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दूसरी नजरः क्या सरकार संघीय व्यवस्था को चौपट कर देगी?

जैसी कि पिछले हफ्ते मैंने आशंका जताई थी, पंद्रहवें वित्त आयोग के लिए तय किए गए दायरे के कारण लगी आग फैल गई है। इसे बुझाने के प्रयास नहीं किए गए।

Author April 15, 2018 02:31 am
पी. चिदंबरम

जैसी कि पिछले हफ्ते मैंने आशंका जताई थी, पंद्रहवें वित्त आयोग के लिए तय किए गए दायरे के कारण लगी आग फैल गई है। इसे बुझाने के प्रयास नहीं किए गए।
संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत, यह सम्मिलित रूप से राज्यों का हक है कि वे करों में अपना हिस्सा हासिल करें; यह प्रत्येक राज्य का भी संवैधानिक अधिकार है कि वह राज्यों के कुल हिस्स में से अपना उचित हिस्सा प्राप्त करे। वित्त आयोग किसी का नौकर नहीं है; इसका स्वामी सिर्फ संविधान है। राज्यों की मौजूदा हिस्सेदारी (जैसा कि चौदहवें वित्त आयोग ने तय किया था) 42 फीसद है। कोई यह नहीं सोचता कि यह हिस्सेदारी पंद्रहवें वित्त आयोग द्वारा घटा दी जाएगी।
अनुच्छेद 280 (3)(बी) के मुताबिक वित्त आयोग का दूसरा काम ‘वे सिद्धांत सुझाना है जिनके आधार पर भारत के समेकित कोष से राज्यों के लिए सहायता और अनुदान स्वीकृत किए जाएं।’ इस प्रावधान को अनुच्छेद 275 के साथ मिलाकर देखना होगा, जो संसद को हर साल जरूरतमंद राज्यों के लिए अनुदान और सहायता मंजूर करने का अधिकार देता है। लिहाजा, क्रम यह है कि संविधान द्वारा निर्दिष्ट दायित्व के मुताबिक वित्त आयोग सैद्धांतिक आधार बताएगा और संसद राज्यों के लिए अनुदान मंजूर करेगी।

आयोग के दायरे पर सवाल
पंद्रहवें वित्त आयोग के लिए तय किए गए दायरे के संबंध में पैरा 2, 3, 4 और 5 बहुत महत्त्व के हैं। पैरा 2 में ‘करेगा’ और ‘कर सकता है’ का एक अजीब घालमेल है। ‘कर सकता है’ वाला हिस्सा चिंताजनक है जो कहता है कि ‘आयोग इस पर भी विचार कर सकता है कि क्या राज्यों को राजस्व की सीमा से आगे जाकर अनुदान मुहैया कराया जा सकता है।’
पैरा 3 में वित्त आयोग से ताल्लुक रखने वाले विषयों का समावेश है। यह ज्यादातर वही है जो पहले भी हुआ करता था, पर उप-पैरा (चौथा) एक राजनीतिक तत्त्व को शामिल करता है: ‘न्यू इंडिया समेत राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम को जारी रखना होगा।’
पैरा 4 में उन विषयों का समावेश है जिन पर वित्त आयोग विचार कर सकता है। दरअसल, यहीं पर और भी राजनीतिक तत्त्व शामिल किए गए हैं, जैसे:
* जन्म दर घटाने की दिशा में किए गए प्रयास और प्रगति;
* प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (नकद सबसिडी) के जरिए बचत को बढ़ावा देने की दिशा में हुई प्रगति…डिजिटल अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन…
* लोकलुभावन कामों पर होने वाले खर्चों पर रोक या नियंत्रण।
पैरा 5 बुनियादी रूप से भेदभावमूलक है। यह कहता है कि ‘आयोग अपनी सिफारिशें देते वक्त 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करेगा।’

राज्यों का विरोध
जिन राज्यों ने वित्त आयोग के लिए तय किए गए दायरे का सावधानी से विश्लेषण किया है उन्होंने बगावत का झंडा उठा लिया है। इस सिलसिले की शुरुअत हुई केरल की पहल पर बुलाई गई दक्षिणी राज्यों की बैठक से। पांच राज्यों और केंद्रशासित पुदुच्चेरी में से, तमिलनाडु और तेलंगाना गैरहाजिर थे। मेरा अनुमान है कि तमिलनाडु की अनुपस्थिति के पीछे भाजपा का भय था, तो तेलंगाना भाजपा को लेकर अपनी दुविधा के कारण गैरहाजिर रहा।
मैं यहां वे प्रश्न पेश कर रहा हूं जो वित्त आयोग के लिए तय किए गए दायरे के कारण उठे हैं। राज्यों को ये प्रश्न केंद्र सरकार के सामने उठाने चाहिए और जवाब मांगने चाहिए।
1. क्या केंद्र सरकार वित्त आयोग से इस बात की पड़ताल करने को कह सकती है कि राजस्व अनुदान मुहैया कराए जाने चाहिए या नहीं? अनुच्छेद 290 (3) (बी) के तहत यह वित्त आयोग का कर्तव्य है कि वह इस संबंध में सिद्धांत सुझाए। अनुच्छेद 275 के तहत यह संसद का अधिकार है कि वह उ्न अनुदानों को मुहैया कराने के लिए कानून बनाए। कार्यपालिका (यानी केंद्र सरकार) उस प्रक्रिया को निष्फल करने का प्रयास कैसे कर सकती है? यह असंवैधानिक है।
2. न्यू इंडिया-2022 क्या है? फिलहाल यह प्रधानमंत्री का एक नारा भर है। यह किसी विकास कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है जिस पर राष्ट्रीय विकास परिषद या संसद ने अपनी मुहर लगाई हो। पंद्रहवां वित्त आयोग 30 अक्टूबर 2019 तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगा; उसके काफी पहले, अप्रैल-मई 2019 में आम चुनाव होंगे। वित्त आयोग को यह कैसे कहा जा सकता है कि वह एक राजनीतिक पार्टी के नारे को अपने हिसाब में शामिल करे?
3. वे कौन-से राज्य हैं जो ‘जन्म दर घटाने की दिशा में की गई प्रगति’ से लाभान्वित होंगे? इसमें निश्चित रूप से वे राज्य नहीं होंगे जो काफी साल पहले ही इस दिशा में प्रगति कर चुके हैं। उन्होंने वह लक्ष्य स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवार नियोजन पर अधिक खर्च करके हासिल किया है, पर अब उन्हें अपनी जनता की स्वास्थ्य व शिक्षा संबंधी जरूरतों पर खर्च करने के लिए कम राशि मिलेगी!

4. प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) और डिजिटल अर्थव्यवस्था ऐसे विषय हैं जिन पर हमेशा बहस की गुंजाइश रहेगी। गरीबों को अनाज मुहैया कराया जाना चाहिए या डीबीटी के तहत अनाज के बदले नकद राशि दी जानी चाहिए? किसी राज्य में ‘डिजिटलीकरण’ कहां तक और किस गति से होना चाहिए? ये ऐसे सवाल हैं जो राजनीतिक आर्थिकी से ताल्लुक रखते हैं और यही अच्छा होगा कि इनका जवाब चुनी हुई सरकारें और विधानसभाएं दें, न कि वित्त आयोग की सिफारिशें।
5. ‘लोकलुभावन कदम’ क्या है? जब कामराज ने तमिलनाडु के स्कूलों में मिड-डे मील की शुरुआत की थी, तो लोकलुभावन कदम कह कर उसकी आलोचना की गई थी; आज यह एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है।
6. वर्ष 1971 के आंकड़ों को छोड़ देने और 2011 के आंकड़ों को हिसाब में लेने के निर्देश- जो सर्वसम्मति से तय किया गया और जिसे नीतिगत वक्तयों में शामिल किया गया- की क्या कीमत राज्यों को चुकानी होगी? अगर चौदहवें वित्त आयोग ने 2011 के आंकड़ों को अपने हिसाब में लिया होता, तो केवल इस कारण राज्यों को क्या नुकसान होता, वी भास्कर (इकोनॉमिक ऐंड पोलिटिकल वीकली, 10 मार्च 2018) ने इसका हिसाब लगाया है:
राज्य नुकसान (रु. करोड़ में)
आंध्र व तेलंगाना 24,340
तमिलनाडु 22,497
केरल 20,285
प.बंगाल 20,022
ओड़िशा 18,545
कर्नाटक 8,373
असम 5,136
पंद्रहवें वित्त आयोग के तहत, इन राज्यों को होने वाला नुकसान और अधिक होगा।
‘ज्यादा आबादी वाले और ज्यादा गरीब राज्यों’ को ‘उद्यमी व विकसित राज्यों’ के खिलाफ खड़ा करके थोथी दलीलों से यह आग नहीं बुझाई जा सकती। सभी राज्यों में गरीबी और विकास संबंधी विसंगतियां हैं। उनका समाधान निष्पक्ष ढंग से और संघीय ढांचे को चोट पहुंचाए बगैर किया जाना चाहिए।

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