ताज़ा खबर
 

उपेक्षा…जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी

अब बात कोरोना के तीसरे संभावित फेज की। कहा जाता है कि यह बहुत ही खतरनाक फेज होगा। लेकिन, यदि समाज के सभी व्यक्तियों को इस खतरे का एहसास दिला दिया जाएगा तो संभव है कि जान-माल का नुकसान कम हो। ऐसा लगता है जैसे इतनी आलोचनाओं के बाद इस खतरे से निपटने के लिए सरकार पूरी तरह तैयार हो गई होगी।

गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे परिजन की जलती चिता को देखता हुआ शख्स। (फोटोः पीटीआई)

निशिकांत ठाकुर

इससे बड़ा दुर्भाग्य भला और क्या हो सकता है कि किसी शव के अंतिम संस्कार करने के लिए श्मशान में न लकड़ी उपलब्ध है और न ही उसे दफनाने के लिए जमीन। अंत में शव को गंगा या करीब की किसी भी नदी में या तो प्रवाहित कर दिया जाता है या फिर नदी के किनारे मिट्टी के नीचे पार्थिव देह को दबा दिया जाता है। शवों के साथ ऐसी दुर्गति शायद पहले कभी हुई नहीं होगी, हमने तो कभी ऐसा देखा नहीं। बड़े-बड़े युद्ध लड़े गए, यहां तक कि महाभारत का भी युद्ध इसी भारतभूमि में हुआ, लेकिन किसी भी पार्थिव शरीर के साथ ऐसे ‘व्यवहार’ का कहीं कोई उदाहरण नहीं मिलता। किसी शव का इतना घिनौना अपमान कभी नहीं हुआ होगा। दुश्मन ने भी कभी ऐसा करने के बारे में शायद सोचा नहीं होगा।

भारत-चीन युद्ध में सैकड़ों सैनिक शहीद हुए, भारत-पाकिस्तान के बंटवारे और युद्ध में भी यही हुआ, लेकिन आज तक कभी भी ऐसा लोमहर्षक दृश्य नजर से नहीं गुजरा जहां इंसान के शव को चील-कौए-कुत्ते और अन्य जीव नोंच-खसोट रहे हों। लेकिन, आज चाहे मोक्षदायिनी गंगा हो या कोई अन्य नदी…ऐसा हृदयविदारक दृश्य बड़ी आसानी से आप देख सकते हैं। हर किसी का मन-आत्मा सरकारी बदइंतजामी पर क्षोभ से कराह उठेगा। आपका दिलो-दिमाग सरकारी तंत्र की अदूरदर्शिता और निकम्मेपन को लेकर क्रोध से भर उठेगा। मुट्ठियां आवेश से भिंच जाएंगी, लेकिन अफसोस…आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे, महज मन मसोसकर रह जाने के।

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी की चपेट में आकर जान गंवाने वालों के पास उसके परिजन मौजूद नहीं होते हैं। किसी वजह से अगर मौजूद होते भी हैं तो उन्हें अंतिम-संस्कार में शामिल होने की अनुमति प्राय: नहीं होती अथवा डर से संस्कार स्थल पर नहीं जाते या परिजन किसी को जाने नहीं देते इसलिए कि साथ जाने वाला भी इस महामारी की चपेट में न आ जाए । लिहाजा, स्वास्थ्यकर्मी और एंबुलेंस वाले जहां-तहां शव को फेंककर अपने दायित्व की इतिश्री कर लेते हैं।

पता नहीं, इस हमारे देश को किन दुष्टात्माओं की नजर लग गई है। आज जिस ओर देखेंगे, हर जगह किसी-न-किसी प्रकार की कमी ही दिखाई देगी, लेकिन अगर इस पर आप कुछ करने के लिए सोचेंगे तो उल्टा माहौल बनाकर आपको ही मुजरिम करार दिया जाएगा। 1974-75 में ऐसा ही तो हुआ था, लेकिन उस समय स्वतंत्रता-सेनानी लोक नायक जयप्रकाश नारायण जीवित थे, जिन्होंने अंग्रजों के जुल्म-ओ-सितम को भी झेला था। उन्होंने जननायक की भूमिका का निर्वाह करते हुए क्रांति का बिगुल फूंक कर समाज को जगाया और उस काल की तत्कालीन सरकार का बैंड बजा दिया। देश उस बेलगाम सरकार को काबू करने में सफल रहा। लेकिन, वह दौर अलग था। उस समय हमारे साथ या पास लोक नायक जयप्रकाश नारायण जैसे जनता पर अपनी बातों का प्रभाव छोड़ने वाले महान जननायक थे।

आज हम नेता विहीन हैं। नेता के नाम पर स्वार्थी, धृष्ट, सत्तालोलुप खद्दरधारी ही दिखते हैं। जिनसे जनता की अगुआई करने की उम्मीद थी, उनके विरुद्ध घटिया मार्केटिंग करके उनकी छवि को निहायत मूर्ख और लल्लू बनाकर उन्हें जनता की नजर में गिराकर सबकुछ से बेगाना बना दिया। हमारे प्रधानमंत्री कई उदाहरणों के साथ बताते हैं कि जो सात दशक में नहीं हुआ, उनकी सरकार ने सात वर्षों में करके दिखला दिया। प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ में दिल का उद्गार बयां कर रहे थे। यह अलग बात है कि उनकी बातों को समझने के लिए देश के अर्थशास्त्रियों को भी अपने दिमाग के सारे तंतुओं को खोल देने पड़ते हैं, ज्ञान के सभी घोड़े दौड़ा देने पड़ते हैं, लेकिन फिर भी उनके हाथ कोई रिजल्ट नहीं आता है। देश ने तो प्रगति की है, लेकिन तब जब उसकी जड़ों को 70 वर्षों तक सींचा गया। क्या आज के हमारे तथाकथित राजनीतिज्ञ भारतीय इतिहास को नहीं पढ़ते की बटवारे के समय भारत का स्वरूप क्या था ? भारत की आर्थिक स्थिति क्या थी?

Coronavirus, Farmers, Labours, India कोरोना टीका केंद्र पर अपनी बारी का इंतजार करता हुआ युवक। (फोटोः पीटीआई)

अब आइए आज देश की वर्तमान स्थिति को देखते हैं। पिछले छह माह से किसान अपने ऊपर थोपे गए तीन तथाकथित काले कृषि कानूनों को खत्म कराने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। सरकार से लगभग एक दर्जन बार बातचीत हुई, लेकिन सुफल कुछ भी नहीं निकला। इसी असमंजस का सामना करते हुए लगभग 400 किसान अपनी इहलीला समाप्त कर संसार से विदा हो गए। इसका जरा सा भी असर किसान परिवार को छोड़कर सरकार पर पड़ा हो, ऐसा कभी भी दिखा नहीं। किसानों की मांग को सरकार को मानना यदि उपयुक्त नहीं है, तो फिर इन किसानों को समझाना भी सरकार का ही काम है, लेकिन उन्हें आतंकी, पाकिस्तानी, चाइनीज कहकर समाज में उनके प्रति गलत धारणा विकसित कर देना कहां तक उचित है!

यह तो देश के संविधान ने हमें अधिकार दिया है कि हम अपनी मांग मनवाने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन कर सकते हैं। किसान भी ऐसा ही कर रहे हैं। अब यह निर्णय करने का पूरा अधिकार सरकार को है कि वह उनकी मांग को मानती है या नहीं। लेकिन, यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। न तो किसी किसान को विश्वास में लिया गया, न किसी ऐसे संगठन से जो किसान हित के लिए काम करते रहते हैं, की मदद ली गई। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। सरकार जब चाहे, तभी यह धरना-प्रदर्शन समाप्त हो जाएगा, जबकि किसान इस बात के लिए कटिबद्ध हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, सरकार द्वारा बनाए गए उस तथाकथित काले कानूनों को रद्द कराकर ही घर लौटेंगे।

अब बात कोरोना के तीसरे संभावित फेज की। कहा जाता है कि यह बहुत ही खतरनाक फेज होगा। लेकिन, यदि समाज के सभी व्यक्तियों को इस खतरे का एहसास दिला दिया जाएगा तो संभव है कि जान-माल का नुकसान कम हो। ऐसा लगता है जैसे इतनी आलोचनाओं के बाद इस खतरे से निपटने के लिए सरकार पूरी तरह तैयार हो गई होगी। सरकार अगर जनता को इस तीसरे फेज में होने वाले नुकसान की जानकारी देगी और दो फेज के बाद भी लोगों को लापरवाही का एहसास नहीं हुआ, तो फिर उसके लिए कोई भी सरकार हो, कुछ भी नहीं कर सकती।

अमेरिका इस महामारी से अब मुक्त हो रहा है। वहां जिन्होंने कोरोनारोधी दोनों टीके लगवा लिए हैं, उनके लिए मास्क लगाना अब अनिवार्य नहीं रह गया है। हमारे देश से ही सहायता लेकर वह इस महामारी से निजात पा रहा है। लेकिन, इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि हमारे देश में ही अब तक सबसे कम लोगों को दोनों डोज लग पाई है। हमने अपने देश की जनता के लाभ का ध्यान न देकर, उसकी उपेक्षा करके दूसरों को उपकृत करने का प्रयास किया, टीकों को विश्व बाजार में बेचकर देश की तिजोरी भरने का प्रयास किया, यह कहीं से गलत नहीं है, लेकिन आज नदी में शवों को फेंककर, नदी किनारे रेत से दबाकर, मृतकों की संख्या आम जनता से छिपाकर मानवीय मूल्यों के साथ जो अपराध कर रहे हैं, ऐसी स्थिति तब नहीं आती, जब हम दूसरे देशों को उपकृत करने के लिए दवाओं और टीकों का दान या उसकी बिक्री कर रहे थे। इन सारी कमियों पर सरकार का ध्यान कौन आकर्षित करेगा?

अगर सामान्य व्यक्ति इन सारी बातों के लिए जनता को जागरूक होने का आह्वान करेगा तो संभव है उसे जेल के सीखचों में जीवन गुजरना पड़े। दबी जुबान में सभी आज हमारे देश के हालात पर आंसू बहाते हैं, लेकिन सामने आकर आवाज कोई नहीं उठाना चाहता। इसलिए, क्योंकि आज भारत में जनता के दुख-दर्द को सुनने वाला कोई ‘लोकनायक’ नहीं है जो ‘संपूर्ण क्रांति’ का बिगुल फूंक कर त्राहिमाम कर रही जनता को उनके कष्ट से निजात दिला सके।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और यहां उक्त विचार उनके निजी हैं।

Next Stories
1 World Environment Day 2021: कोरोना का पर्यावरण से क्या संबंध है? समझिये सबकुछ
2 कोरोना से लड़ाई में भारतीय संस्‍कृत‍ि कैसे बनी मददगार, समझ‍िए
3 UP में BJP की हार की भव‍िष्‍यवाणी करने वाले आधा ही सच देख रहे
ये पढ़ा क्या?
X