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भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मायने

पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम ने स्वयं के अपने अनुभवों के आधार पर एक बार कहा था कि "मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की थी।"

यूनेस्को ने 1999 में 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। (Illustration: C R Sasikumar)

विश्व को आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाते हुए अठारह वर्ष होने आ रहे हैं। भारत के पड़ोसी बांग्लादेश के अपनी मातृभाषा बांग्ला के प्रति समर्पण ने मातृभाषा दिवस जैसी संकल्पना को विश्व के समक्ष अवतरित होने पर विवश कर दिया था। बहुत पीछे इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह वो समय था जब सन 1948 में पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया और आज का बांग्लादेश उस समय का पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था। 21 फरवरी 1952 को ढाका यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों और कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सम्मिलित रूप से तत्कालीन पाकिस्तान सरकार की इस भाषायी नीति का कड़ा विरोध करते हुए अपनी मातृभाषा बांग्ला के अस्तित्व की रक्षा के लिए प्रदर्शन किए।

प्रदर्शन इतने जबरदस्त थे कि रोक पाना बेहद मुश्किल हो गया था और अंततः पाकिस्तान पुलिस ने बड़ी ही बेरहमी से प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। जाने कितने विद्यार्थी अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए बलिदान हो गए। इसके बावजूद भी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में अपनी मातृभाषा के लिए प्रदर्शन बंद होने का नाम नहीं ले रहे थे और इसलिए 29 फरवरी 1956 को पाकिस्तान सरकार को बांग्ला भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा देना पड़ा। मातृभाषा विजयी हुई और इस तरह 1952 में भाषा आंदोलन के दौरान अपनी मातृभाषा के लिए शहीद हुए युवाओं की स्मृति में यूनेस्को ने 1999 में 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। पहली बार 21 फरवरी 2000 को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया था।

वास्तव में इस दिवस को मनाने का उद्देश्य विश्व में भाषायी और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देना है। इस संदर्भ में भारत की भूमिका और भी अधिक मायने रखती है, क्योंकि एक बहुभाषी राष्ट्र होने के नाते मातृभाषाओं के प्रति भारत का उत्तरदायित्व कहीं अधिक मायने रखता है। भारत में द्विभाषिकता एवं बहुभाषिकता का प्रचलन है। भारत में भाषाओं को लेकर विवाद चलते आए हैं और चलते रहते भी हैं। खासतौर पर भाषायी द्वंद्व राजभाषा हिन्दी और देश की अन्य शेष भाषाओं के बीच बना ही रहता है। गैरहिन्दी भाषियों का हमेशा आरोप रहता है कि उन पर हिन्दी लादी और थोपी जाती है। वहीं हिन्दीभाषी कभी भी देश की अन्य भाषाओं को सीखने के प्रति न तो लालायित होते हैं, न ही ऐसी कोई संवेदनशीलता ही रखते हैं कि भारतीय भाषाओं के बीच लोगों द्वारा स्थापित कर दिया गया वैमनस्य समाप्त हो सके।

भाषाओं को लेकर भारत में जो माहौल है, उसके समाधान के लिए अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस जैसे विषय बहुत अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। ऐसे दिवसों का आयोजन लोगों में अपनी व अन्य जनों की मातृभाषाओं के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना उत्प्रेरित करते हैं। यूनेस्को की इस पहल ने विश्व में यह संदेश देने का प्रयास किया है कि मातृभाषा ही व्यक्ति के संस्कारों की संवाहक है और इसके माध्यम से ही किसी भी देश की संस्कृति को मूर्तरूप मिलता है। मातृभाषा ही शिशु, माता, समाज, राष्ट्र और विश्व को जोड़ती है। विश्व की लगभग 3000 भाषाओं के अस्तित्वों पर विलुप्तता का खतरा मंडरा रहा है।

अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के माध्यम से यूनेस्को ने विश्व की समस्त मातृभाषाओं को प्राथमिक शिक्षा, बहुभाषी शिक्षा, समावेशी शिक्षा, साइबरस्पेस, ब्रेल तथा अन्य लिपियों में विकास, मैत्री संस्कृति, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, वैश्विक नागरिकता के लिए स्थानीय भाषाओं तथा विज्ञान पर बल जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण कार्य की पहल की है। बहुभाषी भारत में भी देशीय स्तर पर अपनी अपनी मातृभाषाओं को लेकर ऐसी ही गतिविधियों की सख्त जरूरत है। यह बात बिल्कुल प्रमाणित है कि मातृभाषा ही मानव जीवन से संबद्ध समस्त विषयों को सीखने, समझने एवं ज्ञान की प्राप्ति में सबसे सरल माध्यम होती है। हमारे पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम ने स्वयं के अपने अनुभवों के आधार पर एक बार कहा था कि “मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की थी।” निश्चितरूप से डॉ अब्दुल कलाम के मातृभाषा के लिए कहा गया एक एक शब्द भारत में बरसों से चले आ रहे भाषायी शीतयुद्ध को शांत कर पाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समय को सिर्फ हर भारतीय के भाषायी दृष्टिकोण से समझदार होने का इंतजार रहा है।

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