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बेबाक बोलः कश्मीर की कराह- अनदेखी की आग

अब पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भी प्रदर्शन हुआ और कश्मीर की आजादी के नारे लगाए गए। पाकिस्तानी सरकार बुरहान वानी को शहीद बता रही है।

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वादी की आग से सैकड़ों किलोमीटर दूर दिल्ली में सुकून की जगह पर बैठ कर कश्मीर के बारे में बात करने में हिचक तो उठती है लेकिन जब इंसानियत जल रही हो तो अपने हिस्से का बोलना जरूरी लगता है। आजादी के बाद से ही संयुक्त राष्टÑ में पहुंचा दिए गए कश्मीर को भारत के नेतृत्वकर्ताओं की अदूरदर्शिता के कारण ‘अन्य’ के खाते में डाल दिया गया। एक जीवंत समाज के इतिहास, संस्कृति, समाज को अनेदखा कर उसे भूगोल बना दिया। आज के दौर में भूगोल का यह हिस्सा सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों के लिए अहम हो गया है और यहां की जनता गौण हो गई है। ‘हम हैं कि नहीं’ का सवाल पूछती जनता कट्टरपंथियों के हाथ का मोहरा बन चुकी है और इस सवाल पर अनदेखी जारी है। अनदेखी की इसी आग पर इस बार का बेबाक बोल।

अब पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भी प्रदर्शन हुआ और कश्मीर की आजादी के नारे लगाए गए। पाकिस्तानी सरकार बुरहान वानी को शहीद बता रही है। भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश यात्रा से लौटते ही कश्मीर में बवाल पर बैठक की। अमेरिका ने भी अपनी निगहबानी तेज कर दी है। तो एक बार फिर कश्मीर मुद्दे पर बवाल मचा हुआ है। दुखद यही है कि इस बार भी केंद्र में कश्मीर है, वहां की जनता नहीं।
कश्मीर एक वर्तमान है तो कश्मीर एक इतिहास भी है। कश्मीर को लेकर इतिहास में एक समझ बनी है वह वर्तमान की आग में हमेशा जला दी जाती है। आजादी के बाद से ही नीति-नियंताओं ने कश्मीर को ‘अन्य’ का दर्जा दे दिया। यहां की स्थानीय उम्मीदों को दबाने की कोशिश की गई। धारा 370 के नाम पर उन्माद फैलाया गया। और किसी ने भी इस उन्माद को खत्म करने की कोशिश नहीं की। कश्मीर की समस्या को दिल्ली से देखा जा रहा है, पाकिस्तान से देखा जा रहा है और अमेरिका से भी देखा जा रहा है। लेकिन कश्मीर की समस्या को वहां की जनता के नजरिए से देखने की कोशिश ही नहीं की जा रही है।

भारत की आजादी के बाद से ही कश्मीर को सिर्फ एक भूगोल की तरह ही देखा गया है। और कश्मीर के भूगोल में वहां की जनता गायब है। इस भूगोल को भी मिलाए रखने की कोशिश बंदूक के बल पर ही की गई है। सुरक्षाबलों के सहारे नागरिकों पर राज करने की कोशिशें इतिहास के हर पन्ने पर नाकाम रही हैं। और राष्टÑीय राज्य की यही नाकामी चरमंपथी समूहों को कामयाबी की राह पर ले जाती है। ‘दिल्ली दूर होने’ का ही नतीजा है कि कश्मीर में एक बड़ा तबका राष्टÑीय राज्य के खिलाफ खड़ा हो उठता है।

आज कश्मीर का महत्त्व सबके लिए है। साम्राज्यवादी ताकतों के लिए, पाकिस्तान और चीन के लिए भी। ये सब कश्मीर को दरअसल सामरिक महत्त्व के नजरिए से देखते हैं। सामरिक दृष्टि से अहम छोटे क्षेत्र इस तरह की दुविधा के शिकार होते रहे हैं। साम्राज्यवादी ताकतें चाहती हैं कि ये ‘आजाद’ होकर इस समूचे इलाके में उनकी शक्ति स्थापना के लिए उन्हें मुफीद जगह दें। पाकिस्तान से लेकर चीन और अमेरिका तक के स्वार्थ कश्मीर से जुड़ते हैं और ये चाहते हैं कि कश्मीर एक विवादित भूगोल बना रहे।

लेकिन इस हकीकत को समझने के बावजूद ‘दिल्ली वाली’ भारत सरकार ने कश्मीर को भूगोल से परे जाकर इतिहास, राजनीति और संस्कृति का हिस्सा बनाने में दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई? हमने अपने पुराने प्रतिमान को क्षत-विक्षत कर दिया। उसके इतिहास को सहेज, संवार कर वर्तमान में विकास की राह पर नहीं ला पाए। और इतिहास की राह पर स्थिर बैठी जनता को पहले के कई ‘नायकों’ की तरह फिर एक बाईस साल का नौजवान मिल जाता है और वह उसी में अपना प्रतिमान खोज कर दिल्ली को आईना दिखाने लगती है।

विडंबना यह है कि एक बार फिर आग भड़कने के बाद भी समस्या का हल मीडिया प्रबंधन के जरिए ही खोजने की कोशिश हो रही है। दिल्ली में ऊपर बैठे लोग नीचे वाले को डांट रहे हैं कि ठीक से ‘मैनेज’ नहीं किया गया। सोशल साइट पर जयकारों के उलट ‘ड्रम बजाते नीरो मोदी’ का नगाड़ा बजा तो सरकार को अपनी छवि की चिंता हुई, कश्मीर की नहीं। क्योंकि शायद अब कालेधन, मिनिमम गवर्नमेंट के बाद कश्मीर को विकास की राह पर ले जाने वाले वादों को भी ‘जुमला’ कहने का वक्त आ गया है।

जब तक कांग्रेस सत्ता में थी, उसके सामने कश्मीर को लेकर तमाम सवाल फेंकते हुए भाजपा को कभी संकोच नहीं हुआ। वे सवाल जायज रहे होंगे, क्योंकि एक देश की सत्ता पर काबिज होने के नाते केंद्र सरकार की कुछ जिम्मेदारी भी बनती है और अक्सर यह देश के दूरदराज के इलाकों में बेलगाम हो गई किसी समस्या के मामले में दिखती भी रही है। लेकिन पिछले बीस सालों से ज्यादा वक्त से कश्मीर क्यों जल रहा है? इस बीच व्यवस्था से जुड़े सैकड़ों सवालों से निपटा गया होगा, देश, संविधान और सुरक्षा-व्यवस्था के नाम पर। लेकिन कश्मीर की आग के लिए क्या देश के पास कोई हल नहीं रह गया है?

कश्मीर न केवल उस राज्य के लिए, बल्कि राष्टÑीय स्तर पर अपने राजनीतिक अभियानों के लिए भाजपा के चुनावी घोषणापत्रों का अहम हिस्सा रहा है। भाजपा कांग्रेस पर आरोप जड़ती रही है कि उसने कश्मीर समस्या को और बिगाड़ने की जमीन मुहैया कराई है और आतंकवाद के समूल सफाए का दम भरती रही है। लेकिन 372 के आंकड़े के साथ सत्तासीन होने के बाद उसकी प्राथमिकता कूटनीतिक शिष्टाचार को किनारे कर पाकिस्तान की धरती पर अचानक हवाई जहाज से उतर कर पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को ‘हैपी बर्थ डे’ कह के हैरान करने की रही है, न कि पाकिस्तान को बातचीत की मेज पर लाने की। बेशक यह दो प्रतिद्वंद्वी देशों के बीच संबंधों में सहजता लाने के लिहाज से एक प्यारा कदम था। लेकिन क्या दो देशों के संबंधों की दिशा ऐसी अनौपचारिकताओं के बूते तय किए जा सकते हैं?

सवाल यह भी है कि देश के लोगों ने क्या केवल विदेशी प्रमुखों से दोस्ताने के लिए भाजपा को सत्ता सौंपी है? आज नहीं तो कल, उस पर विचार करना ही पड़ेगा। किसी भी समस्या के प्रति व्यवस्था की अनदेखी अक्सर हैरान कर देने वाली होती है। कोई बुरहान बानी भारत के संविधान की व्यवस्थाओं के बजाय जमात-ए-इस्लामी तक कैसे पहुंच जाता है? जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों के बीज कहां पड़े और कहां से उसकी जड़ें मजबूत होती रहती हैं? किसी छोटी गतिविधि या एक ‘उन्माद भड़काने वाली लाइन’ पर सबसे संकरी गली से किसी युवक को उठा ले जाने वाली पुलिस को बुरहान वानी जैसे युवाओं के दिमाग में खुलेआम जहर भरने वाले क्यों नहीं दिखते..? दूसरे बाबाओं की तरह कोई जाकिर नाईक कथित तौर पर धार्मिक प्रवचनों के जरिए जब जमात-ए-इस्लामी की ओर जाने का रास्ता तैयार करता है, तब व्यवस्था की आंखें क्यों मुंदी रहती हैं?

अब महाराष्टÑ के खुफिया महकमे ने जाकिर नाईक को क्लीन चिट दे दी है। लेकिन सच यह है कि जाकिर नाईक कोई अचानक पैदा नहीं हुआ। लेकिन हमारी आंखें अब खुली हैं। वह भी तब, जब पड़ोसी बांग्लादेश ने हमारी सोई हुई व्यवस्था के मुंह पर ठंडे पानी की बाल्टी दे मारी। बांग्लादेश से मिली इस सूचना के बाद कि ढाका हमले के छह आतंकवादियों में दो जाकिर नाईक से प्रेरित थे, हमें याद आया कि ‘ओह! जाकिर नाईक। यह तो यहीं है। यह तो शांति दूत नहीं था’। धार्मिक मुद्दों पर अक्सर खड़े होने वाले टकरावों की एक गंभीर समस्या से जूझते देश और इसकी सत्ता के लिए तो इस तरह का भोलापन कमाल ही है। बड़े-बड़े संस्थान नाईक के भाषण करवाते थे। भारतीय पुलिस सेवा अकादमी हो या अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय का संचालन करने वाली सर्वोच्च समिति, सभी नाईक को लेकर गर्वित थे।

समस्या यह है कि नाईक जैसे कथित धर्मप्रचारक बंदूक लेकर जान लेने वाले आतंकवादियों से ज्यादा असर इसलिए रखते हैं कि ऐसे लोग जनता के दिमाग और सोचने की दिशा तय करते हैं। आतंकवादी कोई एक व्यक्ति या एक गिरोह होता है, लेकिन यह तो फौज के उस अधिकारी की तरह है, जो लोगों के मानस को तैयार करता है। अगर जाकिर नाईक की बातों में इतनी सलाहियत है तो कोई बच्चा बुरहान वानी न बने, इसके लिए उनकी बातों का असर कहां चला जाता है?
सवाल है कि बुरहान वानी का दिमाग कैसे तैयार हुआ? कश्मीर की समस्या की धुंध और जमात-ए-इस्लामी के असर में पलते-बढ़ते बुरहान का निर्माण और हो भी कैसे सकता था! महज पंद्रह साल की उम्र में आतंक के रास्ते को चुन लेने वाले बुरहान वानी ने अपनी फौज तैयार करने के लिए आधुनिक युग के सबसे सशक्त उपकरण सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। उसकी कोशिश काफी हद तक कामयाब रही, लेकिन उसे जिंदगी नहीं बख्श सकी। उसके मारे जाने के बाद उसके जनाजे में शिरकत करने वालों को किसी अगुआई की जरूरत नहीं थी। उनकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी किसी फौजी कमांडर के मारे जाने पर उसकी सेना की होती है। उनके हथियार भी वैसे नहीं थे। सबके हथियार मौके से तलाश किए हुए थे, फिर चाहे वे माचिस हो या सड़क पर पड़े पत्थर। यह बदले की भावना की फौरी प्रतिक्रिया थी। इस तरह की प्रतिक्रियाएं सालों से कश्मीर के अभ्यास में दाखिल हो चुकी हैं। लेकिन इस प्रतिक्रिया और सेना की गोलियों के अलावा इसके हल की दिशा अब तक नहीं खोजी जा सकी है। बेशक सेना या पुलिस की गोलियों के पक्ष में सरकार के पास दलील है। लेकिन आम कश्मीरी अगर हिंसक प्रतिक्रिया की भीड़ में शामिल हो रहा है, तो उसकी भी तो कोई वजह होगी! क्या वह वजह इतनी जटिल हो चुकी है कि सरकार को उसका कोई हल नहीं समझ में आ रहा? कश्मीर के लोगों को मानवाधिकार और नागरिक सम्मान दिलाने के लिए अब तक कौन सा कदम उठाया गया है?
एक सवाल यह भी है कि ज्यादा खतरनाक कौन है? वह, जो अकेला या एक गिरोह के साथ हमलावर होता है, जो किसी इशारे पर आगे बढ़ता है या सालों तक सत्ता कब्जाए बैठी वह सरकार, जो अपने देश के लोगों से जीने का हक छीन रही है। जो सत्ता के खिलाफ उठे नाराजगी के स्वर को बगावत मान बैठती है और नागरिकों के हकों पर पहरे बैठाती है। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में 2000 के बाद हुई मुठभेड़ों का हिसाब मांग ही दिया है। दशकों तक हकों की अनदेखी का हश्र तो मणिपुर और कश्मीर ही होना है।
कश्मीर में इसी अनदेखी का चरम रूप दिख रहा है। सच यह है कि पिछले ढाई दशक के दौरान कश्मीर अपनी आग में और घिरता गया है, लेकिन अभी तक किसी सरकार ने कोई ऐसी ठोस पहल नहीं की जो इस आग को बुझाने और इस समस्या को उसके तर्कसंगत अंत तक पहुंचाने की कोशिश करे। हां, कश्मीर में आग भड़कने के बाद तो उसकी आंच में पाकिस्तान भी अपने स्वार्थ की रोटी सेंक लेता है। पिछले कई सालों से खिंच रही इस समस्या पर अब पाकिस्तान की उपेक्षा करना नामुमकिन-सा हो गया है। दोनों तरफ से इतना कहा जा चुका है कि ‘पाकिस्तान को चेतावनी’, ‘दखल न दे’ की धमकी या ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग’ जैसी बयानबाजी कहीं मौजूदा सरकार के जुमलों की सूची में शामिल न हो जाए।
सनद रहे, कश्मीर का समाधान राजनीतिक मंचों से या वातानुकूलित मंत्रालयों के कार्यालयों से होने वाली बयानबाजी से नहीं होगा। इसके लिए तो सरकार को ठोस उपाय करने होंगे। देश और सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष पदों पर सुशोभित नरेंद्र मोदी और अमित शाह से अब यही तवज्जो है कि वे अपनी कड़क जुबानी जमाखर्च से आगे बढ़ कर इस समस्या का हल तलाशें। इतिहास समस्याओं को यों ही छोड़ देने वाले या यथास्थिति बनाए रखने वालों का प्रशस्तिगान नहीं करता। वह तो पार्टी के मुखपत्र में ही हो सकता है।
कश्मीर एक बार फिर उस दौर में है, जब देश के इस अभिन्न हिस्से को अपना समझ कर उसे अपना बनाने की कवायद भी जमीन पर उतरे। अगर यह जल्दी नहीं हुआ तो कश्मीर के इतिहास की किताब में दिल्ली की काहिली का एक और पन्ना जुड़ेगा और तब कोई हैरानी नहीं होगी जब वहां के हालात का फायदा उठा कर कोई ‘कमांडर’ बन जाए। यह समझ लेना होगा कि कश्मीर पर अब औपचारिकताएं निभाने का समय नहीं। घाटी एक कठिन दौर में है। ऐसे में त्वरित प्रतिक्रिया वक्ती अमन तो ला सकती है, पर इससे स्थायी शांति की सूरत नहीं बन सकती।

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