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आज के दिन ही एक कड़वे सच से हुआ था महात्मा गांधी का सामना, बदल गया था जीवन का मकसद

दक्षिण अफ्रीका सरकार ने साल 2011 में महात्मा गांधी के 142वें जन्मदिन पर उस स्टेशन का नाम उनके नाम पर रखा दिया गया जहां उन्हें ट्रेन से धक्के देकर निकाला गया था।

महात्मा गांधी चरखे पर सूत काटते हुए।

सात जून की तारीख आम तौर पर भारतीयों के लिए कोई खास मायने नहीं रखती जबकि इसका उनके अतीत से गहरा नाता है। सात जून 1893 को ही दक्षिण अफ्रीका के एक रेलवे स्टेशन पर युवा अधिवक्ता मोहनदास करमचंद गांधी को ट्रेन से धक्के मारकर बाहर कर दिया गया था क्योंकि उनका रंग “गोरा” नहीं था। इस घटना ने न केवल गांधी के जीवन बल्कि भारतीय इतिहास का रुख मोड़ दिया। इस घटना के बाद गांधी ने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई को अपने जीवन का मकसद बना लिया। पहले वो दक्षिण अफ्रीका में ही रहकर वहां के भारतीयों के अधिकारों के लिए गोरों से लड़े और उसके बाद भारत वापस लौटकर उन्होंने आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया।

दो अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी के पिता करमचंद उत्तमचंद गांधी पोरबंदर रियासत के दीवान थे। उनकी मां पुतलीबाई गृहिणी थीं। गांधी की शुरुआती पढ़ाई लिखाई स्थानीय स्कूलों में हुई थी। गांधी की महज 13 साल की उम्र में उनसे छह महीने बड़ी कस्तूरबा से शादी हो गई। नवंबर 1887 में गांधी ने स्थानीय स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की। गांधी को करीब 40 प्रतिशत अंक मिले थे। जनवरी 1888 में उन्होंने भावनगर स्थित समालदास कॉलेज में प्रवेश लिया लेकिन वो पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए। 10 अगस्त 1888 को ब्रिटेन में वकालत की पढ़ाई करने के लिए वो गुजरात से मुंबई (तब बॉम्बे) के लिए निकले। मुंबई से वो पानी के जहाज से इंग्लैंड गए। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद गांधी जून 1891 को बैरिस्टर बन गए।

बैरिस्टर बनने के बाद गांधी उसी साल भारत वापस आ गए। भारत आने के बाद उन्होंने पहले गुजरात और उसके बाद मुंबई में वकालत की प्रैक्टिस की लेकिन उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। 1893 में दक्षिण अफ्रीका में रह रहे गुजराती व्यापारी दादा अब्दुल्ला के वकील के तौर पर वो दक्षिण अफ्रीका गए। गांधी को 105 पाउंड वेतन और यात्रा खर्च पर नौकरी मिली थी। अनुबंध के अनुसार उन्हें कम से कम एक साल दादा अब्दुल्ला के लिए दक्षिण अफ्रीका में रहकर काम करना था।

गांधी अप्रैल 1893 में 24 साल की उम्र में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। अफ्रीका पहुंचने के दो महीने बाद ही गांधी के संग रेलवे स्टेशन पर फर्स्ट क्लास के डिब्बे से जबरन निकाले जाने की घटना घट गई। गांधी डरबन से प्रीटोरिया जा रहे थे। उनके पास फर्स्ट क्लास (पहले दर्जे) का टिकट था। यात्रा के दौरान उन्हें पहले दर्जे के डब्बे में बैठा देख एक यूरोपीय यात्री भड़क उठा। यूरोपीय यात्री ने रेलवे अधिकारियों को बुलाकर डिब्बे में “कूली” के सफर करने की शिकायत की। दक्षिण अफ्रीका के गोरे लोग उन दिनों भारतीयों एवं अन्य प्रवासियों को इसी नाम से पुकारते थे। गांधी ने पहले दर्जे का टिकट होने का हवाला देकर डिब्बे से उतरने से इनकार कर दिया। आखिरकार पीटरमारिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर उन्हें धक्का देकर रेल के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया।

इस घटना का ये असर हुआ कि गांधी ने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई को अपना मकसद बना लिया और एक साल के लिए दक्षिण अफ्रीका आए गांधी 21 साल बाद 1914 में स्थायी तौर पर भारत लौट पाए। घटना के 100 साल बाद दक्षिण अफ्रीका ने साल 2011 में गांधी के 142वें जन्मदिन पर इस स्टेशन का नाम उनके नाम पर रखा।

वीडियो- देखें गांधी फिल्म का दृश्य जिसमें उन्हें ट्रेन से निकाला जाता है-

वीडियो- शिवसेना ने कहा- जब गांधी का स्मारक बन सकता है तो ठाकरे का क्यों नहीं?

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