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बेबाक बोल- सत्ता की सुविधा

राजनीति के मैदान में हरियाणा से राष्ट्रीय फलक पर उभरे प्रदेश के कद्दावर नेता व पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल को रोहतक लोकसभा क्षेत्र में लगातार तीन बार पटकनी देकर भी भूपिंदर सिंह हुड्डा देश की जनता के बीच अपना नाम उस हद तक नहीं पहुंचा पाए...

Author September 10, 2016 1:48 AM

हिंदुस्तान की सियासत में सत्ता की सुविधा मिलते ही लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए शासक नायकत्व की छवि पा जाते हैं। लेकिन सत्ताच्युत होते ही उनके फैसले कानून के कठघरे में खड़े हो जाते हैं। लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, कैप्टन अमरिंदर सिंह, प्रकाश सिंह बादल और जयललिता की तरह हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा अभी सवालों की सीखचों से बंधे हुए हैं। हालात के करवट लेते ही जो कदम मनोहरलाल खट्टर के लिए पारदर्शिता है वह हुड्डा के शब्दों में ‘सियासी बदला’ है। सत्ता की ‘जमीन’ पर कभी सर्वशक्तिमान रहे हुड्डा की दरकती सियासी जमीन पर पढ़ें इस बार का बेबाक बोल।

राजनीति के मैदान में हरियाणा से राष्ट्रीय फलक पर उभरे प्रदेश के कद्दावर नेता व पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल को रोहतक लोकसभा क्षेत्र में लगातार तीन बार पटकनी देकर भी भूपिंदर सिंह हुड्डा देश की जनता के बीच अपना नाम उस हद तक नहीं पहुंचा पाए, जितना कि प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को गुड़गांव के शिकोहपुर में सीएलयू देकर अर्जित कर गए। मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और हुड्डा में यही मुख्य फर्क है कि खट्टर पहली बार चुनाव लड़े, विधायक बने और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए, जबकि हुड्डा पहले मुख्यमंत्री बने और बाद में विधायक। 2005 में जब हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला अपनी सत्ता बचाने के संघर्ष में जुटे थे, तभी हुड्डा ने गांधी परिवार से नजदीकियां बना ली थीं। हालांकि उसी के सदके कांग्रेस ने राज्य में चुनाव प्रचार के वक्त पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश की राजनीति के धुरंधर भजनलाल को मुख्यमंत्री के दावेदार की तरह पेश किया, लेकिन ऐन मौके पर भजन को किनारे कर हुड्डा को प्रदेश की कमान दे दी। यह तब भी हुआ जबकि अपनी ढलती उम्र के कारण भजनलाल खुद कह रहे थे कि मुख्यमंत्री बनने का यह उनका आखिरी मौका है।

बहरहाल, 2005 से 2009 तक हुड्डा के चार बार सांसद चुने जाने के बाद भी उन्हें ‘नौसिखिया मुख्यमंत्री’ इसलिए कहा गया कि वे उससे पहले कभी राज्य में मंत्री भी नहीं रहे थे और न ही उनका प्रदेश की नौकरशाही में कोई दबदबा था। लिहाजा, राजनीति और नियुक्तियों, दोनों में हुड्डा ने दोस्तों को तरजीह दी। युवावस्था के मित्र पूर्व केंद्रीय मंत्री विनोद शर्मा को अपने मंत्रिमंडल के सभी वरिष्ठ साथियों को दरकिनार करते हुए नंबर दो का दर्जा दिया और प्रधान सचिव के पद पर अपने एक अन्य मित्र मुरारी लाल तायल को बिठाया। प्रदेश की पुलिस की कमान भी अपने एक अन्य मित्र रंजीव दलाल को दी। नियम से टेनिस खेलने वाले अपने साथियों को अपने आसपास रखा और उनके घर और दफ्तर की कमान पूरी तरह से अपनों के हाथ में रही। यों भी प्रदेश के राजनीतिक हलकों में इन्हें ‘यारों का यार’ कहा जाता है।

इस बीच सभी प्रमुख पदों पर एक-एक करके उनके अपने सुशोभित होते गए। 2009 में जब हुड्डा को लगा कि प्रदेश में उनका जबर्दस्त दबदबा बन गया है और केंद्र में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ चुकी है तो उन्होंने छह महीने पहले ही राज्य में चुनाव करवा दिया। नतीजा डराने वाला था। कभी चौटाला जैसे सर्वशक्तिमान समझे जाने वाले मुख्यमंत्री को प्रदेश की राजनीति के हाशिए पर पहुंचा कर 90 में से 67 सीटें जीत कर सरकार बनाने वाले हुड्डा की कांग्रेस महज 40 सीटों पर सिमट गई। लेकिन तब तक हुड्डा सभी दांव-पेच सीख चुके थे। आनन-फानन में उनके तब के विश्वासपात्र व मित्र विनोद शर्मा ने उनके लिए प्रदेश के सभी सात निर्दलियों का समर्थन जुटा दिया। सरकार बन गई और जल्दी ही भजनलाल के पुत्र कुलदीप बिश्नोई की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस के छह में से पांच विधायकों को कांग्रेस में शामिल करवा कर हुड्डा ने प्रदेश में अपने बूते बहुमत भी जुटा लिया।

यही वह कार्यकाल था, जब हुड्डा ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को गुड़गांव में सीएलयू जारी किया। प्रदेश के एक वरिष्ठ अफसर अशोक खेमका ने जब इस मामले का पर्दाफाश किया, तभी से हुड्डा की मुश्किलों का दौर शुरू हो गया। 2014 तक यह मामला इतना उछल चुका था कि हुड्डा के लिए सत्ता और पार्टी में अपना दबदबा कायम रखना मुश्किल हो गया। उनके करीबी माने जाने वाले विनोद शर्मा ने कांग्रेस से किनारा कर भाजपा में शामिल होने की नाकाम कोशिश की, फिर बाद में अपनी पार्टी बना ली। उनके अपने ही साथी बीरेंद्र सिंह, राव इंद्रजीत (दोनों इस समय भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री), किरण चौधरी, कैप्टन अजय सिंह यादव सरीखे नेता खुल कर उनके विरोध में आ गए। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर से उनका छत्तीस का आंकड़ा बन गया। नतीजतन, लोगों ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा कर प्रदेश में पहली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बना इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

सत्ता का सुख छिनते ही दबे पड़े अनेक मामले एक-एक करके बाहर आने लगे और हुड्डा की मुश्किलों का दौर शुरू हो गया। हालांकि, हुड्डा इन सबसे अनजान नहीं होंगे, क्योंकि गुड़गांव के भूमि सौदों, सीएलयू, अधिग्रहण और अधिग्रहण से मुक्त जमीन, मनचाहे आबंटन (औद्योगिक व आवासीय), पक्षपात, लाइसेंस और चाचा-भतीजावाद की चर्चा नौकरशाही में आम होती रहती थी। बस कोई कागज पर दर्ज सबूत नहीं देता था। हुड्डा के सत्ता से फारिग होते ही सभी दस्तावेज एक-एक करके बाहर आते गए और मामले दर्ज होते गए। अभी ढींगड़ा आयोग की रिपोर्ट को आए एक हफ्ते भी नहीं हुआ कि सीबीआइ ने हुड्डा और उनके सहयोगियों के दो दर्जन के करीब ठिकानों पर छापेमारी करके कई दस्तावेज और रेकार्ड अपने कब्जे में लिए हैं। हालांकि जानकारों का मानना है कि हुड्डा ‘कागज-पत्तर के पक्के’ शख्स रहे हैं। यही वजह है जब हरियाणा में छापे चल रहे थे, तब हुड्डा और उनके साथियों के बीच दिल्ली वाले घर में चाय के दौर चल रहे थे। वे बेफिक्र दिख रहे थे। लेकिन सत्ता की सुविधा छिनते ही आप कब अर्श से फर्श पर आने लगते हैं इसका अहसास शायद हुड्डा को धीरे-धीरे होने लगा है।

इस साल के शुरू में इन सबके आसार दिखने शुरू हो गए थे। पहले मई में सीबीआइ ने पंचकुला में चौदह औद्योगिक प्लॉटों के आबंटन का मामला दर्ज किया। और फिर प्रवर्तन निदेशालय ने कांग्रेस के नेशनल हेरल्ड समाचार पत्र को प्रकाशित करने वाले एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) के अधिकारियों और हुड्डा के खिलाफ प्रिवेंशन आॅफ मनी लांडरिंग एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया। यह मामला नियमों को ताक पर रख कर एजेएल को पंचकुला में एक प्लॉट देने का था। गुड़गांव के मौजूदा मामले में हुड्डा के साथ-साथ तायल, उनके बाद हुड्डा के प्रधान सचिव बने छत्तर सिंह जो इस समय संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य हैं और नगर व आयोजन विभाग के तत्कालीन निदेशक सुदीप सिंह ढिल्लो भी नप गए हैं।

हुड्डा की मुश्किलों का एक बड़ा कारण यह भी है कि जिस पार्टी से उन्होंने हरियाणा में एकछत्र राज किया, वहां अब उनका रुतबा पहले जैसा नहीं है और न ही आलाकमान की नजर में शायद पहले जैसी अहमियत है। चुनाव हारने के बाद पार्टी ने भी उन्हें कैसे हाशिये पर ही रखा, इसकी बानगी देखी जा सकती है। पार्टी ने केंद्र में जिम्मेदारी के लिए युवा और तेजतर्रार रणदीप सिंह सुरजेवाला को चुना, जिन्हें पार्टी के मीडिया प्रकोष्ठ का प्रमुख बनाया गया। प्रदेश के विधायकों की कमान हुड्डा को नजरअंदाज करते हुए उनकी विरोधी किरण चौधरी को दी गई। प्रदेशाध्यक्ष पद पर बैठे और हुड्डा की लगभग खुल कर मुखालफत करने वाले अशोक तंवर को उनके पद पर बनाए रखा गया। हालांकि, यह सच अपनी जगह कायम है कि प्रदेश के 19 में से 17 विधायक आज भी हुड्डा के साथ खड़े हैं और वे गाहे-बगाहे इनके साथ अपना शक्ति-प्रदर्शन करते रहते हैं।

हुड्डा की राजनीतिक ढलान की तरह दिखते हालात में उन पर ताबड़तोड़ ‘हमला’ देश की राजनीति में चल रहे एक और दौर की ओर भी इशारा करने वाला है। क्या सत्ता आपको आपके फैसलों से बचाने का साधन है? क्या कारण है कि एक के बाद एक मुख्यमंत्री सत्ताच्युत होते ही किसी न किसी मामले में उलझ जाते हैं? जब ये मामले जमीन पर पल रहे होते हैं उस वक्त देश की नौकरशाही मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, मधु कोड़ा, वीरभद्र सिंह, बीएस येदुरप्पा, जयललिता जैसे सत्ताधारी राजनीतिकों के सामने सिर झुकाए खड़ी रहती है। जैसे ही वह राजनीतिज्ञ सत्ता की कुर्सी से उतरता है, नौकरशाही का रुख भी बदल जाता है। लेकिन आलम यह भी है कि कठघरे में कई नेताओं के साथ-साथ उसके तत्कालीन अफसर भी लपेटे में आ जाते हैं। तो क्या नौकरशाही खुलेआम महज सत्ता में बैठे लोगों के इशारों पर नाचती रहती है? या फिर वह भी राजनीतिकों के साथ मिल कर मलाई चाट रही होती है? यह माना जा रहा है कि हुड्डा कार्यकाल के दौरान कई अफसरों ने प्लॉट आबंटन का भरपूर लाभ उठाया और कुछ ने तो अपने या अपने परिवार के नाम तीन या चार प्लॉट या फ्लैट भी आबंटित करा लिए।

यह ब्योरा सरकारी प्लॉटों और फ्लैटों का है। इसमें वे सब पहुंचाए गए फायदे शामिल नहीं जो बिल्डरों से हासिल हुए। आखिर जमीन को पहले अधिग्रहण के लिए अधिसूचित करना, फिर औने-पौने दामों पर अपने चहेतों को खरीदने का इशारा कर देना और फिर उसे अधिग्रहण से मुक्त कर देना। यह गजब का गड़बड़झाला एक आदमी का काम कैसे हो सकता है। इसके पीछे तो एक संगठित गिरोह के तौर पर काम करने वाला कोई समूह होना चाहिए!

बहरहाल, यह तय है कि आने वाले समय में यह सब जल्द ही बेनकाब होगा। हरियाणा के एक पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और उनके पुत्र अजय सिंह चौटाला प्रदेश में जेबीटी शिक्षकों की भर्ती के मामले में दस साल के लिए सजायाफ्ता हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस आइएएस अधिकारी संजीव कुमार ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था, वे खुद भी फरियादी से मुलजिम और मुलजिम से मुजरिम तक का सफर तय करके इसी मामले में जेल में हैं।

अपने कार्यकाल के दौरान कांग्रेस ने हुड्डा को एक सशक्त जाट नेता के रूप में पेश किया था। लेकिन अब पार्टी उनका विकल्प तलाश रही है। इस समय हुड्डा का साथ पार्टी को महंगा पड़ता दिखाई दे रहा है, जबकि एक ऐसा समय रहा है कि केंद्र के धुरंधर नेता, आसपास के राज्यों के कांग्रेस नेता, मंत्री, बड़े-बड़े व्यवसायी और भी जाने कौन-कौन, उनकी लॉबी में घंटों इंतजार करते थे कि वे नाश्ता करके आएं और उनसे बात हो। लेकिन हालात ने वैसे ही करवट ली है, जैसे हर राजनीतिज्ञ के लिए लेती है। आज हुड्डा का न पार्टी के भीतर और न पार्टी के बाहर वैसा रुतबा है। यह अलग पहलू है कि एक बात आज भी जस का तस है, और वह है हुड्डा के वफादारों का जमघट। हो भी क्यों नहीं! भले वक्त में हुड्डा किसी निकट सहयोगी की पत्नी होने के नाते ही उन्हें सूचना आयुक्त बना देते थे। या फिर किसी सेवानिवृत्त बाबू को महज इसलिए सूचना आयोग का सदस्य बना देते थे कि उसने कभी किसी तरह की जरूरी सेवा की है। लेकिन अब उनके पास सत्ता की सुविधा नहीं है। सत्ता में रहकर दिलदारी से अपने वफादारों की जमीन मजबूत करने वाले हुड्डा की सियासी जमीन आगे और कितनी दरकती है यह देखना वक्त की बात है।

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