी इलाकों को बनाने में यमुना का योगदान गंगा से बराबर ही है। फिर इस देव-तुल्‍य नदी का ऐसा हाल कैसे हुआ? किस तरह अरावली की पहाड़‍ियों से अठखेलियां करती बहने वाली यमुना का पानी आज नीले से काला हो गया है? जिन संस्‍कृतियों, सभ्‍यताओं का जन्‍म यमुना तट पर हुआ, उन्‍होंने ही अपनी जननी से मुंह क्‍यों मोड़ लिया है? क्‍या हम भारतवासी इतने निष्‍ठुर हैं कि दमघोंटू प्रदूषण से त्रस्‍त अपनी यमुना मैय्या के करुण क्रंदन को भी अनसुना कर रहे हैं? पूजा मेहरोत्रा की यह पुस्‍तक इन प्रश्‍नों के जवाब तलाशने की सार्थक पहल है। प्रकृति हमें निरंतर देती रहती है, बदले में मांगती है तो जरा सा प्रेम, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि मानव प्रेम का नहीं, संसाधनों का भूखा है। उसे दोहन करने की लत लग चुकी है, और इस लत ने हमसे बहुत सारे प्राकृतिक वरदान छीन लिए हैं। इन्‍हीं में से एक है यमुना, जिसकी व्‍यथा आम जनमानस तक पहुंचाने का भागीरथ प्रयास इस ज्ञानवर्द्धक, विचारोत्तेजक पुस्‍तक के जरिए किया गया है।

पुस्‍तक में यमुना के ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्‍कृतिक और धार्मिक महत्‍व को रेखांकित किया गया है। धरती के हिमकाल में भी यमुना का दिव्‍य बर्फीला स्‍वरूप स्‍पष्‍ट नजर आता था। अरावली की पहाड़ियों से निकलकर बहने वाली यमुना आज वहां से नहीं बहती, जहां वह पहले बहा करती थी। समय के साथ यमुना ने भी खुद को ढाला और एक बड़ी आबादी को अपने इर्द-गिर्द बसने लायक प्राकृतिक सुविधाएं प्रदान कीं। गंगा के साथ मिलकर यमुना ने जो मैदान बनाए, वर्तमान में वह भारत का सबसे उपजाऊ हिस्‍सा समझा जाता है। मगर आज यमुना सिमट रही है, उसका स्‍वरूप नदी की बजाय नाले जैसा होता जा रहा है। वही नाले, जिसमें मानव अपने समस्‍त अपशिष्‍ट बहा देता है और पलटकर देखता तक नहीं।

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गंगा को लोग देवी, माता मानकर पूजते हैं। यमुना अपनी पवित्रता के लिए विख्‍यात रही है, इन दोनों नदियों को विलुप्‍त हो चुकी सरस्‍वती के साथ हिन्‍दू धर्मग्रंथों में बेहद उच्‍च स्थान दिया गया है। पूजा ठीक ही लिखती हैं कि कभी लोगों के पाप धुलने वाली यमुना आज खुद अपनी पवित्रता तलाश रही है। आचमन तो छोड़‍िए, अगर आप यमुना में सीधे नहाने उतरे तो चर्म रोग तक हो सकता है। एक समय यमुना में एक भी कीटाणु नहीं होते थे, मगर आज उसके पास से गुजरने पर ही लोगों को नाक पर रुमाल रखना पड़ता है। मजे की बात तो देखिए, जो लोग सूट-बूट पहनकर पांच सितारा होटलों में यमुना को साफ रखने पर परिचर्चा करते हैं, वही लोग विभ‍िन्‍न पुलों पर गाड़ी रोककर यमुना में पूजा की सामग्री और कूड़ा फेंकते दिखते हैं।

ऐसा भी नहीं कि दिन-ब-दिन गंदी होती यमुना को बचाने की कोशिशें नहीं हुईं। पुस्‍तक में विशेषतौर पर यमुना को साफ करने और उसके पानी को नियंत्रित करने से जुड़ी योजनाओं पर विस्‍तार से चर्चा की गई है। लेखिका ने विभिन्‍न एक्‍शन प्‍लान और योजनाओं का तुलनात्‍मक अध्‍ययन किया है और उनकी असफलता की वजहें भी गिनाईं हैं। इतने प्रयास के बावजूद अभी तक यमुना का कायाकल्‍प क्‍यों नहीं हो पाया, इस पर लेखिका कहती हैं कि ‘इसका सीधा सरल सा जवाब यही है कि हमारे जागरूक होने के बाद ही साफ होगी यमुना। पुस्‍तक में लंदन की टेम्‍स और उत्‍तर प्रदेश के सहारनपुर की नदी पांवधोई का उदाहरण देकर प्रेरित भी किया गया है। यह दोनों नदियों बेहद प्रदूषित हुआ करती थीं, मगर जब लोगों ने ठान ली तो उनका कायाकल्‍प हो गया। आज टेम्‍स का सफाई अभियान पूरे विश्‍व में नजीर की तरह देखा जाता है। क्‍या हम कुछ वैसा ही अपनी आदरणीय नदियों के लिए नहीं कर सकते?

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यमुना केवल एक नदी नहीं है, वह भारतीय इतिहास और विश्‍वास की ऐसी कड़ी है जिससे करोड़ों लोगों की आस्‍था जुड़ती है। भगवान श्रीकृष्‍ण के अधिकतर संस्‍मरण यमुना के विहंगम दृश्‍य के समक्ष लिखे गए हैं। कृष्‍ण और यमुना जैसे एक-दूसरे के लिए ही बने हों। मगर कृष्‍ण को यमुना से जितना लगाव था, उनके भक्‍त यमुना से उतना ही कटे नजर आते हैं। यमुनोत्री से निकलकर प्रयाग में गंगा और सरस्‍वती से दिव्‍य संगम करने से पहले यमुना करीब 1400 किलोमीटर लंबे भूभाग को सिंचित करती है। इस बीच ग्‍यारह झरने और नदियां यमुना में समा जाती हैं। दूसरों को सहज ही अपना लेने वाली यमुना को अपनाने में मानव कहीं पीछे रह गया। यह पुस्‍तक यमुना और मानव से फिर से जोड़ने की बात करती है, इस आशा के साथ कि यमुना अपना पुराना तेज, वेग और स्‍वरूप वापस पा सकेगी।

पूजा मेहरोत्रा ने सीधे, सपाट शब्‍दों में यमुना की व्‍यथा पाठकों के सामने रखी है। बफीर्ली वादियों में श्‍वेतवर्णी जल के साथ शुरू होकर दिल्‍ली आते ही नाले में बदल जाने वाली यमुना की जीवन यात्रा के हर कालखण्‍ड का सजीव चित्रण पाठक को बांधे रखता है। यमुना पर हुए विभिन्‍न शोधों के अध्‍ययन की जानकारियां बांटकर लेखिका पाठकों के अवचेतन को झकझोरने का सार्थक प्रयास करती हैं। विकास के पथ पर सरपट भागने के चक्‍कर में प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य को न करने की सीख देती यह पुस्‍तक यमुना को एक नया जीवनदान देने के लिए लोगों को अवश्‍य प्रेरित करेगी। अपनी मुहिम के लिए लेखिका पूजा मेहरोत्रा को साधुवाद।

ग्रंथ अकादमी, नई दिल्‍ली द्वारा प्रकाशित इस ज्ञानवर्द्धक पुस्‍तक का मूल्‍य 200 रुपए (सजिल्‍द) है।

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