सात दशक के बाद घने जंगलों में बना एक स्वास्थ्य केंद्र

छत्तीसगढ़ के सुकमा और दंतेवाड़ा के घने जंगलों में नक्सली अपना शासन चलाते हैं। यहां के रास्ते दुर्गम हैं और मीलों-मील तक सड़कों का नामों-निशान नहीं है। यहां विकास और प्रशासन ज्यादातर हिस्सों से नदारद है। गांवों का यह हाल है कि सुकमा जिले के कई गांव तो सरकारी कागजों में हैं ही नहीं। जो हैं वह कहां हैं, यह भी जानना मुश्किल है। उनका पता लगाना टेढ़ी खीर है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं मधुरेंद्र सिन्हा।

minpa naxal aread health center
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में मिनपा गांव में बना यह स्वास्थ्य केंद्र

मधुरेंद्र सिन्हा

क्या आप सोच सकते हैं कि आजादी के 74 वर्षों के बाद भी देश के कई हिस्सों में स्वास्थ्य सेवाएं हैं ही नहीं। वहां लोग अस्पताल, डॉक्टर, नर्स कुछ भी नहीं जानते। वहां बैगा यानी झाड़-फूंक करने वाला ही उनका डॉक्टर है। सैकड़ों साल पुरानी परंपराएं हैं जिन पर उनका अगाध विश्वास है। मॉडर्न मेडिसिन सिस्टम से ये बेखबर हैं।

बात हो रही है छत्तीसगढ़ के सुकमा और दंतेवाड़ा की, जहां घने जंगलों में नक्सली अपना शासन चलाते हैं। यहां के रास्ते दुर्गम हैं और मीलों-मील तक सड़कों का नामों-निशान नहीं है। यहां विकास और प्रशासन ज्यादातर हिस्सों से नदारद है। गांवों का यह हाल है कि सुकमा जिले के कई गांव तो सरकारी कागजों में हैं ही नहीं। जो हैं वह कहां हैं, यह भी जानना मुश्किल है। उनका पता लगाना टेढ़ी खीर है।

सुकमा के दूरदराज के गांव में: लेकिन पिछले दिनों सुकमा के दूर-दराज के एक गांव मिनपा में जो हुआ वह किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। वहां स्थानीय आदिवासियों से मिलकर साम्य भूमि फाउंडेशन और यूनिसेफ ने एक उप स्वास्थ्य केंद्र बनाया है। कोंटा ब्लॉक के 150 गांवों में यह भी एक गांव है जहां कोई स्वास्थ्य केंद्र नहीं था लेकिन अब वह गर्व से कह सकते हैं कि वहां स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं।

यह झोपड़ी में बना केंद्र है क्योंकि इस इलाके में पक्का ढांचा खड़ा करना नक्सलियों को जरा भी पसंद नहीं है। हालत यह है कि उन्होंने स्कूलों के कई भवन उड़ा दिये हैं और सरकारी भवनों को भी क्षति पहुंचाई है। विकास उनके अस्तित्व के लिए खतरा है। वे यह मानते हैं कि अगर बच्चे पढ़-लिख जाएंगे तो उनके सामने नई चुनौती खड़ी हो जाएगी। इसलिए वह न केवल स्कूलों के पक्के ढांचे नहीं बनने देते बल्कि मौका मिलने पर 10-12 साल के बच्चों को घरों से उठाकर ले जाते हैं और उन्हें बंदूक चलाना सिखाते हैं। कई गांवों में तो आदिवासियों ने अपने चार-पांच साल के बच्चों को दूर के रिश्तेदारों के पास भेज देते हैं। अस्पतालों की अनुमति नक्सली इसलिए नहीं देते क्योंकि उससे वे बाहर के लोगों से घुलने-मिलने लग जाएंगे। यह उनके लिए खतरा है।

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मिनपा गांव कहने को तो सुकमा से लगभग 90 किलोमीटर दूर है लेकिन वहां पहुंचने में तीन घंटे से भी ज्यादा का समय लगता है। थोड़ी दूर तक सड़क ठीक है लेकिन बाद में वह टूटी हुई है। रास्ते में सीआरपीएफ के दर्जन भर कैंप हैं जहां चाक-चौबंद जवान अपने ऑटोमैटिक हथियारों के साथ खड़े मिलेंगे। जैसे-जैसे गांव के निकट पहुंचेंगे तो देखेंगे कि ज्यादातर पुलिया बारूद से उड़ा दी गई है। छुपकर किए गए उनके हमलों में सैकड़ों जवान और बेगुनाह लोग मारे जा चुके हैं।

ध्यान रहे कि इसी सुकमा के पास झीरम घाटी में घात लगाकर किये हमले में पूर्व केंद्रिय मंत्री विद्याचरण शुक्ला सहित 28 लोगों की मौत हो गई। इनमें महेंद्र करमा भी थे जो सलवा जुडुम के संस्थापक भी थे। उन्हें भी नक्सलियों ने बेरहमी से मार डाला था। इस हमले के अलावा भी घात लगाकर कई हमले हुए जिनमें पुलिसकर्मियों के अलावा बेगुनाह लोग भी मारे गये। यहां के घने जंगलों और पहाड़ियों में छुपना आसान है।

जब पुलिस की कार्रवाई होती है तो ये नक्सली लुंगी-गंजी पहनकर ग्रामीण बन जाते हैं। कई बार ये मारे जाते हैं तो इन्हें बेगुनाह ग्रामीण बता दिया जाता है। फिर मानवाधिकार का मामला खड़ा हो जाता है। साम्य भूमि फाउंडेशन के आदर्श कुमार कहते हैं कि यहां काम करने का अपना ही आनंद है हालांकि यह इलाका खतरनाक है। यहां काम करना एक जुनून जैसा है और इस बात का सबूत वह खुद हैं। वह एक मेकेनिकल इंजीनियर हैं और पुणे में नौकरी करते थे जिसे छोड़कर वह इन जंगलों में अब आदिवासियों के साथ काम करते हैं। सिर्फ वह ही नहीं बल्कि वहां काम करने वाली एएनएम और उनकी सहायक भी इस काम में हाथ बंटा रही हैं।

राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी: ऐसा इसलिए है कि यहां राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है। सीआरपीएफ के पुराने ऑफिसर कहते हैं कि राज्य सरकारें दिल से चाहें तो इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। लेकिन कोई इस चुनौती को स्वीकार नहीं करना चाहता है। कोई नेता इस पचड़े में पड़ना चाहता है। महेंद्र करमा की नृशंस हत्या के बाद तो ज्यादातर नेता चाहे वे किसी भी पार्टी के हों, कन्नी कटाते फिरते हैं।

राज्य सरकारें वोट की राजनीति करती हैं सो वे इस तरह का कोई काम करना नहीं चाहतीं जिससे लोगों में कोई आक्रोश पैदा हो या लॉ एंड ऑर्डर की समस्या खड़ी हो। इसलिए वे केंद्र सरकार द्वारा चलाए जाने वाले किसी भी इस तरह के अभियान में भाग नहीं लेती हैं। वे तटस्थ रहते हैं। नक्सलियों के इस आतंक के कारण वहां पर विकास के कार्य ठप हो गये हैं। स्कूल-अस्पताल बनाना सरकार के लिए बेहद कठिन हो गया है। सरकार के पास पर्याप्त फंड है लेकिन उन इलाकों में पहुंचना खतरे से खाली नहीं है। रास्ते दुर्गम हैं।

दंतेवाड़ा का उदहारण: लेकिन जहां संभव हुआ वहां स्थानीय प्रशासन ने प्रयास किया है। इसका बढ़िया उदाहरण है दंतेवाड़ा। इस जिले के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से पर नक्सलियों का आतंक है। लेकिन शेष इलाकों में अब विकास के कई कार्य हो रहे हैं। जिला कलेक्टर दीपक सोनी बताते हैं कि इधर कुछ वर्षों से जिले में विकास कार्यों में तेजी आई है। शिक्षा और स्वास्थ्य के कई कार्य हुए हैं।

ग्रामीण अब सरकारी सामानों को लेने से हिचकिचाते नहीं हैं। आदिवासियों और अन्य ग्रामीणों के लिए पौष्टिक आहार कार्यक्रम भी चलाया गया है। इन्हें अपने बच्चों के खाने में ज्यादा से ज्यादा प्रोटीन देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यह प्रोटीन उन्हें दवाओं के जरिये नहीं दालों के जरिये मिलता है और ये दालें यहां की उपज हैं। यह एक अच्छी पहल है और इसे यूनिसेफ का सहारा भी मिला हुआ है।

ग्रामीणों को प्रोत्साहित करने के लिए कठपुतली नृत्य-गीत के जरिये कार्यक्रम किये जाते हैं। विलासपुर का एक एनजीओ कठपुतली एवं नाट्य कला मंच बिना सरकारी मदद के खुद यहां लोगों को कठपुतली नृत्य और स्थानीय भाषा के गीतों के जरिये संतुलित आहार की शिक्षा देता है। यह पहल बहुत ही सफल रही है। इस तरह के कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुड़ती है और मधुर संगीत के कारण लोग स्वास्थ्य संबंधी निर्देश समझ जाते हैं। पिछले तीन वर्षों में प्राइमरी हेल्थ सेंटरों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसका नतीजा है कि कुपोषण में 35 प्रतिशत की कमी देखी गई है।

कोविड टीकाकरण अभियान सफल: सबसे बड़ी बात यह है कि दंतेवाड़ा और सुकमा में कोविड का टीकाकरण कार्यक्रम सफल रहा है। शुरू में प्रतिरोध हुआ और नक्सलियों ने भी धमकी दी। सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक के मेडिकल ऑफिसर डॉक्टर कपिल बताते हैं कि हमें पहले चरण में काफी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा लेकिन दूसरे चरण में नहीं। इसका मुख्य कारण यह रहा कि जब नक्सली बिना टीका लगाये कोविड से मरने लगे तो उन्हें समझ में आया कि यह कितना जरूरी है। फिर उन्होंने कोई प्रतिरोध नहीं किया और खुद भी नाम बदलकर टीका लेने आ गये।

इसकी सफलता का बड़ा उदाहरण इस बात से मिलता है कि शहर से कटे हुए मिनपा गांव के लगभग 2700 लोगों में कमोबेश सभी को टीका लग चुका है। लेकिन इसके लिये साम्य भूमि फाउंडेशन और यूनिसेफ ने भी बड़ी भूमिका निभाई। स्वास्थ्यकर्मी आइस बॉक्सों में टीकों को लेकर पैदल मीलों चले और उन्होंने टीके लगाये। उन दुर्गम इलाकों में यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

झोपड़ी में बने मिनपा गांव के उप स्वास्थ्य केंद्र में एएनएम

झोपड़ी में बना मिनपा गांव का यह उप स्वास्थ्य केंद्र इस मायने में अद्भुत है कि इसने उस दुर्गम इलाके में जहां जिंदगी और मौत के बीच का फासला बहुत कम है, एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह आदिवासियों, स्वैच्छिक संगठन, चुनिंदा स्वास्थ्य कर्मियों और यूनिसेफ की पहल से बन पाया है और आगे के लिए रास्ते खोलता है। भविष्य में इस मॉडल पर कई और ऐसे केंद्र बन सकते हैं।

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