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भ्रामक तथ्य नहीं कर सकते ‘बापू’ का कद छोटा

कई सारी ऐसी झूठ फैलाई जाती हैं जिससे गांधी को विलेन साबित किया जा सके। सोशल मीडिया के जमाने में लोग वॉट्सएप और फेसबुक पर आए मैसेजों को सच मानकर अपनी राय कायम कर लेते हैं।

साबरमती आश्रम में लगी महात्मा गांधी की मूर्ति पर पुष्प अर्पित करते बच्चे (एक्सप्रेस फोटो)

पिछले कुछ वर्षों से ऐसा लगता है जैसे देश में हिंदू-मुसलमानों के बीच के रिश्तों में नेताओं ने राजनीतिक आंधी चला दी हो। रोज सुबह से ही कोई भी पक्ष एक—दूसरे को नीचा दिखाने में पीछे हटता नजर नहीं आता है। यहां तक कि दोनों कौम के बीच ऐसा जहर भर दिया गया है कि आम आदमी की कौन कहे, खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक को नहीं बख्शा नहीं जा रहा है। ऐसे लोग वही होते हैं जो भले ही कम पढ़े—लिखे हैं, लेकिन हालातों ने उन्हें समाज की ऊंची कुर्सी पर बिठा दिया है। इसी आधार पर वह देश के राष्ट्रीय गौरव की गरिमा को तार—तार करने लगे हैं । 

वर्ष 1906-07 तक हिंदुओं में सांप्रदायिकता से राष्ट्रीयता को अधिक महत्व देने का गांधीवादी आदर्श प्रविष्ट नहीं हुआ था, उस समय  प्रत्येक व्यक्ति शुद्ध अर्थ में या तो हिंदू या मुसलमान था। सांप्रदायिक शब्द उस समय घृणा का पर्याय नहीं बना था। उस समय हिंदू या मुसलमान अपने प्रतिद्वंद्वी के प्रति सौजन्य, सहनशीलता और सहानभूतिपूर्वक विवेक का प्रयोग करते थे। ऐसा कहने का अभिप्राय यह है कि इस बीच हिंदू-मुस्लिम को धुर विरोधी मानने वाले कुछ लोग चाहते हैं कि दोनों अपने आप में ही लड़कर कट मरें। इसलिए कई बातों में से कुछ बातों को प्रमुखता से जनता के दिलोदिमाग में बिठा दिया जाए जिससे वह कभी उबर ही न सके।

समाज के मन—मस्तिष्क में पहली बात यह बैठाने का प्रयास जारी है कि महात्मा गांधी ने ही पं. जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने के लिए हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा कराया। यानी, इस बंटवारे के लिए पूरी तरह से बापू ही दोषी हैं। इस मुद्दे को सोशल मीडिया के जरिये इतनी बार इस योजनाबद्ध तरीके से बार—बार दिखाया और समझाया गया कि  लोग इसे सच मानने लगे हैं। इसलिए अब जिसके मुंह से सुनिए, वह इसमें अपना अधकचरे ज्ञान के दम पर कहते नजर आएंगे, ‘हां, कुछ तो गांधी जी से चूक हुई थी जिसके कारण देश का बंट गया।’ अब जब  इस झूठ की सच्चाई को जानने के प्रयास किया तो इतिहास से यह बात सामने आई कि गांधी जी ने देश को बंटवारे से बचाने के लिए कई प्रयास किए।

31 मार्च से 4 अप्रैल, 1947 के बीच गांधी ने माउंटबेटन से पांच बार बातचीत की। माउंटबेटन ने लिखा है, ‘गांधी ने मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि मिस्टर जिन्ना को सरकार गठित करने का पहला मौका दिया जाना चाहिए। मोहम्मद अली जिन्ना और जवाहरलाल नेहरू दोनों की शख़्सियत अंग्रेज़ीदां थी। दोनों ने लंदन से बैरिस्टर की ट्रेनिंग ली थी। दोनों अपने पालन-पोषण की वजह से अपनी मातृभाषा के मुक़ाबले ब्रिटिश लहजे में अंग्रेज़ी बोलने में ज़्यादा सहज थे।’ 

तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने भी पिछले दिनों दावा किया था कि महात्मा गांधी चाहते थे कि मोहम्मद अली जिन्ना देश के शीर्ष पद पर बैठें, लेकिन पहला प्रधानमंत्री बनने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने ‘आत्मकेंद्रित रवैया’ अपना लिया था। पणजी से 40 किलोमीटर दूर गोवा प्रबंध संस्थान के एक कार्यक्रम को संबोधित करते दलाई लामा ने दावा किया कि अगर महात्मा गांधी की जिन्ना को पहला प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा को अमल में लाया गया होता, तो भारत का बंटवारा नहीं होता। सही निर्णय लेने संबंधी एक छात्र के सवाल पर जवाब देते हुए 83 वर्षीय दलाई लामा ने कहा, ‘मेरा मानना है कि सामंती व्यवस्था के बजाय प्रजातांत्रिक प्रणाली बहुत अच्छी होती है। सामंती व्यवस्था में कुछ लोगों के हाथों में निर्णय लेने की शक्ति होती है, जो बहुत खतरनाक होता है।’ उन्होंने कहा, ‘अब भारत की तरफ देखें। मुझे लगता है कि महात्मा गांधी जिन्ना को प्रधानमंत्री का पद देने के बेहद इच्छुक थे, लेकिन जिन्ना को पाकिस्तान चाहिए था, इसलिए देश का बंटवारा हुआ।

दूसरी बात सोशल मीडिया द्वारा यह प्रचारित कराया जा रहा है और दावा भी किया जाता है कि महात्मा गांधी ने भगत सिंह की फांसी की सजा को रोकने की कोई कोशिश नहीं की। जबकि, यह भी सच नहीं है। गांधी ने भगत सिंह की फांसी की तारीख के दिन तक उन्हें बचाने की हरसंभव कोशिश की थी। सोशल मीडिया पर महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के बारे में ऐसी कई बातें फैलाई जा रही हैं, जिनका सच्चाई से कोई लेना—देना नहीं है। भारत का दक्षिणपंथी समुदाय गांधी और नेहरू को विलेन साबित करने में लगा है।

इसी कड़ी में कई सारी ऐसी झूठ फैलाई जाती हैं जिससे गांधी को विलेन साबित किया जा सके। सोशल मीडिया के जमाने में लोग वॉट्सएप और फेसबुक पर आए मैसेजों को सच मानकर अपनी राय कायम कर लेते हैं। हम आपको गांधी के बारे में चलने वाले कुछ झूठ और उनके पीछे की सच्चाई बताएंगे। गांधी जयंती से चार दिन पहले भगत सिंह की जयंती भी आती है। 

इन दिनों एक बात कहा जाना बहुत आम है कि गांधी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी रोकने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन, यह सच नहीं है। 7 अक्टूबर, 1930 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई थी। उनकी फांसी के लिए 24 मार्च, 1931 की तारीख तय की गई। कोर्ट ट्रायल और भूख हड़ताल की वजह से भगत सिंह और उनके साथी युवाओं के बीच में काफी लोकप्रिय हो गए थे। गांधी उस समय भारत के सबसे बड़े नेता बन चुके थे। ऐसे में सबको गांधी से उम्मीद थी कि वह इस मामले में तुरंत ही कुछ करेंगे। 17 फरवरी, 1931 को गांधी और इरविन के बीच समझौता हुआ। भगत सिंह के समर्थक चाहते थे कि गांधी इस समझौते की शर्तों में भगत सिंह की फांसी रोकना शामिल करें। 

अब सवाल यह है कि क्या गांधी जी ने भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया? दावा किया जाता है कि अंतिम समय तक गांधी के मन में भगत सिंह के प्रति सहानुभूति थी। दावा किया जाता है कि महात्मा गांधी ने 23 मार्च, 1928 को एक निजी पत्र लिखा था और भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी पर रोक लगाने की अपील की थी। इस बात का जिक्र ‘माई लाइफ इज माई मैसेज’ नामक किताब में बताया जाता है। गांधी जी ने पत्र में लिखा था, ‘अगर फैसले पर थोड़ी भी विचार की गुंजाइश है तो आपसे प्रार्थना है कि सजा को वापस लिया जाए या विचार करने तक स्थगित कर दिया जाए। किताब के मुताबि‍क गांधी जी ने इरविन को खत लिखा था और आखिरी समय तक उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों की सजा कम करवाने और उन्हें माफी दिलाने का प्रयास किया, लेकिन अंग्रेजों ने भगत सिंह को तय समय से एक दिन पहले ही फांसी दे दी थी। यह खबर सुनकर गांधीजी बहुत दुखी हुए और कुछ देर के लिए मौन में चले गए थे। हालांकि, इस बात में कितनी सच्‍चाई है, यह तो इतिहास में दर्ज हो चुका है जिसके बारे में अब साफतौर से कहना शायद मुश्‍किल है।

डॉ. बीआर अंबेडकर भारत—पाकिस्तान बंटवारे के संबंध में आगे लिखते हैं कि गांधी जी ने पहले दो बातों के बहाने विभाजन विषयक प्रश्न को टालने का प्रयास किया। उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि भारत का विभाजन एक नैतिक भूल है और एक पाप है, जिसके भागीदार वह नहीं होंगे। यह एक आश्चर्यजनक तर्क है। भारत ही एक अकेला देश नहीं है जिसे राष्ट्रीय तथ्यों पर अवलंबित कारणों से प्राकृतिक और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित सीमाओं के स्थानांतरण संबंधी समस्या अथवा विभाजन का सामना करना पड़ा हो। पोलैंड का तीन बार विभाजन हुआ और कोई भी यह विश्वास से नहीं कह सकता कि उसका अब आगे विभाजन नहीं होगा। यूरोप में ऐसे बहुत कम देश हैं जिनका पिछले 150 वर्षों की अवधि में विभाजन न हुआ हो। किसी देश का विभाजन नैतिक है या अनैतिक, यह आध्यात्मिक प्रश्न न होकर एक सामाजिक, राजनैतिक अथवा सैन्य प्रश्न है और उसमें पाप और पुण्य का कोई स्थान नहीं। 

गांधी जी ने दूसरे प्रश्न के संदर्भ में विरोधस्वरूप कहना शुरू कर दिया था कि मुस्लिम लीग मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती और पाकिस्तान सिर्फ जिन्ना साहब की कल्पना है। यह समझना बेहद कठिन है कि गांधी जी इतना भी अपनी आंखों से नहीं देख सके कि किस तरह मुस्लिम जनता पर जिन्ना का प्रभाव दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और किस तरह वह अपनी पूरी ताकत को एकत्रित करने में जुटे हैं। इन प्रसंगों को केवल  एक लेख के माध्यम से खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन फिलहाल इस बार इतना ही  आगे यदि अवसर मिला तो इस पर और लिखकर आपसे विचार करने को बहुत कुछ है ।(इस लेख में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की पुस्तक ‘खण्डित भारत’ तथा डॉ. बीआर अंबेडकर की पुस्तक ‘पाकिस्तान अथवा भारत विभाजन’ से कुछ कोट्स साभार लिए गए है)।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं और यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।

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