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बेबाक बोल : सत्ता के सबक

सत्ता के सबक को किसी का लिहाज नहीं। इस वर्ष ने वक्त की दहलीज से बाहर कदम रखने से पहले भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना सबक जारी कर दिया है..

Author नई दिल्ली | January 1, 2016 11:57 PM
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (पीटीआई फाइल फोटो)

सत्ता के सबक को किसी का लिहाज नहीं। इस वर्ष ने वक्त की दहलीज से बाहर कदम रखने से पहले भारी बहुमत से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना सबक जारी कर दिया है। इसे सीखना या न सीखना अब दल और नेता दोनों पर निर्भर है। कांग्रेस के दो कार्यकाल से दुखी देश के अवाम ने पिछले साल मोदी को सत्ता की कुंजी सौंपी तो ऐसे आंकड़ों के साथ कि उनके पास बाद में शिकायत का मौका ही न रहे कि पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। मगर लोकसभा में संख्याबल को लेकर खुश भाजपा या मोदी अपने मन से कुछ नया करने के लिए इसलिए पूरी तरह आजाद नहीं हैं कि राज्यसभा में आज भी इसी संख्याबल की लाचारी बनी हुई है। यह दीगर है कि भाजपा के रणनीतिकार अभी भी बचाव का कोई रास्ता खोज लें और नहीं तो राज्यसभा में इसी लाचारी को अपने लिए बहाना बना लें कि हमसे कुछ ठोस अपेक्षा रखते हैं तो हमें राज्यसभा में भी सक्षम बनाएं।

इसके बावजूद, भाजपा या मोदी चाहें या न चाहें, मुद्दा यह बन चुका है कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी सत्ता परिवर्तन से कितनी आसान हुई है, सरकार ने जनता की उम्मीदों के लिए क्या किया है। दरअसल, इस सवाल के मोर्चे पर मोदी सरकार अगर पूरी तरह विफल नहीं है तो किसी तरह से उसे सफलता के पास भी नहीं कहा जा सकता है। डेढ़-पौने दो साल में पास-फेल की कसौटी पर परखना थोड़ी हड़बड़ी जैसी लगती है, लेकिन जितनी उम्मीदें बंधा दी गई थीं, उसके मद्देनजर गलत भी नहीं।

जाहिर है कि इसका खमियाजा भाजपा को ही भुगतना था। लिहाजा देश की जनता ने 2015 का अपना सबक दो किस्तों में जारी किया। पहला दिल्ली में पार्टी को लगभग नेस्तानबूद कर अरविंद केजरीवाल के हाथ में कमान दे दी। यहां गनीमत यह थी कि देश के दिल ने अगर नई-नई गले लगाई भाजपा को दरकिनार किया तो पहले से ठुकराई कांग्रेस को भी हाशिए से बाहर धकेल दिया। दिल्ली में कांग्रेस की प्रलयंकारी हार ने पहले ही पिछले चुनावों में बुरी तरह से पिटी-पिटाई पार्टी के होश उड़ा दिए। भाजपा के लिए यहां सिर्फ यही राहत की बात थी कि केजरीवाल एक कोने पर भले ही कब्जा कर लें, लेकिन पूरे देश के पटल पर एक तरह से उनकी नामंजूरी पहले ही हो चुकी है। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का आंकड़ा सिर्फ पंजाब के चार सांसदों पर ही सिमट गया था, जबकि बाकी देश भर में यह शून्य था। यहां तक कि पार्टी का गढ़ माने जाने वाली दिल्ली में भी इसका कोई नामलेवा नहीं था। दिल्ली की सभी सात सीटों पर भाजपा ने एकमुश्त जीत दर्ज की थी।

दिल्ली में बुरी तरह हारने के बाद मोदी और उनकी पार्टी को देश की जनता ने कुछ वक्त दिया। जाहिर है, यह उन सवालों से टकराने और निपटने के लिए मिला हुआ वक्त था, जिसने दिल्ली में भाजपा की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। लेकिन न पार्टी से कुछ हुआ, न सरकार से। कीमतें कभी आसमान छूती रहीं या कभी उससे थोड़ी ही नीचे रहीं। घर या प्रॉपर्टी कहने को सस्ते तो हुए, लेकिन सिर्फ दिखने और प्रचार के लिए। असल में हुआ यह था कि इन परिसंपत्तियों की खरीद-फरोख्त ही रुक गई थी। कम में बेचना नहीं और ज्यादा में मिले तो खरीदना नहीं। राज्यों के कलक्टर रेट पहले की तरह रहे। पेट्रोल की कीमतों में कमी की घोषणाएं हुर्इं, लागू भी हुर्इं, लेकिन इसका कोई श्रेय कांग्रेस ने भाजपा को लेने नहीं दिया। इसके उलट वरिष्ठ कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने तय किया कि वे पेट्रोल या डीजल में की जाने वाली हर बार की कमी की हकीकत लोगों को बताएंगे। मसलन, जब अंतरराष्टÑीय बाजार में कीमत चार रुपए कम हुई तो सरकार ने उपभोक्ताओं तक उसका आधे से भी कम लाभ पहुंचाया। कारों की कीमतों में प्रस्तावित बढ़ोतरी की धमकी रोज जारी हो रही है।

लेकिन देश में चल रही इस उठापटक से बेखबर मोदी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि निखारने में लगे रहे। बल्कि कहा जा सकता है कि विदेश के मोर्चे पर यह ऐसा इलाका रहा है, जिसमें उन्होंने शानदार कामयाबी हासिल की। लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में मिली ऐसी कामयाबी का क्या हासिल, जब अपने घर में हालत लगातार खराब होती जा रही हो!

शायद यही वजहें रहीं कि दिल्ली की दहकती हार भी पार्टी को सबक सिखाने में पूरी तरह नाकाम रही। हालांकि इस हार का पूर्वाभास भाजपा को हो गया था और इसी वजह से ऐन मौके पर प्रचार-पटल से मोदी को पीछे हटा कर किरण बेदी को आगे कर दिया गया। जाहिर है, हार का ठीकरा मोदी के सिर पर फूटने से बचाने की यह कवायद थी। इसके बावजूद भाजपा ने आगे क्या कर लिया! दिल्ली के नतीजों के बाद बिहार के चुनावों के बीच केंद्र सरकार के स्तर पर भाजपा के पास वक्त था, जिसमें वह बिहार की जनता के भीतर एक आश्वासन पैदा कर पाती। लेकिन भाजपा को यह जरूरी नहीं लगा, और अपने अति-आत्मविश्वास के कारण उसे औंधे मुंह गिरना पड़ा।

जबकि बिहार में भाजपा ने चुनाव पूरी तरह एकमात्र मोदी के नाम और उनकी छवि पर ही लड़ा। यह किसी से छिपा नहीं रहा कि विदेशों में अपने दौरों और देश में अपने ‘मन की बात’ के भरोसे मोदी ने बिहार चुनाव में ही पूरी ताकत झोंक दी। इसी भरोसे पर बनाई गई हवा के बूते बिहार में जीत की उम्मीद का उन्माद ऐसा था कि तमाम सरकारी मशीनरी और खुफिया स्रोतों से आई जानकारी के बावजूद पार्टी ने अपने हिस्से आई बुरी हार को सामने होने पर भी अनदेखी करने की कोशिश की और जीत के जश्न के लड्डू तक मंगा डाले, ढोल-नगाड़े और रंग-गुलाल के साथ उत्साह थोड़ा खिला भी, लेकिन कुछ ही देर में नतीजों की तस्वीर साफ होते ही बिखर भी गया। बिहार में जो हुआ वह भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।

लोकसभा में अप्रतिम जीत और उसके बाद हरियाणा में आजादी से लेकर अब तक पहली भाजपा सरकार, जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व प्रदर्शन और सत्ता में भागीदारी, फिर महाराष्ट्र में अपनी सरकार के बाद भाजपा का आत्मविश्वास का प्याला जो लबालब भरा दिख रहा था, आत्मविश्वास की अति में ऐसा छलका कि बाहर निकल कर बिहार में भाजपा की हार की शक्ल में गिरा। पार्टी के महान माने जाने वाले रणनीतिकार और अध्यक्ष अमित शाह अपनी राजनीतिक चाल से कोई कमाल न कर सके। पार्टी गैरों के निशाने पर तो पहले ही थी, अब अपनों के भी निशाने पर भी आ गई।

बिहार के बाद दो बड़ी बातें हुर्इं जो अपने आप में ही मोदी और शाह की जोड़ी के लिए एक सबक है। एक तो बिहार ने निष्प्राण कांग्रेस में फिर से जान फूंक दी। दूसरे, इसके कुछ समय बाद अब पार्टी के अंदर पार्टी पर काबिज समूह के खिलाफ जो घुटन और गुस्सा था, वह फूट पड़ा। यह धीरे-धीरे पल तो पहले से रहा था। लेकिन इस घुटन और गुस्से को आवाज दी पार्टी सांसद कीर्ति आजाद ने। आजाद की राजनीति नायाब थी। उन्हें शायद मालूम था कि सीधे वार से कोई लाभ नहीं होगा और न ही वह उतना दमदार होगा। लिहाजा, उन्होंने अपना निशाना मोदी के सबसे वफादार माने जाने वाले सिपहसालार और वित्त मंत्री अरुण जेटली पर साधा।

पहले अरविंद केजरीवाल के हमलों को झेल रहे जेटली पर कीर्ति आजाद ने आरोपों की जो झड़ी लगाई, उसकी विश्वसनीयता तो अभी जांच-परख के दायरे में है। लेकिन उसके कारण पार्टी की उस छवि पर गहरी चोट जरूर लगी, जिसे एकजुट रहने के लिए ही जाना जाता रहा है। और इसी बिनाह पर भाजपा खुद को ‘सबसे अलग पार्टी’ कहती रही है।

दरअसल, पार्टी के अलंबरदार शायद यह मान कर चल रहे हैं कि पहले के तमाम मामलों की तरह अरुण जेटली से संबंधित विवाद भी वैसे ही अपनी मौत मर जाएगा, जैसे अतीत में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और मुख्यमंत्रियों वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान पर लगे आरोपों के मामलों में हुआ। लेकिन भाजपा के लिए यह मानना एक बड़ी भूल ही होगी कि इस तरह मामलों को दबा देने या टाल देने से उपजे हालात का असर पार्टी के चुनावी भविष्य पर नहीं पड़ता। ये सारे मामले दरअसल लोगों की याददाश्त में गहरे पैबस्त रहते हैं और चुनावी बयार के बहते ही ये फिर से हरे हो जाते हैं। अगर ऐसा कभी न भी हो पा रहा हो तो इन मामलों को याद दिलाने के लिए सजग विपक्षी दल तो है ही। और यह भी नहीं भूलना होगा कि बाकी बचे साढ़े तीन वर्ष में यह परीक्षा कई राज्यों में देनी है और अगर अभी से नहीं चेते तो उसके नतीजे भी भुगतने होंगे।
पंजाब, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और असम को सिर्फ दूर से देख कर रणनीति बनाना खतरनाक होगा।

कहना न होगा कि पंजाब में गठजोड़ के बावजूद अकाली दल-भाजपा फिलहाल गहरे संकट के दौर से गुजर रहे हैं और वहां आम आदमी पार्टी का राज्य के क्षितिज पर अप्रत्याशित उदय हो रहा है। कांग्रेस ने पहले ही अपना दांव पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर लगा दिया है। कैप्टन ने ही अमृतसर में जेटली को करारी शिकस्त दी थी। पश्चिम बंगाल में दीदी का दुर्ग भेदना तो मुश्किल है ही। वहां ममता बनर्जी निजी स्तर पर एक स्वच्छ छवि के साथ वामपंथी दलों के मोर्चे के बरक्स मैदान में उतरेंगी, सो वहां भाजपा के लिए बहुत कुछ शायद न हो। फिर बिहार के बाद अगर उत्तर प्रदेश में भी क्षेत्रीय क्षत्रपों ने हाथ मिला लिए और कांग्रेस ने राजनीतिक अखाड़े में अपना प्रदर्शन बेहतर करना जारी रखा, फिर तो बस राजनीति में राम नाम का सहारा लेने का आसरा राम पर ही शायद टिके।

शायद इसलिए पार्टी ने एक बार फिर वक्त रहते राम मंदिर का मुद्दा उछाल दिया है। यह तो तय दिखाई दे रहा है कि आने वाले साल में राम मंदिर का मुद्दा पार्टी के फोकस में रहने वाला है। चुनावी मैदान में काफी कुछ खोने के बावजूद अमित शाह को दूसरा कार्यकाल मिलने में कोई रोड़ा दिखाई नहीं दे रहा। केरल और पश्चिम बंगाल के पार्टी अध्यक्षों के चयन से भी साफ है कि पार्टी का विश्वास अभी हिंदूवादी नेताओं पर कायम है। राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ का सरकार और पार्टी की नीतियों और कार्यक्रम पर प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता ही दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ‘मंदिर वहीं बनाएंगे, लेकिन तारीख नहीं बताएंगे’ का जुमला उछाल कर मुद्दे को आगे बढ़ाना भाजपा की मजबूरी बना दिया है।

लेकिन आज के राजनीतिक परिदृश्य में इस मुद्दे के जोखिम अपने साथ हैं, जो पार्टी को झेलने होंगे। बिहार में सरसंघचालक मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए महज एक बयान ने ही पूरे चुनाव का पासा पलट दिया, क्योंकि उससे पहले दादरी कांड के कारण विपक्ष ने धार्मिक ध्रुवीकरण तो कर ही दिया था।

दरअसल, राज्यों की राजनीति की खास बात यही है कि भाजपा चाहे जितना हिंदुत्ववादी ध्रुवीकरण कर ले, उसके भागीदार जरूर बनेंगे, लेकिन उनके खिलाफ अगर दूसरे पक्ष को धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण का मौका हाथ लगा तो ऐसे में भाजपा की हार तय है। हिंदू समाज की बुनावट और बनावट में बड़ी पहचान के ध्रुवीकरण की राजनीति के बरक्स छोटी पहचानों की राजनीति एक कारगर काट है। ऐसे में पार्टी अपने ध्रुवीकरण को वोटों में कैसे भुनाती है, वह देखने की बात होगी।

संसद में देश की प्रगति और विकास पर केंद्रित एजंडे को आगे ले जाने में भाजपा की नाकामी भी उसके लिए कठिन समय खड़ा करेगी। ऐसे में देखना यह है कि पार्टी 2015 के अनुभवों से सबक सीखते हुए अपने को कैसे आगे ले जा रही है। उसके लिए रास्ता मुश्किल तो है ही।

दादरी से लेकर बाबरी तक:

दिल्ली से कुछ ही किलोमीटर दूर दादरी में मोहम्मद अखलाक को भीड़ ने इस अफवाह पर पीट-पीटकर मार डाला था कि उसने एक गाय को मारा है और उसके परिवार ने गोमांस खाया है। भीड़ का दावा था कि उसके फ्रिज में गोमांस पड़ा हुआ है। इस मुद्दे ने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक असहिष्णुता का मुद्दा छेड़ दिया। देश में आग की तरह फैले इस मुद्दे पर मुखर प्रधानमंत्री को मौन तोड़ने में एक पखवाड़ा लग गया और जब उन्होंने इस पर बोला भी तो भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने मोदी को याद दिलाया कि आपका सम्मान और आपकी पहचान तो गोधरा और गुजरात के कारण है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर केंद्र को घेरा तो भाजपा ने भी इसके जरिए अपने उग्र हिंदुत्व के एजंडे को आगे बढ़ाया था।

महाराष्ट्र, हरियाणा और राजस्थान में बीफ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। दिल्ली के केरला हाउस में बीफ परोसे जाने के मसले पर भी खूब हंगामा हुआ और साल के अंत तक गाय पर चर्चा सरगर्म रही। अब तक हिंदुत्व एजंडे का प्रतीक माने जाने वाले बाबरी की जगह दादरी ने ले ली और इसके साथ ही पूरे देश में असहिष्णुता की बात छिड़ी। पूरे देश में लेखकों की पुरस्कार वापसी की मुहिम शुरू हुई जिसमें इतिहासकार से लेकर वैज्ञानिक तक शामिल हुए। सरकार ने इसका पलटवार किया और केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पुरस्कार वापसी मुहिम को गढ़ी हुई क्रांति करार दिया। हिंदुत्व के एजंडे के तहत सत्ता पक्ष ने लव जेहाद और धर्मांतरण का हल्ला मचा जो ‘घर वापसी’ की मुहिम छेड़ी थी विपक्ष ने ‘पुरस्कार वापसी’ की मुहिम से उसे कुंद कर दिया। लेकिन साल के अंत में आकर संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर भाजपा के नेताओं ने भी राम मंदिर का राग अलाप कर अपना हिंदुत्व का एजंडा सेट कर दिया है, और नए साल में इसी पर सियासी घमासान की उम्मीद है।

गीता की महानता के गीत: मोदी के कार्यकाल में हिंदू धार्मिक ग्रंथ गीता की अहमियत के भी खूब गीत गाए गए। भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने इस धार्मिक ग्रंथ को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा देने की कोशिश की। मोदी की विदेश यात्राओं में भी इस ग्रंथ का बोलबाला रहा और प्रधानमंत्री ने अपने विदेशी समकक्षों को इसे भेंट किया। हरियाणा के एक मंत्री ने सलाह दी कि इसे ‘राष्ट्रीय ग्रंथ’ घोषित कर देना चाहिए। और हां, इस साल एक प्यारी लड़की गीता भी चर्चा में रही जो बोलने-सुनने में अक्षम थी और कुछ सालों पहले भारत की सीमा पार कर पाकिस्तान पहुंच गई थी। गी

ता को पाकिस्तान के ईधी फाउंडेशन ने संरक्षण दिया था। सलमान खान की फिल्म बजरंगी भाईजान हिट होते ही फिल्म की चरित्र मुन्नी से मिलती गीता की कहानी सोशल मीडिया पर ऐसी छाई कि भारत सरकार को गीता की वापसी के पूरे प्रयास करने पड़े। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस मामले में खासी दिलचस्पी दिखाई और गीता की घर वापसी हुई। लेकिन दुखद यह है कि भारत में अभी तक गीता के परिवार की पहचान नहीं हो पाई है और वह इंदौर में एक एनजीओ के संरक्षण में है।

बोलों पर होता रहा बवाल: पिछले लोकसभा चुनाव में आम जनता जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुई थी वह था प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का मुखर व्यक्तित्व। अपने खास अंदाज में मोदी ने चुनावी सभा में तो लोगों का दिल जीत लिया लेकिन भाजपा की अगुआई में एनडीए की सरकार बनते ही मोदी के मातहतों ने अपने बोलों से सरकार की खूब किरकिरी करवाई। योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची, निरंजन ज्योति, गिरिराज सिंह से लेकर कैलाश विजयवर्गीय उग्र हिंदुत्व की भाषा बोलते रहे और अपने विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की सलाह देते रहे।

आरक्षण पर दिए अपने बयान के कारण भागवत निशाने पर रहे तो नीतीश के डीएनए में खोट बता कर मोदी ने भी अपने लिए मुसीबत मोल ली। हालांकि मोदी पर पलटवार करने में विपक्ष भी अपना आपा खोता रहा और लालू प्रसाद ने अमित शाह को जहां नरभक्षी तक कह डाला वहीं अपने प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर छापेमारी के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को मनोरोगी और कायर तक कह दिया।

अमेरिका से लेकर पाक तक का याराना: नरेंद्र मोदी ने साल 15 की शुरुआत ‘ब्रोमांस’ जैसे जुमले से की और बराक ओबामा के साथ उनकी गलबहियां और चाय पर चर्चा दुनिया भर के अखबारों की सुर्खियां बनीं। मोदी के विदेश दौरे और विदेशी जमीन पर मोदी-मोदी के नारे लगाती भीड़ तो खूब चर्चा में रही लेकिन मोदी की विदेश नीति का जमीन पर कुछ भी ठोस हासिल नहीं दिखा, उलटे भारत को अमेरिका की ओर से सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया गया। लेकिन विभिन्न मंचों पर भारत और अमेरिका दोस्ती दिखाने की कोशिश में रहे। साल भर पाकिस्तान से तनातनी का रिश्ता रहा और अगस्त में भारत-पाक सचिव स्तर की वार्ता जिस तरह से रद्द हुई उससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। लेकिन साल के अंत में अफगानिस्तान से लौटते हुए मोदी ने लाहौर में जो सरप्राइज लैंडिंग की वह दोनों देशों के साथ पूरी दुनिया को एक सुखद संदेश दे गया और भारत-पाक दोस्ती में अमेरिका भी दीवाना हुआ।

जुमले पर जुमला

खाते में कभी नहीं जाते 15 लाख: ’नरेंद्र मोदी के काला धन वापस लाने के बाद हर परिवार के खाते में 15-15 लाख रुपए जमा करने की बात बस एक जुमला है। ये चुनावी भाषण में वजन डालने के लिए बोली गई बात है क्योंकि किसी के खाते में 15 लाख रुपए कभी नहीं जाते, ये बात जनता को भी मालूम है।

’अगर बिहार में गलती से भाजपा हार जाती है तो जेल में बंद शहाबुद्दीन खुश होगा, पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे।… अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष

नीतीश के डीएनए में खोट: एक समय नीतीश ने न्योता देकर भोज रद्द कर दिया, इसके बाद 17 सालों का भाजपा-जद (यू) गठबंधन तोड़ दिया। उस समय मुझे दुख हुआ था, लेकिन जब उन्होंने जीतन राम मांझी जैसे महादलित के साथ भी ऐसा किया, तब मैंने सोचा की उनके राजनीतिक डीएनए में ही कुछ गड़बड़ है।... नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

लेखकों का गढ़ा हुआ विरोध: दादरी में अल्पसंख्यक समुदाय के एक सदस्य की पीट-पीटकर की गई हत्या बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। सही सोच रखने वाला कोई भी इंसान न तो इस घटना को सही ठहरा सकता है और न ही इसे कम करके आंक सकता है। ऐसी घटनाएं देश की छवि खराब करती हैं। इसके बाद दर्जनों लेखकों ने अपने साहित्य अकादेमी अवार्ड लौटा दिए हैं। यह सचमुच का विरोध है या गढ़ा हुआ विरोध है? क्या यह वैचारिक असहनशीलता का मामला नहीं है?… अरुण जेटली, केंद्रीय वित्त मंत्री

कर देंगे चढ़ाई: अत्याचार हुए तो एक लाख लोगों को लेकर चढ़ाई कर देंगे। पहले भी मुंहतोड़ जवाब दे चुके हैं और अब भी देंगे।... संगीत सोम, भाजपा विधायक

अखंड भारत का अलाप: भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक दिन फिर से एक होंगे और अखंड भारत का निर्माण करेंगे। अखंड भारत का निर्माण बिना किसी जंग के आपसी रजामंदी से मुमकिन है।… राम माधव, भाजपा नेता

मंदिर का संकल्प: भगवान राम भारत के कण-कण में बस गए हैं। राम मंदिर निर्माण का संकल्प पूरा होकर रहेगा। इसके लिए एक भव्य लक्ष्य मेरे सामने है। हमें एक भव्य मंदिर बनाना है।… मोहन भागवत, संघ प्रमुख

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