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चौपालः तनाव के पीछे

महाराष्ट्र के कई इलाकों में भीमा कोरेगांव युद्ध के 200 साल पूरे होने पर भड़की हिंसा को जातीय विद्वेष का नाम दिया जा रहा है।

Author January 9, 2018 2:30 AM
भीमा कोरेगांव की लड़ाई की बात की जाए तो वह एक जातीय लड़ाई से ज्यादा शोषण और दमन के विरुद्ध लड़ाई थी।

महाराष्ट्र के कई इलाकों में भीमा कोरेगांव युद्ध के 200 साल पूरे होने पर भड़की हिंसा को जातीय विद्वेष का नाम दिया जा रहा है। अक्सर देखने को मिलता है कि जब कहीं हिंसा भड़कने की आशंका होती है तो सरकार उसे रोकने के लिए पहले से पुख्ता इंतजामात नहीं करती और जब हिंसा हो जाती है तो उसके बढ़ जाने का इंतजार करती है। फिर राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेलते हैं। अफसोसनाक है कि हर तरह की हिंसा को महज धार्मिक या जातीय चश्मे से देखने का प्रयास किया जाता है। समाज में तनाव का कारण आर्थिक पहलू भी हो सकते हैं, इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता।

यदि भीमा कोरेगांव की लड़ाई की बात की जाए तो वह एक जातीय लड़ाई से ज्यादा शोषण और दमन के विरुद्ध लड़ाई थी। दलित अंग्रेजों की ओर से जरूर लड़ रहे थे पर उनके लिए यह शोषण के विरुद्ध लड़ाई ज्यादा थी। इतिहास को देखने और याद करने में बुराई नहीं है। बुराई उसके संदर्भ को न समझने में है, उसका दुरुपयोग करने में है। उस वक्त महार समुदाय अभावों से ग्रस्त था जबकि आज मराठा समुदाय खुद को अभावों से ग्रस्त मान रहा है। उसे यह बात खटक रही है कि जब दलितों के बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं, उन्हें नौकरियां मिल रही हैं तो उनके बच्चे क्यों पिछड़ रहे हैं! इसीलिए मराठा अब आरक्षण की भी मांग कर रहे हैं। असमान विकास से उपजी यह कुंठा ही है जो कभी धार्मिक तो कभी जातीय हिंसा में तब्दील होकर सामने आती है।

एक समस्या यह है कि देश की राजनीति भी बांटने का काम करती है। जो नेता जिस समुदाय से आता है वह उसी समुदाय के हित की बात करता है। मसलन, यदि कोई नेता दलित है तो वह दलितों के ही हित की बात करेगा। यदि कोई नेता हिंदू है तो वह हिंदुओं और मुसलिम है तो मुसलिमों का ही हित निहारेगा। हमारे नेता खुद बंटे हुए हैं। ऐसे में उनसे कैसे उम्मीद कैसे की जाए कि वे समाज में उपजे तनाव को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं।
’सुकृति गुप्ता, नई दिल्ली

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