ताज़ा खबर
 

न भारत, न पाकिस्‍तान सभ्‍य समाज कहलाने के हकदार

जब मैं सुप्रीम कोर्ट का जज था, तब एक मामले में मैं एक बेंच का हिस्सा बना। यह 2008 में ओडिशा के कंधमाल जिले में कुछ अतिवादी हिंदू तत्वों द्वारा ईसाइयों पर किए गए हमलों के विषय में था।

Markandey Katju, India-Pakistan, Ido-Pak

सभ्य समाज की एक पहचान यह है कि उसमें अल्पसंख्यक गौरव और सम्मान के साथ रह सकें। उस दृष्टिकोण से, मैं न तो भारत और न ही पाकिस्तान को सभ्य समाज मानता हूं, क्योंकि दोनों देशों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता है। इस संबंध में मैं एक घटना बताना चाहता हूं।

मैं 1991-2004 तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय (यपी) में न्यायाधीश था। यूपी में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं। वे राज्य की कुल आबादी का लगभग 19% हैं। हालांकि, यूपी के एक गांव में कुछ हिंदू दलित परिवारों को छोड़ लगभग सभी मुस्लिम थे। उस गांव में एक घटना घटी थी। कुछ मुस्लिम युवकों ने एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया था। हाईकोर्ट में मेरे सामने मामला आया तो मैंने मुस्लिम युवकों को कठोर सज़ा दी। मैंने अपने फैसले में कहा कि मुसलमान गाँव में बहुसंख्यक हैं, इसलिए यह सुनिश्‍चित करना उनका कर्तव्य था कि वहां के हिंदू सम्मान और गौरव से अपना जीवन जी सकें। लेकिन इसके बजाय उनमें से कुछ ने हिंदू लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया। इसलिए वे किसी उदारता के लायक नहीं थे।

उसी फैसले में मैंने आगे यह भी कहा कि अगर वही गांव हिन्दू बहुसंख्यक होता और हिंदू युवाओं ने एक मुस्लिम लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया होता, तब उन हिंदुओं को भी मुझसे कठोर दंड मिला होता। और मैंने अपना निर्णय वही कहकर समाप्त किया जो मैंने इस लेख की शुरुआत में कहा है : एक सभ्य समाज की पहचान यह है कि उसमें अल्पसंख्यक गौरव और सम्मान के साथ जी सकें।

जब मैं इलाहाबाद उच्च न्यायालय का न्यायाधीश था, तो कुछ मुसलमानों की याचिकाएँ मेरे सामने आईं, जिसमें उन्होंने शिकायत की थी कि अधिकारियों द्वारा उन्हें अपनी जमीन पर मस्जिद बनाने की अनुमति नहीं दी जा रही थी, जिसके कारण उन्हें सार्वजनिक सड़क के बगल में शुक्रवार की प्रार्थना (जुमे की नमाज) करनी पड़ रही थी । यह तब था जब केंद्र सरकार और यूपी राज्य सरकार दोनों भाजपा की थीं। मैंने याचिकाओं को यह कहते हुए स्वीकार किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के मद्देनजर मुस्लिमों को अपनी जमीन पर मस्जिद बनाने का अधिकार था।

जब मैं मद्रास उच्च न्यायालय (2004-2005) का मुख्य न्यायाधीश था तो तमिलनाडु के एक शहर के कुछ मुसलमानों ( तमिलनाडु में केवल 5% आबादी मुस्लिम है) की एक याचिका आई। इसमें शिकायत की गई कि एक सार्वजनिक सड़क से होकर उन्हें अंतिम संस्कार जुलूस निकालने की अनुमति नहीं दी जा रही है। इस सड़क के बगल में एक मंदिर था। मैंने आदेश दिया कि यह सार्वजनिक सड़क है, निजी नहीं, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 25 के मद्देनजर मुस्‍लिमों को शवयात्रा में गजरने से नहीं रोका जा सकता और अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी उस अधिकार में हस्तक्षेप न करे (मेरा निर्णय मोहम्मद गनी बनाम सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ पुलिस देखें )।

जब मैं सुप्रीम कोर्ट का जज था, तब एक मामले में मैं एक बेंच का हिस्सा बना। यह 2008 में ओडिशा के कंधमाल जिले में कुछ अतिवादी हिंदू तत्वों द्वारा ईसाइयों पर किए गए हमलों के विषय में था। परिणामस्वरूप, ईसाइयों के 1400 घर और 80 गिरजाघर नष्ट या क्षतिग्रस्त हो गए थे और 18,000 से अधिक ईसाइयों को जंगल में भागना पड़ा था। मैंने ओडिशा के उपस्थित वकील से ओडिशा राज्य के मुख्यमंत्री को यह बताने के लिए कहा कि यदि उनकी सरकार अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं कर सकती है तो बेहतर है वह पद छोड़ दें। हम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार को बर्दाश्त नहीं करेंगे।हालांकि, यह केवल मेरा अपना दृष्टिकोण था। वह नहीं जो अदालत में मेरे सहयोगियों द्वारा हमेशा अपनाया गया हो।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं। यहां व्‍यक्‍त विचार उनके निजी हैं।)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 बाबरी मस्जिद केस: आखिर अदालती प्रक्रिया में कहां चूक हुई?
2 गांधी जयंती विशेष: देश में नशामुक्ति के लिए गांधी की बढ़ती प्रासंगिकता
3 ऐसा तो नहीं होगा गांधी का राम राज्य!
IPL 2020 LIVE
X