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तीरंदाजः श्रमिक आंदोलन की जगह

नव-उदारवाद में अलगाव हमारे जीवन की बहुत बड़ी वास्तविकता बन गया है। शायद पुरानी पूंजीवादी व्यवस्था से भी ज्यादा। चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, सामाजिक या राजनीतिक, अगलाव की क्रिया सबसे महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया हो गई है। ज्यादा घंटे काम, नौकरी की असुरक्षा, गिरता श्रम मूल्य हमें अपने से, अपने पेशे से, सामाजिक परिवेश से काट रहा है।

Author May 6, 2018 00:26 am
ज्यादा घंटे काम, नौकरी की असुरक्षा, गिरता श्रम मूल्य हमें अपने से, अपने पेशे से, सामाजिक परिवेश से काट रहा है।

अश्वनी भट्नागर

लाख मना करने के बावजूद मेरे एक संवेदनशील मित्र मई दिवस पर आयोजित मजदूर रैली में शामिल होने चले गए। वर्षों से वे मजदूर आंदोलन से जुड़े हुए हैं। वे आज श्रमजीवी नहीं है, इसलिए मजदूर आंदोलन से जुड़ने की उनको कोई निजी जरूरत नहीं है। पर देश-दुनिया घूमने के बाद उनको लगता है कि मृत मजूदर आंदोलन में, जिसकी लाश को प्रदर्शित करके मजदूर संगठनों के नेता अपना काम चला रहे हैं, प्राणवायु फूंकना पहले से कहीं आज ज्यादा जरूरी हो गया है। वे श्रमजीवियों की लड़ाई की नई और धारदार रणनीति तैयार करना चाहते हैं, पर मई दिवस की रैली का माहौल देख कर उनका कलेजा फट गया है। उन्हें हर तरफ निराशा और दिशाहीनता दिखी है।

असल में अस्सी के दशक से शुरू हुई नव-उदारवादी सोच ने साम्यवाद के परखचे उड़ा दिए हैं। बर्लिन की दीवार का टूटना, सोवियत संघ का बिखर जाना और फिर चीन का उदारवाद की तरफ बढ़ने की वजह से कम्युनिस्ट और अन्य वामपंथी विचारकों के तर्क और नीतियां धराशाही हो गई हैं। मार्क्सवाद और उससे उपजी तमाम सारी विचारधाराएं, नव-उदारवादी तेवर के समाने हतप्रभ हो गई हैं। उनके पास उदारवाद की आर्थिक और सामाजिक सोच को काटने के लिए न तो कोई तर्क है और न ही कोई नई ठोस नीति है।
उदारवाद की सुनामी के चलते सोवियत संघ जब नहीं रहा तो चीन ने हड़बड़ी में अपनी व्यवस्था में पूंजीवाद की चाशनी घोल ली थी। उसने मजदूर और किसान की प्राथमिकता को लगभग समाप्त कर के सेठों और साहूकारों को अपना दामाद बना लिया था। इनको ‘निवेशक’ के नाम से दुलारा जाने लगा था। फलस्वरूप, जहां मजदूरों की बेहतरी होनी थी- ज्यादा वेतन, कार्य दशा में सुधार आदि- उससे उलट उनकी हालत बद से बदतर होती चली गई। आज चीन के श्रमिकों के पास कोई व्यावसायिक अधिकार नहीं है। वे न संगठित होकर मजदूर संगठन बना सकते हैं और न ही अपना आर्थिक और सामाजिक हक मांग सकते हैं। वैसे कहने को चीन पिछले कई दशकों से बेहतरीन आर्थिक प्रगति दिखा रहा है, पर यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। दूसरा हिस्सा आर्थिक और समाजिक विषमताओं का है, जो कम होने की जगह और विकराल हो गई है। पर पूंजीवाद की चकाचौंध की वजह से सहम गई है- स्वरहीन हो गई है।

भारत में भी बहुत कुछ ऐसा ही हुआ है। नब्बे के दशक से ही निवेशक अमीरों का नौशा बन बैठा है। उदारवाद की शुरुआत में उपभोक्ता ही सम्राट है यानी ‘कंज्यूमर इज किंग’ का नारा जरूर था, पर उसकी ओट में निवेशक ही राजा है यानी ‘इन्वेस्टर इज किंग’ की वास्तविक स्थापना हुई थी। निवेशक का राजतिलक होते ही मजदूरों पर भारी दिनों का आना स्वाभाविक था। मालिकों ने जम कर मजदूर संगठन तोड़े, वेतन मनमर्जी के कर दिए और अनुबंधन प्रणाली लागू कर दिया, जिसमें नौकरी की सुरक्षा नदारद थी।
उदारवाद की नई शक्तिशाली लहर भारतीय वामपंथियों को भी बहा ले गई। उनका सोच और संगठन इस आपदा के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। भारत केंद्रित सोच तो उनके पास पहले से ही नहीं थी, क्योंकि वामपंथी परोसी हुई सोच का ही खाते थे और जब सोवियत संघ और चीन का लंगर उठ गया, तो वे निष्प्राण होने की कगार पर आ गए। भुखमरी के चलते, पंूजीवादी निवेशकों ने मजदूर संगठनों के नेताओं के लिए भंडारा खोल दिया, जिसमें मजदूरों के हक को गिरवी रख कर ही प्रसाद चखा जा सकता था। लाखों मजदूरों की पक्की नौकरियां इस तरह के निवेशक भोजों में डकार ली गई हैं और मार्क्स के सिद्धांत और मार्क्सवादियों के अमल पर गहरे प्रश्नचिह्न लग गए हैं।

वैसे पूंजीवाद और नव-उदारवाद के फायदे कुछ भी हों, पर एक बड़ा नुकसान जरूर है। वे अलगाव जनते हैं। कार्ल मार्क्स के अनुसार श्रमिक संपत्ति अभाव के कारण अपनी श्रम शक्ति बेचता है, पर पूंजीवाद वेतन से कई गुना ज्यादा श्रम श्रमिक से निचोड़ लेता है। फलस्वरूप श्रमिक कार्यस्थल की रहट से पूरी तरह बंध जाता है। उसके पास अपने लिए, परिवार और सामाजिक कार्यों के लिए कोई समय नहीं बचता है। वह अपनी मानवता खो देता है- इंसानी मशीन बन जाता है। ऐसे में श्रमिक वर्ग का मोचन अपने मानवीय व्यवहार की पुनर्प्राप्ति में है।

मार्क्स का भौतिकवादी सिद्धांत असल में अलगाव की कहानी है। मार्क्स कई तरह के अलगाव की बात करते हैं, पर उसमें जो एक सामान्य तथ्य उभर कर आता है, वह पूंजीवाद के चलते श्रमिक का अपने जीवन पर नियंत्रण खो देने का है। मार्क्स के अनुसार हमारे उत्पादन के साधन हमारी सोच और हमारे समाज के स्वरूप को निर्धारित करते हैं। पंूजीवाद में श्रमिक को सिर्फ जिंदा रहने भर का श्रम-भुगतान मिलता है, जबकि पूंजीवादी का मुनाफा बढ़ता जाता है। वह अपने मुनाफे का कुछ हिस्सा नई मशीनरी और तकनीक इजाद करने में लगाता है, जिससे मजदूरों की संख्या और उनका वेतन घटा कर वह और मुनाफा कमा सके। अलगाव पूंजीवादी को भी डंसता है, क्योंकि उसको डर बना रहता है कि व्यापारिक स्पर्धा उसको निगल जाएगी और उसे श्रमिक वर्ग का हिस्सा बना देगी।

मार्क्स का मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमिक के शोषण की वजह से स्थिति ऐसी बन जाएगी कि दुनिया भर के मजदूर एक हो जाएंगे और व्यवस्था को उखाड़ फेकेंगे। ऐसा क्यों नहीं हुआ या फिर हुआ तो दूसरी व्यवस्था क्यों नहीं चल पाई के अनेक कारण हैं। हाल-फिलहाल के इतिहास ने मार्क्स को कई जगह गलत भी साबित कर दिया है। हमें इसीलिए मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत से ज्यादा उनके दर्शन पर ध्यान देना चाहिए, जिसमें पूंजीवाद से उत्पन्न मानवीय अलगाव एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

नव-उदारवाद में अलगाव हमारे जीवन की बहुत बड़ी वास्तविकता बन गया है। शायद पुरानी पूंजीवादी व्यवस्था से भी ज्यादा। चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, सामाजिक या राजनीतिक, अगलाव की क्रिया सबसे महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया हो गई है। ज्यादा घंटे काम, नौकरी की असुरक्षा, गिरता श्रम मूल्य हमें अपने से, अपने पेशे से, सामाजिक परिवेश से काट रहा है। हमारा व्यवहार मशीनी हो गया है, जिसका चित्रण पंजाब के मशहूर वामपंथी कवि अवतार सिंह पाश ने कुछ इस तरह किया है- ‘सबसे खतरनाक होता है/ मुर्दा शांति से भर जाना/ न होना तड़प का/ सब कुछ सहन कर जाना/ घर से निकलना काम पर/ और काम से लौट कर घर आना/ सबसे खतरनाक होता है/ हमारे सपनों का मर जाना।’ कवि पाश ने चार दशक पहले ही मार्क्स के अलगाव वाले दर्शन को पकड़ कर अपने घर के कामरेडों को राजनीतिक एजेंडा दे दिया था। यह एजेंडा आज और भी ज्यादा प्रासंगिक है। पर अपने में उलझे हुए कामरेडों में इस मानवीय अलगाव के खिलाफ झंडा उठाने की समझ और बदलाव लाने की कुव्वत है क्या?

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